लॉन्ग रेंज टारगेट, सटीक निशाना और दहशत में दुश्मन... क्या होती है रॉकेट फोर्स जिसकी आर्मी चीफ ने बताई जरूरत

रॉकेट फोर्स ऐसे एडवांस्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड हथियारों को मैनेज करता है जो गाइडेड सिस्टम से दुश्मन के बेस, जहाजों या एयरक्राफ्ट जैसे दूर के टारगेट पर सटीक निशाना लगाते हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि काफी दूर से ही दुश्मन के एयरबेस, अड्डे या कमांड सेंटर को ध्वस्त किया जा सकता है. रॉकेट फोर्स दुश्मन के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोध का काम करता है.

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पिनाका रॉकेट सिस्टम का सफल परीक्षण (File Photo: PTI) पिनाका रॉकेट सिस्टम का सफल परीक्षण (File Photo: PTI)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 13 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:23 PM IST

भारत के आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी ने मंगलवार को कहा कि देश को मिसाइल फोर्स की जरूरत है. उन्होंने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि आज आप देखेंगे कि रॉकेट और मिसाइलें एक-दूसरे से जुड़ गई हैं क्योंकि अगर हम कोई असर डालना चाहते हैं, तो रॉकेट और मिसाइलें दोनों ही ऐसा कर सकती हैं. हम एक रॉकेट मिसाइल फोर्स बनाने की सोच रहे हैं क्योंकि, जैसा कि आप जानते हैं, पाकिस्तान ने एक रॉकेट फोर्स बनाई है, और चीन ने भी ऐसी ही एक फोर्स बनाई है.

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आर्मी चीफ ने कहा कि यह समय की जरूरत है कि हम भी ऐसी ही एक फोर्स बनाएं. 

सवाल है कि रॉकेट फोर्स क्या होता है और आधुनिक वॉरफेयर में इसकी क्यों जरूरत है? 

रॉकेट फोर्स किसी भी सेना की एक स्पेशल यूनिट होती है. जो लंबी दूरी की मिसाइलों और रॉकेट हथियारों का संचालन, नियंत्रण और हमलों के लिए इस्तेमाल की जाती है. सरल शब्दों में, यह दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों जैसे कमांड सेंटर, हवाई अड्डे या बुनियादी ढांचे पर सटीक और तेज हमले करने का काम करती है. सबसे अहम बात यह है कि रॉकेट फोर्स या मिसाइल फोर्स में सेना को हमला करने के लिए फिजीकली रणभूमि में मौजूद नहीं होना पड़ता है. 

बल्कि आर्मी इंजीनियर अपने कमांड सेंटर से ही दुश्मन के ठिकाने को नेस्तानाबूद कर सकता है. रॉकेट फोर्स दुश्मन के कमांड सेंटर, एयरफील्ड और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे दुश्मन के अहम ठिकानों पर सटीक हमले करने के लिए लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइल चलाने का काम करती है. आसान शब्दों में कहें तो, यह जमीनी सैनिकों को खतरे में डाले बिना, तेजी से और दूर से हमला करने की ताकत देने के लिए रॉकेट आर्टिलरी और मिसाइल सिस्टम को एक ही कमांड के तहत लाती है.

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रॉकेट या मिसाइल फोर्स ऐसे एडवांस्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड हथियारों को मैनेज करता है जो गाइडेड सिस्टम- जैसे रडार, इन्फ्रारेड, या GPS—का इस्तेमाल करके दुश्मन के बेस, जहाजों या एयरक्राफ्ट जैसे दूर के टारगेट पर सटीक निशाना लगाते हैं. 

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने गजब की कॉम्बैट क्षमता का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तान के 10-11 एयरबेस को तबाह कर दिया था. ये हमला भारत ने ब्रह्मोस मिसाइल से किया था. इन मिसाइलों की मारक क्षमता, इसका असर और इसकी तबाही देखकर दुनिया दंग थी. ये मिसाइल टेक्नॉलजी और उसकी मारक क्षमता का ही कमाल था. 

अब भारत की सेना मिसाइलों और रॉकेट की इस मारक क्षमता को औपचारिक और इंटीगरेटेड कर एक फोर्स बनाना चाहती है. हालांकि इस प्रोजेक्ट पर काम काफी लंबे समय से चल रहा है. 

आधुनिक वॉरफेयर में रोल

जब हमारे मन में युद्ध की छवि उभरती है तो हमारा ध्यान परंपरागत युद्धों पर जाता है. जैसे टैंक, तोप, गोले, दोनों ओर डटी सेनाएं. लेकिन रॉकेट और मिसाइल वॉरफेयर इस जंग को आगे ले जाता है, जहां दुश्मन सामने नहीं बल्कि अपने घर में मौजूद है. अपने सेंटर पर मौजूद है और उसे वही ढेर किया जाता है. 

आधुनिक लड़ाइयों में बड़ी संख्या में सैनिकों के इस्तेमाल के बजाय लंबी दूरी के सटीक हथियारों पर जोर दिया जा रहा है. जैसा कि हाल की लड़ाइयों में देखा गया गया है. ईरान-इजरायल की लड़ाई हो या फिर रूस यूक्रेन की लड़ाई मिसाइलों, रॉकेट और ड्रोन ने लंबी दूरी से ही दुश्मन पर कहर ढाया है. 

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हाल के युद्धों में देखा गया है कि मिसाइलें 400-450 किमी से ज़्यादा दूरी पर किफायती और सटीक मार करती है. ईरान पर अमेरेकी हमले के दौरान ईरान ने यूएस से बदला लेने के लिए अपने अड्डे ही से सैकड़ों किलोमीटर दूर कतर में स्थित अमेरिकी एयरबेस पर हमला किया. 

दरअसल रॉकेट फोर्स गहरे हमलों, दुश्मन को रोकने और जॉइंट ऑपरेशंस को सपोर्ट करने में मदद करती हैं, भीषण लड़ाई की हालत में जबरदस्त प्रहार के लिए सेनाएं रॉकेट और मिसाइलों का एक साथ इस्तेमाल करती हैं. 

आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी इसी असर की बात अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर रहे थे. उन्होंने कहा कि हमने 120 किमी की रेंज वाले पिनाका सिस्टम का टेस्ट किया है. हमने कई और कॉन्ट्रैक्ट भी साइन किए हैं जो 150 किमी तक की रेंज का पता लगाएंगे और बाद में हम देखेंगे कि यह 300-450 किमी की रेंज तक पहुंच जाएगा. आपने प्रलय और ब्रह्मोस के बारे में भी सुना होगा.

आजकल के युद्धों में मिसाइल फोर्स स्टैंडऑफ क्षमताएं, न्यूक्लियर खतरों के खिलाफ बचाव और बराबर के टकराव में तेजी से जवाब देने की क्षमता देती हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि सैनिकों के हताहत होने की आशंका बहुत कम होती है.

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भारत के लिए क्यों जरूरी है रॉकेट फोर्स

भारत के लिए मिसाइल फोर्स क्यों जरूरी है इसका जवाब भारत की भू-रणनीतिक जरूरतों में छिपा हुआ है.

पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने भी कहा पिछले साल कहा था कि भारत को अपनी लंबी दूरी की मारक क्षमता को मजबूत करने के लिए एक डेडिकेटेड रॉकेट फोर्स बनाने की ज़रूरत है, उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध ने सटीक मिसाइल सिस्टम की अहम भूमिका को दिखाया है. उन्होंने खासकर भारत की उत्तरी सीमाओं के संदर्भ में, पारंपरिक मिसाइल या रॉकेट फोर्स बनाने के पीछे का कारण बताया.

उन्होंने कहा था कि हाल के संघर्षों और जो अभी चल रहे हैं, उनमें हमने लंबी दूरी की मिसाइलों, लंबी दूरी की तोपखाने का बहुत अच्छे असर के साथ इस्तेमाल देखा है." "वे न केवल आपको ज़्यादा रेंज देते हैं, बल्कि वे ज़्यादा सटीक भी होते हैं. इसलिए इन लंबी दूरी की तोपखाने या लंबी दूरी की मिसाइलों का होना ज़्यादा किफायती है."

भारत के दो असभ्य और झगड़ालू पड़ोसियों पाकिस्तान और चीन ने पहले ही रॉकेट फोर्स डिवीजन बना ली है. चीन ने 2015 में ही रॉकेट फोर्स बना लिया था. 

जबकि ऑपरेशन सिंदूर में मार खाने के बाद पाकिस्तान ने आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड (ARFC) के नाम से रॉकेट फोर्स बनाने की आधिकारिक घोषणा की. पाक ने यह घोषणा 13 अगस्त 2025 को की थी. पाकिस्तान ने यह फोर्स चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स (PLARF) की तर्ज पर बनाई गई है. 

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भारत के दो पारंपरिक प्रतिद्वंदियों के पास रॉकेट फोर्स हो जाने के बाद भारत इस फोर्स की जरूरत से इनकार नहीं कर सकता है.

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