बिहार की सत्ता से नीतीश कुमार की सम्मानजनक विदाई! 2020 से लिखी जा रही थी स्क्रिप्ट, अब सामने आया रोडमैप

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की सम्मानजनक विदाई की पटकथा 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद ही लिखी जा चुकी थी. भाजपा और जेडीयू के शीर्ष नेतृत्व के बीच चरणबद्ध रणनीति के तहत उन्हें राज्यसभा भेजने का रोडमैप तैयार किया गया. स्वास्थ्य, सत्ता संतुलन और राजनीतिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए यह बदलाव किया गया, जिससे बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की जमीन तैयार हुई.

Advertisement
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया. (File Photo: PTI) बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया. (File Photo: PTI)

रोहित कुमार सिंह / शशि भूषण कुमार

  • पटना,
  • 05 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:02 PM IST

बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव की पटकथा अचानक नहीं लिखी गई, बल्कि इसकी तैयारी पिछले कई वर्षों से चल रही थी. सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सम्मानजनक विदाई का रोडमैप 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद ही तैयार हो गया था और समय के साथ उसे चरणबद्ध तरीके से अमल में लाया गया. 2020 के चुनाव में जेडीयू को सिर्फ 43 सीटें मिलने के बाद नीतीश कुमार खुद मुख्यमंत्री बनने के इच्छुक नहीं थे. लेकिन उस वक्त भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उनसे कहा कि चुनाव उनके नाम पर लड़ा गया है, इसलिए मुख्यमंत्री पद उन्हें ही संभालना होगा.

Advertisement

तभी यह तय हुआ कि कुछ समय बाद नीतीश की इच्छा के अनुसार उन्हें सम्मानजनक तरीके से सक्रिय राजनीति से अलग किया जाएगा. सूत्र बताते हैं कि दिल्ली दौरों के दौरान नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से भी इस विषय पर चर्चा की थी. इसके बाद धीरे-धीरे संकेत मिलने लगे- 2025 के बाद गृह विभाग का भाजपा के पास जाना, जेडीयू के भीतर सत्ता संतुलन का बदलना और भाजपा नेताओं का मजबूत होना. इस बीच, भाजपा ने रणनीतिक रूप से सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाकर नीतीश के साथ साये की तरह रखा.

यह भी पढ़ें: नीतीश के फैसले पर JDU में बवाल, कार्यकर्ताओं ने प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा का किया घेराव

नीतीश की 2024 में एनडीए में वापसी का मकसद लोकसभा चुनाव में फायदा और उनके सामाजिक आधार वोट बैंक को साधे रखना था. नीतीश कुमार की सेहत में गिरावट के साथ ही जेडीयू के कई शीर्ष नेताओं की नजदीकियां भाजपा से बढ़ती गईं. ललन सिंह के केंद्रीय मंत्री बनने और संजय झा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी के भीतर सत्ता केंद्र बदलता दिखा. सूत्रों के अनुसार, लगभग दो महीने पहले बिहार सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और जेडीयू नेताओं की शीर्ष नेतृत्व से बैठक में नीतीश कुमार के एग्जिट प्लान को अंतिम रूप दिया गया.

Advertisement

समर्थकों को संभालने के लिए उनके बेटे निशांत कुमार को राजनीति में लाने की चर्चाएं भी तेज की गईं. राज्यसभा चुनाव की घोषणा के बाद नीतीश कुमार तक स्पष्ट संदेश पहुंचा दिया गया था कि उन्हें उच्च सदन में भेजा जाएगा. पार्टी और परिवार के कई लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन नीतीश का जवाब एक ही था- 'मैंने भाजपा से वादा कर दिया है.' नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के साथ ही बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ माना जा रहा है.

यह भी पढ़ें: नीतीश कुमार: सोशलिस्ट सादगी से सुशासन के शिखर तक, 'पलटू' राजनीति के अजेय चाणक्य

ऑपरेशन नीतीश के तहत भाजपा ने बिना जल्दबाजी के धैर्यपूर्वक यह बदलाव किया. नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की बात सार्वजनिक होने के बाद पटना में जेडीयू कार्यालय के बाहर उनके समर्थकों का भावनात्मक उद्गार भी देखने को मिला. नीतीश समर्थकों ने जेडीयू के वरिष्ठ नेताओं का घेराव कर अपनी निराशा जाहिर की. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि नीतीश कुमार के बाद क्या भाजपा उनके सामाजिक आधार वोट बैंक को अपने साथ जोड़े रख पाएगी, या यह फैसला उसके लिए राजनीतिक जोखिम साबित होगा? 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement