अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के कारण पैदा हुए एलपीजी (LPG) आपूर्ति संकट के बीच दिल्ली के रेस्टोरेंट ने अपने मेनू और बुकिंग में कटौती कर दी है, और मुंबई के रेस्तरां मालिकों ने राजस्व में 20-30% की गिरावट दर्ज की है, ऐसे में एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि क्या रेस्तरां किराएदार, कोविड-19 (COVID-19) के समय की तरह, मकान मालिकों से किराए में छूट मांगने के लिए 'फोर्स मेज्योर प्रावधान' (Force Majeure Provision) का सहारा ले सकते हैं.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई के रेस्तरां मालिक इन दिनों दोहरी मार झेल रहे हैं. एक तरफ संकट की शुरुआत से उनकी कमाई में 20-30% की भारी गिरावट आई है, तो दूसरी तरफ बढ़ती लागत ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. महानगर गैस लिमिटेड (MGL) ने रेस्तरां मालिकों को ईमेल भेजकर सूचित किया है कि 9 मार्च से पाइप्ड नेचुरल गैस की दरें सामान्य से अधिक रहेंगी. हालांकि कंपनी ने नई कीमतों का खुलासा नहीं किया, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जारी व्यवधानों के कारण रेस्तरां को गैस की खपत में 20% कटौती करने की सलाह दी गई है.
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घाटे में हैं लोगों का धंधा
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान एलपीजी संकट के दौरान 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) क्लॉज लागू होने की संभावना कम है, जो कोविड-19 महामारी के समय सक्रिय हुआ था. इसका मुख्य कारण यह है कि युद्ध के चलते सप्लाई चेन प्रभावित होने और कमर्शियल गैस महंगी होने के बावजूद, रेस्तरां परिसर का उपयोग अभी भी संभव है और व्यवसाय चलाना कानूनी रूप से असंभव नहीं हुआ है.
अनुबंध कानून के तहत, ऐसी परिस्थितियां जो व्यवसाय को केवल अधिक खर्चीला या कम लाभदायक बनाती हैं, उन्हें 'आर्थिक कठिनाई' माना जाता है, न कि फोर्स मेज्योर. इसका सीधा अर्थ यह है कि मकान मालिक किराया माफ करने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य नहीं हैं, हालांकि मौजूदा व्यावसायिक वास्तविकताओं को देखते हुए वे आपसी सहमति से किराए की शर्तों पर फिर से बातचीत कर सकते हैं.
क्या रेस्तरां मालिकों को मिलेगा 'फोर्स मेज्योर' के तहत रेंट में डिस्काउंट?
फोर्स मेज्योर' का अर्थ एक ऐसी अप्रत्याशित घटना से है, जो अनुबंध की शर्तों को पूरा करना असंभव बना देती है. हालांकि भारतीय कानून में इस शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, लेकिन ऐसी स्थितियों से निपटने के सिद्धांत भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 32 और 56 में निहित हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि किसी घटना को 'फोर्स मेज्योर' माना जाएगा या नहीं, यह काफी हद तक व्यक्तिगत अनुबंधों की प्रकृति और उनमें इस्तेमाल की गई भाषा पर निर्भर करता है.
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विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा एलपीजी संकट को 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) नहीं माना जा सकता. कोविड-19 महामारी के दौरान, सरकार ने आपूर्ति श्रृंखला और आवाजाही में आए व्यवधान को देखते हुए आधिकारिक अधिसूचनाएं जारी की थीं, जिससे अनुबंधों में इस क्लॉज का उपयोग करना संभव हो गया था.
क्या मकान मालिकों को किराए में राहत देने के लिए मजबूर किया जा सकता है?
विशेषज्ञों का कहना है कि एक मकान मालिक किराएदार के व्यावसायिक जोखिम की भरपाई करने के लिए बाध्य नहीं है. किराया संपत्ति के उपयोग के बदले दिया जाता है, न कि किराएदार के मुनाफे में हिस्सेदारी के रूप में . यदि कोई रेस्तरां किराएदार इस आधार पर अदालत में किराया माफी की मांग करता है कि एलपीजी (LPG) बहुत महंगी या दुर्लभ हो गई है, तो अदालत द्वारा मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाए जाने की अत्यधिक संभावना है. संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) यह स्पष्ट करता है कि लीज या किराया समझौता केवल तभी निष्फल माना जाता है, जब वह संपत्ति स्वयं नष्ट हो गई हो या अपने इच्छित उपयोग के लिए स्थायी रूप से अनुपयुक्त हो गई हो.
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