कितनी बार जंग के मैदान में उतरा है ईरान, खून से सने इतिहास में कितनी बार जीता है?

ईरान में इस्लामिक शासन विरोधी आंदोलन लगातार सुर्खियों में है. ईरान में आंदोलनकारियों को बेरहमी से दबाए जाने पर अमेरिका ने प्रदर्शनकारियों के सपोर्ट में इस्लामिक शासन पर हमले की धमकी दी है. इस बाबत उसने तैयारियां भी शुरू कर दी है. पिछले साल भी इजरायल से तनाव के बीच अमेरिका ने ईरान पर हवाई हमला किया था. ऐसे में जानते हैं कि आखिर ईरान का जंगी इतिहास कितना पुराना है.

Advertisement
1980-88 के इराक-ईरान युद्ध में मारे गए अज्ञात ईरानी सैनिकों के अवशेष पिछले साल नवंबर में युद्ध मैदान से मिले थे (Photo - AP) 1980-88 के इराक-ईरान युद्ध में मारे गए अज्ञात ईरानी सैनिकों के अवशेष पिछले साल नवंबर में युद्ध मैदान से मिले थे (Photo - AP)

सिद्धार्थ भदौरिया

  • नई दिल्ली,
  • 16 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:17 PM IST

ईरान का एक समृद्ध इतिहास रहा है. इसकी ऐतिहासिक विरासत कई हजार वर्षों तक फैली हुई है. इस इतिहास को मोटे तौर पर तीन युगों में विभाजित किया जा सकता है. इसमें पूर्व-इस्लामिक प्राचीन काल (लगभग 559 ईसा पूर्व से 651 ईस्वी तक), इस्लामी युग (651 ईस्वी से 1800 ई. तक) और आधुनिक युग शामिल है. इन सब के बीच कई बार ईरान को युद्ध का भी सामना करना पड़ा. 

Advertisement

पिछले साल इजरायल ने ईरान पर हमला किया था. बाद में इसमें अमेरिका भी शामिल हो गया. आधुनिक समय में ईरान पर अमेरिका और पश्चिमी देश अलगाववादी तत्वों और आतंकी संगठनों को वित्त पोषित करने और प्रश्रय देने का आरोप लगाते आए हैं. अमेरिका के साथ ईरान के तल्ख रिश्ते करीब सात दशक से भी ज्यादा पहले से चला आ रहा है. 

इराक के साथ खूनी युद्ध में मारे गए थे लाखों लोग
हाल-फिलहाल में ईरान ने प्रत्यक्ष तौर पर इजरायल और अमेरिका से पहले इराक का सामना जंग के मैदान में किया है. 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान की वैश्विक छवि बनी जो बाहरी शक्तियों के सामने डटकर खड़े होने से नहीं डरता था. यही वजह रही कि क्रांति के बाद 1979-1981 के ईरान बंधक संकट के दौरान, तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास में दर्जनों अमेरिकी राजनयिकों को खोमेनी समर्थक कट्टरपंथी छात्र प्रदर्शनकारियों ने एक साल से ज्यादा समय तक बंधक बनाकर रखा. 

Advertisement

इसी दौरान 1980 के सितंबर में सद्दाम हुसैन ने इराकी सेना को अपनी साझा सीमा पर ईरान पर हमला करने का आदेश दिया, जिससे आठ साल तक चलने वाला एक खूनी युद्ध शुरू हो गया. इसमें लाखों सैन्य और नागरिक लोगों की जान चली गई. तब अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के नेतृत्व में संयुक्त राज्य अमेरिका ने  इराक और उसके नेता सद्दाम हुसैन का साथ दिया. यह युद्ध आठ वर्षों तक चला.अनुमानों के अनुसार, युद्ध में लगभग 5 लाख लोग मारे गए, जिनमें ईरान को भारी नुकसान हुआ.

