ईंट-सीमेंट नहीं, अब मिट्टी और छप्पर के घर बना रहे हैं लोग, लौटा पुराना दौर

मिट्टी और छप्पर के घरों का यह पुनर्जन्म यह साबित करता है कि हर पुरानी परंपरा पिछड़ी नहीं होती. आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय वास्तुकला का यह मेल सस्टेनेबल लिविंग की दिशा में एक बेहतरीन कदम है.

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कंक्रीट के जंगल से सुकून की तलाश (Photo-Pexels) कंक्रीट के जंगल से सुकून की तलाश (Photo-Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:01 PM IST

एक दौर था जब गांवों में कच्चे मकान, मिट्टी और छप्पर वाले घरों में लोग रहते थे, जिसके पास पैसा आता, वह सबसे पहले अपना पक्का मकान बनवाता था, लेकिन आज  कंक्रीट के तपते जंगलों और प्रदूषण से परेशान होकर लोग अब वापस अपनी जड़ों की तरफ लौट रहे हैं.

आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच मिट्टी और छप्पर के घर एक बार फिर ट्रेंड में आ गए हैं. आज अमीर, सेलिब्रिटीज और पर्यावरण के प्रति जागरूक लोग लाखों रुपये खर्च करके ईंट-सीमेंट की जगह मिट्टी और बांस के आलीशान 'इको-लग्जरी' विला बनवा रहे हैं.

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रिपोर्ट्स बताती हैं कि पारंपरिक निर्माण सामग्री (जैसे सीमेंट और स्टील) वैश्विक कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग के लिए बड़े पैमाने पर जिम्मेदार हैं. इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण मानसिक शांति और प्रकृति से जुड़ने की चाह है. महानगरों के बंद फ्लैटों में रहने वाले लोग अब वीकेंड या रिटायर्मेंट के बाद के जीवन के लिए ऐसी जगहें चाहते हैं जो पूरी तरह प्राकृतिक और सांस लेने योग्य हों. यही वजह है कि बड़े-बड़े बिजनेसमैन और आर्किटेक्ट्स अब 'ग्रीन कंस्ट्रक्शन' या 'आर्टिसानल लिविंग' को अपना स्टेटस सिंबल बना रहे हैं.

मिट्टी और छप्पर के घर के बेमिसाल वैज्ञानिक फायदे

मिट्टी और छप्पर के घरों का सबसे बड़ा यूनीक सेलिंग पॉइंट इनका प्राकृतिक रूप से तापमान को नियंत्रित करना है. मिट्टी की मोटी दीवारें और सूखी घास का छप्पर बेहतरीन 'थर्मल इंसुलेटर' का काम करते हैं.  तपती गर्मियों में बाहर का तापमान चाहे 45°C पार कर जाए, लेकिन इन घरों के अंदर का तापमान 5 से 7 डिग्री तक कम रहता है, जिससे महंगे एसी चलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

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कड़ाके की सर्दियों में ये दीवारें बाहर की बर्फीली हवा को रोकती हैं और अंदर की गर्मी को बाहर नहीं जाने देतीं, जिससे घर प्राकृतिक रूप से गर्म रहता है, इसके अलावा, सीमेंट के मकानों की तरह इनमें सीलन नहीं होती, जिससे इन घरों में रहने वाले लोग सांस और त्वचा संबंधी एलर्जी से दूर रहते हैं.

आज के आधुनिक और पुराने घरों में क्या अंतर है?

आज जो मिट्टी और छप्पर के घर बन रहे हैं, वे पुराने जमाने जैसे कमजोर नहीं हैं. आजकल के आर्किटेक्ट्स पारंपरिक कला में आधुनिक इंजीनियरिंग का तड़का लगा रहे हैं, जिसे 'स्टेबलाइज्ड मड आर्किटेक्चर' कहा जाता है. अब मिट्टी में 5% से 7% चूना या स्टेबलाइजर्स मिलाए जाते हैं, जिससे मिट्टी पत्थरों जैसी मजबूत हो जाती है और भारी बारिश में भी नहीं बहती. घर बनाने में इस्तेमाल होने वाले बांस और लकड़ी को इको-फ्रेंडली केमिकल्स या साल्ट-वॉटर से ट्रीट किया जाता है, जिससे इनमें कभी दीमक या कीड़े नहीं लगते.

आधुनिक तकनीक के तहत छप्पर की सूखी घास पर एक विशेष पारदर्शी केमिकल की कोटिंग की जाती है, जिससे आग लगने का खतरा पूरी तरह खत्म हो जाता है.

मिट्टी का घर बनाने में कितना खर्च आता है?

मिट्टी और छप्पर के घरों का खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि आप उसे कितना साधारण रखना चाहते हैं या कितना लग्जरी लुक देना चाहते हैं, यदि आप स्थानीय कारीगरों और शुद्ध देसी सामग्री से निर्माण कराते हैं, तो इसकी लागत लगभग ₹800 से ₹1,200 प्रति वर्ग फुट आती है. अगर आप डिजाइनर आर्किटेक्ट्स, स्टेबलाइज्ड मड ब्लॉक्स, इंपोर्टेड या ट्रीटेड थैच और आधुनिक प्लंबिंग/इंटीरियर के साथ जाते हैं, तो यह खर्च ₹1,500 से ₹2,500+ प्रति वर्ग फुट तक जा सकता है.

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भले ही इसकी शुरुआती निर्माण लागत सामान्य ईंट-सीमेंट के बराबर लगे, लेकिन लॉन्ग टर्म में बिजली के बिल और कम मेंटेनेंस की वजह से यह बेहद किफायती साबित होते हैं.
 

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