India-US Trade Deal: भारत ने चार महीने में कैसे अमेरिका पर बनाया चौतरफा दबाव? फिर हो गई डील

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने सोमवार रात को भारत से व्‍यापार समझौता करने और टैरिफ को 50 फीसदी से कम करके 18 फीसदी करने का ऐलान किया, लेकिन ये अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे भारत की कुछ रणनीतिक कदम भी दिखाई देते हैं.

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्‍ट्रप‍ति डोनाल्‍ड ट्रंप. (Photo: File/ITG) भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्‍ट्रप‍ति डोनाल्‍ड ट्रंप. (Photo: File/ITG)

हिमांशु द्विवेदी

  • नई दिल्‍ली,
  • 03 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:05 PM IST

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) ने सोमवार रात को भारत पर टैरिफ घटकार 18 फीसदी करने का ऐलान किया. साथ ही ट्रेड डील पर भी दोनों पक्षों में सहमति बनने की बात कही. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया पर इस औप‍चारिक ऐलान का स्‍वागत करते हुए धन्‍यवाद किया.

अभी तक इस डील को लेकर कोई अधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है. हालांकि भारत की तरफ से भी कुछ बयान सामने आए हैं, जिसके बाद दोनों देशों के बीच डील लगभग फाइनल माना जा रहा है. 

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लेकिन कुछ सवाल अभी भी उठ रहे हैं कि ट्रंप ने अचानक टैरिफ कम करने का फैसला क्‍यों लिया? वो भी तब जब दोनों देशों के बीच ट्रेड डील को लेकर कोई स्‍पष्‍ट जानकारी सामने नहीं आ रही थी... क्‍या अमेरिका पर कोई दबाव था? 

यह समझने के लिए हमें कुछ महीने पहले देखना चाहिए, जब भारत ने एक के बाद कुछ ऐसे कूटनीतिक कदम उठाए, जिस कारण अमेरिका को जल्‍द से जल्‍द ट्रेड डील को लेकर ऐलान करना पड़ा, क्‍योंकि अमेरिकी कंपनियों को भी भारतीय मार्केट में दूसरे देशों से जल्‍दी एंट्री लेनी थी. अब आइए समझते हैं कि कैसे भारत ने कौन-कौन से रणनीतिक और कूटनीतिक कदम उठाया. 

1. BRICS देशों के साथ व्‍यापार नीति
जब अमेरिका ने भारत पर हैवी टैरिफ लगा दिया था, तब भारत ने चीन और रूस जैसे देशों से व्‍यापार और सहयोग पर चर्चा तेज कर दी और BRICS देशों के साथ इंटरनेशनल ट्रेड इंफ्रा बना लिया. भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की पहल को तेज किया गया, जिससे डॉलर के वर्चस्‍व को चुनौती मिली. 2026 ब्रिक्‍स समिट के दौरान इन देशों से व्‍यापारिक लेनदेन का हिस्‍सा बढ़ाया गया. ब्रिक्‍स देशों में हुए ये बड़े बदलाव अमेरिका और उसके आर्थिक नीतियों के लिए सही नहीं थे, क्‍योंकि इससे डॉलर के वर्चस्‍व को खतरा महसूस हुआ. 

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2. पुतिन का भारत दौरा और डिफेंस डील 
ब्रिक्‍स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद पुतिन का दिसंबर में भारत दौरा भी अमेरिका पर दबाव का कारण बना. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का 4-5 दिसंबर 2025 को भारत दौरे पर आए थे. इस दौरे के दौरान एनर्जी, डिफेंस और लॉजिस्टिक सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया गया था.पुतिन के इस दौरा ने अमेरिका को न सिर्फ संकेत दिया कि भारत रूसी साझेदारी से पीछे हटने वाला नहीं है, बल्कि अमेरिका की रणनीति को भी चुनौती मिली.

            

3. India-EU  व्‍यापार समझौता
जनवरी 2026 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच 'मदर ऑफ ऑडल डील्‍स' के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ. यह डील 20 सालों की बातचीत के बाद पूरा हुआ. इसे ग्‍लोबल मार्केट में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. यह डील भारत को अमेरिका के एक बड़े मार्केट की तुलना में एक अच्‍छे विकल्‍प के तौर पर भी देखा जाने लगा, जिसका मतलब था कि अमेरिका से भारत की निर्भरता लगभग समाप्‍त हो जाती. साथ ही भारत को अमेरिका से मिलने वाली टेक्‍नोलॉजी, डिफेंस और निवेश यूरोपीय यूनियन से मिलती, जो अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका हो सकता था. ऐसे में EU के साथ फ्री ट्रेड डील ने अमेरिका पर सबसे ज्‍यादा दबाव बढ़ाने का काम किया. 

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4. UAE से जुड़ी कूटनीति और एनर्जी डील 
भारत ने यूएई और मध्य पूर्व के साथ भी अपनी कनेक्टिविटी और ऊर्जा साझेदारी को मजबूत किया है. जनवरी 2026 में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति मोहम्‍मद बिन जायद अल नाहयान की भारत यात्रा ने ऊर्जा और आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाया. इस यात्रा में भारत-UAE के बीच ऊर्जा आपूर्ति, LNG समझौते और रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने की चर्चा हुई. 

इसके अलावा, अमेरिकी दबाव का एक और बड़ा कारण  World Economic Forum दावोस 2026 का वैश्विक मंच रहा, जहां पर व्यापार, टैरिफ, और वैश्विक आर्थिक नीतियों पर खुली बहस हुई. अमेरिका ने अपने टैरिफ दबाव को बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन कई देशों ने इसका कड़ा विरोध किया और व्‍यापार समझौते के साथ न्‍यायसंगत व्‍यापार नियमों पर जोर दिया.

 ये सभी ऐसे वजह रहे, जिसने अमेरिका को भारत से जल्‍द से जल्‍द ट्रेड डील करने के बारे में सोचने पर मजबूर किया. 

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