इस जंग में प्रथम विश्व युद्ध की तरह ही बड़े पैमाने पर खाइयां खोदी गईं, मशीनगनों का इस्तेमाल किया गया और संगीनों से हमले किए गए.  इराक ने ईरानियों और इराकी कुर्दों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का भी प्रयोग किया था. इस तरह ईरान के लिए ये जंग भीषण रक्तपात से भार साबित हुआ. 

वैसे इराक के पहले भी ईरान ने कई युद्धों का सामना किया है. इनमें से बहुत सारे ऐसे जंग हुए, जिनमें ईरान ने जीत हासिल की. ईरान ने रोमन, ओटोमन और बिजान्टिन जैसे साम्राज्यों से लोहा लिया और उन से युद्ध भी जीता. ईरान के युद्धों का इतिहास, इसकी शुरुआत से ही जुड़ा हुआ है. 

ऐसे अस्तित्व में आया था ईरान 
ईरान का इतिहास कुछ ईसा पूर्व से शुरू होता है, जब मध्य एशिया से ईरानी जनजातियां आकर ईरानी पठार में बसने लगी. इसके बाद मेद्स और पर्शियन दो ईरानी राज्य अस्तित्व में आए. बीबीसी के हिस्ट्रीएक्स्ट्रा के मुताबिक, पहली बार 559 ईसा पूर्व साइरस द्वितीय के सत्ता में आने के बाद दुनिया ने ईरान को जाना. साइरस को पहले फारसी साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है. इसे अचमेनिद फारसी साम्राज्य कहा जाता था. इसने अपने सौम्य प्रशासन से मित्र और शत्रु दोनों को प्रभावित किया, जो उन धार्मिक विचारों पर आधारित था. तब ईरान में पारसी धर्म से जोड़ा गया, जो ईरान का पूर्व-इस्लामिक धर्म था और जिसका मूलमंत्र था "अच्छे शब्द, अच्छे विचार और अच्छे कर्म." 

Advertisement

सिकंदर का ईरान पर आक्रमण 
इस फारसी साम्राज्य पर ईसा पूर्व 330 के दशक में सिकंदर ने आक्रमण किया और तब ईरान को हार का सामना करना पड़ा.  सिकंदर के उत्तराधिकारियों - सेल्यूसिडों - के अधीन हेलेनाइज्ड शासन एक शताब्दी तक चला, जब तक कि पूर्व से एक नए ईरानी राजवंश, पार्थियनों का आगमन नहीं हुआ.
 
पार्थियन की रोमन साम्राज्य से भिड़ंत
ईरान पर पार्थियन साम्राज्य की स्थापना ने अचमेनिदों को वहां से विस्थापित होने पर मजबूर कर दिया. पर्थियन उभरते रोमन साम्राज्य के लिए गंभीर शत्रु साबित हुआ , जिसने उसे उसकी सबसे बड़ी हार में से एक दी. यह 53 ईसा पूर्व में कैरे के मैदानों में हुआ था, जहां रोमन कमांडर क्रैसस को घुड़सवार तीरंदाजों से बनी एक छोटी पार्थियन सेना ने निर्णायक रूप से पराजित किया था.

पार्थियन को हराकर सासानियन ने किया ईरान पर कब्जा 
500 वर्षों के बाद, 224 ईस्वी में पार्थियनों को एक अन्य राजवंश ने उखाड़ फेंका. ये थे फारस के हृदयस्थल से आए ससानियन. सासानियन निस्संदेह पार्थियनों के वंशज थे, लेकिन उनका साम्राज्य अधिक केंद्रीकृत था. सासानियन राजा, विशेष रूप से खुसरो द्वितीय, ईरान में इस्लाम के प्रादुर्भाव से पहले अच्छे प्रशासन का प्रतीक बन गए थे. सासानियन भी अपने पूर्ववर्ती पार्थियन की तरह रोमन और बीजान्टिन साम्राज्यों के लिए खतरनाक दुश्मन साबित हुए और इनके बीच कई युद्ध हुए. सासानियन इन युद्धों को जीतकर अपना अस्तित्व बरकरार रखा.  

