पाकिस्तान ग्वादर बेस के बदले में चीन से भरपूर वसूली करना चाहता है. पाकिस्तान ने चीन से वैसे परमाणु पनडुब्बी की मांग की है जिसके पास सेकेंड स्ट्राइक की क्षमता हो. इसके बदले में पाकिस्तान चीन को ग्वादर पोर्ट इस्तेमाल करने की अनुमति देगा. इस खबर को अमेरिका स्थित एक स्वतंत्र समाचार आउटलेट 'ड्रॉप साइट न्यूज़' ने ब्रेक किया है. इस संस्थान का दावा है कि यह सनसनीखेज दावा करने से पहले उसने पाकिस्तान के गोपनीय सैन्य दस्तावेजों की समीक्षा की है.
यहां सेकेंड स्ट्राइक का मतलब दुश्मन अगर पहले हमला (First Strike) करके आपके सारे न्यूक्लियर हथियार नष्ट कर दे, तब भी आपके पास इतनी ताकत बची हो कि आप भारी जवाबी हमला कर सकें. यानी कि ऐसी Ballistic Missile Submarines (SSBN) जो दुश्मन के हमले से बचकर समुद्र की गहराई में छिपी रहें, और फिर न्यूक्लियर मिसाइलें दाग सकें.
अपनी ज्यादातर रक्षा जरूरतों को चुराकर-मांगकर पूरा करने वाले पाकिस्तान ने यह मांग 2024 में पाकिस्तानी सेना और चीन के बीच हुई द्विपक्षीय बातचीत के दौरान की गई थी. इस दौरान पाकिस्तान की ओर से इस बातचीत की अगुआई आर्मी चीफ आसिम मुनीर कर रहे थे.
2024 की शुरुआत में पाकिस्तान ने बीजिंग को निजी तौर पर यह आश्वासन दिया था कि वह ग्वादर को चीनी सेना के लिए एक स्थायी अड्डे के रूप में विकसित करने की अनुमति देगा. उसी वर्ष बाद में उसने चीन से परमाणु-सक्षम पनडुब्बियों की मांग की. ऐसा होने पर पाकिस्तान जिसके पास अभी हवा और जमीन से परमाणु हथियार मार करने की क्षमता है, न्यूक्लियर triad हासिल कर लेता. यानी कि वह जल, थल और नभ से परमाणु हथियार कर सकता था. चीन ने इस मांग को अनुचित माना और बातचीत रुक गई.
Drop Site ने सबसे पहले यह कहानी 13 दिसंबर, 2025 को रिपोर्ट की थी. लेकिन 18 मई को सामने आई इसकी सबसे नई रिपोर्ट को देखें, जिसमें एक टॉप-सीक्रेट केबल का ज़िक्र है जिसमें बाइडेन प्रशासन का एक अहम अधिकारी इमरान खान को उनके पद से हटाने के लिए ज़ोर डाल रहा था.
यह रिपोर्ट परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान की ऐसी तस्वीर पेश करती है जो अपने दो रणनीतिक साझेदारों -चीन और अमेरिका- के साथ कड़ा मोलभाव कर रहा है.
18 मई की यह कहानी उन घटनाओं के क्रम को बयां करती है जिन्होंने पिछले पांच सालों में अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों को आकार दिया, और वॉशिंगटन तथा इस्लामाबाद को आपसी शक-शुबहे से निकालकर एक राजनीतिक मेल-मिलाप की स्थिति में ला खड़ा किया. एक तरफ जहां पाकिस्तान वॉशिंगटन के साथ तालमेल बिठा रहा था, वहीं दूसरी तरफ वह चीन के साथ रणनीतिक हथियार ले जाने वाले कैरियरके लिए मोलभाव भी कर रहा था.
परमाणु हथियार ले जाने वाली पनडुब्बियां तीन तरह की होती हैं. परमाणु ऊर्जा से चलने वाली बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां, पारंपरिक ऊर्जा से चलने वाली क्रूज़ मिसाइल पनडुब्बियां या पारंपरिक ऊर्जा से चलने वाली बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां.
ड्रॉप साइट की इस कहानी से यह साफ नहीं होता कि पाकिस्तान किस खास तरह की क्षमता हासिल करने की कोशिश कर रहा था. लेकिन अगर पाकिस्तान ने चीन पर ऐसी क्षमता हासिल करने के लिए ज़ोर डाला हो तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी.
चाइनीज 'माल' के दम पर ताकत दिखाता है पाकिस्तान
1970 के दशक के आखिर और 1980 के दशक की शुरुआत में चीन ने पाकिस्तान को परमाणु बम बनाने में मदद की. माना जाता है कि परमाणु हथियारों की टेक्नोलॉजी का यह पहला ऐसा गुपचुप ट्रांसफर था जिसमें चीन ने पाकिस्तान को न सिर्फ़ बहुत ज़्यादा एनरिच्ड यूरेनियम दिया, बल्कि एक हथियार, CHIC-4—के लिए बम के ब्लूप्रिंट भी दिए.
यह 12-किलोटन का एक न्यूक्लियर फ़िशन डिवाइस था जिसका पहला टेस्ट 1960 के दशक में किया गया था. 1990 के दशक में चीन ने पाकिस्तान को इन हथियारों को लॉन्च करने के लिए M-11 इंटरमीडिएट रेंज की बैलिस्टिक मिसाइलें भी बेचीं. पाकिस्तान ने इन हथियारों का इस्तेमाल करके हवा और जमीन से लॉन्च होने वाले परमाणु हथियार की क्षमता हासिल कर ली.
लेकिन पाकिस्तान के पास अबतक समुद्र से लॉन्च होने वाले परमाणु हथियार नहीं थे. ये इस्लामाबाद की तकनीकी और आर्थिक क्षमताओं से बाहर की बात थी. समुद्र के नीचे से लॉन्च होने वाले परमाणु हथियार जवाबी हमले के लिए बहुत शक्तिशाली हथियार होते हैं. ये किसी भी देश को यह पक्का भरोसा देते हैं कि अगर उस पर पहले परमाणु हमला होता है, तो वह भारी नुकसान उठाने के बाद भी हमलावर पर ज़ोरदार जवाबी हमला कर सकता है.
दुनिया के छह देशों के पास परमाणु-शक्ति से चलने वाली बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों पर आधारित समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता है. ये देश हैं- अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और भारत. इजरायल के पास क्रूज़ मिसाइलें ले जाने वाली पारंपरिक पनडुब्बियों का एक वर्ग है, जबकि उत्तरी कोरिया के पास परमाणु-टिप वाली बैलिस्टिक मिसाइलें ले जाने वाली केवल एक पारंपरिक-शक्ति वाली पनडुब्बी है.
2017 में पाकिस्तान ने 450 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली पनडुब्बी से लॉन्च की जाने वाली क्रूज मिसाइल (SLCM) के सफल परीक्षण के साथ एक 'न्यूक्लियर ट्रायड' पूरा करने का दावा किया था. लेकिन पाकिस्तान के पास सक्रिय पारंपरिक पनडुब्बियों के छोटे बेड़े (केवल पांच) और मिसाइल की कम मारक क्षमता को देखते हुए, यह एक शुरुआती स्तर की समुद्री प्रतिरोधक क्षमता ही थी.
2014 में भारत के सुरक्षा तंत्र के सदस्यों का आकलन था कि 5 अरब डॉलर की हैंगोर क्लास पनडुब्बी डील, जो पाकिस्तान की अब तक की सबसे बड़ी रक्षा डील है, इस्लामाबाद को समुद्र से परमाणु हथियार लॉन्च करने की क्षमता प्रदान करेगी. पाकिस्तान ने S26-आधारित आठ पनडुब्बियों का ऑर्डर दिया जो जो किलो क्लास पनडुब्बी का चीनी संस्करण है.
इनमें से चार चीन में और चार पाकिस्तान में बनाई जानी थीं. इस क्लास की पहली पनडुब्बी PNS/M हैंगोर को इस साल 4 मई को चीन के सान्या में कमीशन किया गया और सर्विस में शामिल किया गया. उस समय भारतीय विश्लेषकों का मानना था कि इन चार पनडुब्बियों में से दो 'S-30' नाम की एक विशेष क्लास की बड़ी पारंपरिक पनडुब्बियां होंगी, जो परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम होंगी.
चीनी क्विंग-क्लास एक अनोखी पारंपरिक पनडुब्बी हैं, जो परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता रखती हैं.
यह पनडुब्बी 30 दिनों तक पानी के नीचे रह सकती है. यह अपने कोनिंग टावर से 1,500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली तीन परमाणु-युक्त क्रूज़ मिसाइलें लॉन्च कर सकती है. इन पनडुब्बियों का निर्माण कराची से 353 किलोमीटर पश्चिम में स्थित ओरमारा के सबमरीन रीबिल्ड कॉम्प्लेक्स में किया जाना था.
लेकिन Drop Site News की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा लगता है कि यह तीन-चरणों वाला सौदा जिसका नतीजा पाकिस्तान को समुद्र-आधारित परमाणु हथियार के रूप में मिलना था, पूरा नहीं हो पाया. ऐसा तब हुआ जब जनरल बाजवा पाकिस्तान को बीजिंग और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की ओर ले जा रहे थे.
आसिम मुनीर जिन्होंने नवंबर 2022 में सेना प्रमुख का पद संभाला उन्होंने पाकिस्तान को अमेरिका के करीब और बीजिंग से दूर कर दिया.
सेना प्रमुख ने CPEC का निर्माण कर रहे चीनी कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चीन की चिंताओं को दरकिनार कर दिया और CPEC के दूसरे चरण को कमज़ोर पड़ने दिया. अगस्त 2025 में उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि अमेरिका के साथ बेहतर संबंध चीन के साथ संबंधों की कीमत पर नहीं होंगे. लेकिन तथ्य कुछ और ही दिखाते हैं. आसिम मुनीर के लिए ट्रंप का बार-बार 'मेरे पसंदीदा फील्ड मार्शल' टर्म का इस्तेमाल करना, और ईरान-अमेरिका मध्यस्थता में इस्लामाबाद की केंद्रीय भूमिका, यह दर्शाते हैं कि पाकिस्तान चीनी खेमे से दूर होता जा रहा है. लेकिन जैसा कि ड्रॉप साइट न्यूज की रिपोर्ट से पता चलता है, 2024 में भी मुनीर चीन के साथ एक रणनीतिक सौदा करने को तैयार थे. बस उसकी कीमत सही होनी चाहिए थी.
संदीप उन्नीथन