Advertisement

ऐसे ईरान में छा गया इस्लाम
7वीं शताब्दी में अरब प्रायद्वीप से एक नई शक्ति उभरी, जिसका नाम इस्लाम था. बीजान्टिन को पराजित करते हुए, मुस्लिम अरब सेना आगे बढ़ी और सासानियन को चुनौती थी. इस युद्ध में सासानियन हार गए और मुस्लिम सेना ने उन्हें ईरान से उखाड़ फेंका. फिर ईरान भी खिलाफत छा गया. यहीं से ईरान ने खिलाफत के मुताबिक आकार लेना शुरू किया. 

यह भी पढ़ें: सत्ता बदली तो क्या टूट सकता है ईरान? आधे पर्शियन, बाकी अजेरी- बलोच... कुर्द पर शंका

ईरानी प्रभाव का प्रबल प्रमाण 749 ईस्वी में अब्बासिद खिलाफत के उदय और राजधानी को दमिश्क से नवस्थापित शहर बगदाद (लगभग 762 ईस्वी) में शिफ्ट किए जाने से मिलता है, जो पुरानी सासानियन राजधानी से कुछ ही दूरी पर स्थित था. इस ईरानी बदलाव ने 'नई' फ़ारसी भाषा का विकास किया, जिसने अरबी वर्णमाला को अपनाकर पूर्वी इस्लामी जगत की संपर्क भाषा का रूप धारण किया और समय के साथ विश्व की महान साहित्यिक भाषाओं में से एक बन गई.

तुर्कों और मंगोलों की ईरान में इंट्री 
इस्लामी युग के दौरान ईरान में  11वीं शताब्दी में मध्य एशिया से तुर्क लोगों का आगमन हुआ. फिर 13वीं सदी में मंगोल आक्रमण हुए. फिर 14वीं शताब्दी में तैमूरलंग द्वारा मचाई गई तबाही तक पहुंचने वाले खानाबदोश आक्रमणों की लहर ने ईरान में व्यापक आर्थिक उथल-पुथल पैदा कर दी. इस तरह इन आक्रमणकारियों से ईरान को लगातार जूझना पड़ा.

Advertisement

सफवी वंश का उदय और तुर्कों के साथ युद्ध
16वीं शताब्दी में सफवी शासकों का उदय हुआ. इसके साथ 1501 से इस्लाम की अल्पसंख्यक शाखा, शिया धर्म को नए राजकीय धर्म के रूप में लागू कर दिया. शिया धर्म को अपनाने से ईरानी राज्य को पश्चिम में स्थित अपने प्रतिद्वंद्वी ओटोमन साम्राज्य (तुर्क)से अलग पहचान मिली. सफवी साम्राज्य का तुर्कों के साथ टकराव होता रहा.ओटोमन और सफवी साम्राज्यों के बीच कई युद्ध हुए. सफवीदों ने ईरानी सभ्यता के विकास की देखरेख की, विशेष रूप से शाह अब्बास प्रथम (1587-1629) के शासनकाल में, जो इस्लामी विजय के बाद 'महान' के रूप में जाने जाने वाले एकमात्र राजा थे.

यह भी पढ़ें: ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई के परिवार में कौन-कौन हैं? अशांति के बीच अभी कहां हैं सभी 

नादिर शाह और ईरान का उथल-पुथल भरा दौर
1722 में सफवी राजवंश के दर्दनाक पतन के परिणामस्वरूप दशकों तक युद्ध चले. पहले तो नादिर शाह (1736-47) के नेतृत्व में ईरान सशक्त होकर उभरा, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद एक बार फिर उथल-पुथल में डूब गया. जब ईरान 18 वीं शताब्दी के अंत तक ईरान अपनी आंतरिक उथल-पुथल से उभरा, तो उसे रूसी और ब्रिटिश साम्राज्यों के रूप में एक बिल्कुल नई चुनौती का सामना करना पड़ा.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement