आज की कहानी उस 'रस' की है जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है. कुछ इसे नया फ्यूल तो कुछ 'नशा' तक कहते हैं, लेकिन ये नशा किसी इंसान को नहीं, बल्कि आपकी गाड़ी और आने वाले समय में हवाई जहाज के इंजन को चढ़ने वाला है. आप सोच रहे होंगे कि क्या बात कर रहे हैं. तो बात ये है कि जिस पेट्रोल को आप अपने वाहन की टंकी में डलवाते हैं, वो अब सिर्फ तेल नहीं रह गया है. उसमें अब खेतों की खुशबू और गन्ने की मिठास घुल रही है. भारत सरकार ने एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है कि अब देश में E85 यानी 85 प्रतिशत इथेनॉल वाला पेट्रोल बेचने की तैयारी हो रही है.
आपको वो समय याद होगा जब पेट्रोल 60-70 रुपये लीटर हुआ करता था. आज तकरीबन सेंचुरी पार है. इसके कई कारण हैं, कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, खाड़ी देशों की लड़ाई, इजरायल-ईरान का तनाव और डॉलर का खेल. लेकिन भारत सरकार एक नई तैयारी में है. अब आपकी गाड़ी का तेल किसी रेगिस्तान से नहीं, बल्कि E85 और E100 इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल के रूप में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी, महाराष्ट्र के सोलापुर और कर्नाटक के खेतों से आएगा.
आज की इस विस्तृत रिपोर्ट में हम यही समझेंगे कि दुनिया भर में इथेनॉल ब्लेंडिंग की क्या स्थिति है. इसकी शुरुआत क्या है? क्या कोई देश वाकई में 85 प्रतिशत इथेनॉल पर गाड़ियां चला रहा है? ये फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां आखिर बला क्या हैं? और भारत के इस 'इथेनॉल क्रांति' से गांव के किसान, आपकी जेब, गाड़ियों के इंजन और आम जीवन पर क्या असर पड़ेगा. चलिए, इस इथेनॉल की 'महागाथा' की गहराई में उतरते हैं, क्योंकि ये सिर्फ फ्यूल बदलने की बात नहीं है, ये देश की अर्थव्यवस्था के कथित 'गियर' बदलने की कहानी है.
जब हम इथेनॉल ब्लेंडिंग की बात करते हैं, तो दुनिया की नजरें दो देशों पर टिक जाती हैं. ब्राजील और अमेरिका. ये दोनों देश ग्लोबल इथेनॉल प्रोडक्शन का लगभग 87.1 प्रतिशत हिस्सा कंट्रोल करते हैं. जहां अमेरिका मक्के (Corn) को फ्यूल में बदलता है, वहीं ब्राजील ने गन्ने (Sugarcane) के रस से अपनी एनर्जी सेफ्टी की एक अभेद्य दीवार खड़ी की है.
ब्राजील की कहानी 1970 के दशक के ग्लोबल तेल संकट से शुरू होती है. 1973 में जब तेल की कीमतों ने दुनिया को घुटनों पर ला दिया, तब ब्राजील ने महसूस किया कि उसकी 80 प्रतिशत तेल जरूरतें आयात पर टिकी हैं. इसी दबाव से जन्म हुआ 'Pro-Alcool' (ब्राजील सरकार का नेशनल प्रोग्राम) का, जिसे 1975 में लॉन्च किया गया. ब्राजील सरकार ने चीनी मिलों को इथेनॉल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, रियायती दरों पर कर्ज दिए और सरकारी तेल कंपनी 'पेट्रोब्रास' (PETROBRAS) के माध्यम से इथेनॉल की खरीदने लगीं. ब्राजील में आज स्थिति यह है कि वहां शुद्ध पेट्रोल (E0) बिकता ही नहीं है. 1976 से वहां पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना अनिवार्य है. यह ब्लेंडिंग समय-समय पर 10% से 27% के बीच बदलता रहता है. मौजूदा समय में ब्राजील में E27 (27% इथेनॉल और 73% पेट्रोल) की ब्लेंडिंग स्टैंडर्ड है.
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा इथेनॉल प्रोड्यूसर और एक्सपोर्टर है. 2016 तक अमेरिका ग्लोबल एक्सपोर्ट का तकरीबन 30% हिस्सा कंट्रोल कर रहा था. अमेरिका में इथेनॉल का मेन सोर्स मक्का है. वहां 'अल्टरनेटिव मोटर फ्यूल्स एक्ट 1988' के तहत फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक को बढ़ावा दिया गया. अमेरिका में E85 (85% एथेनॉल) का एक बड़ा नेटवर्क है, और वहां की सड़कों पर 2 करोड़ से अधिक फ्लेक्स-फ्यूल वाहन दौड़ रहे हैं.
ये तो रही ग्लोबल लेवल पर खड़े दो दिग्गजों की बात, अब समझते हैं कि आखिर फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल और उसका मैकेनिज़्म क्या है.
साधारण पेट्रोल इंजन और फ्लेक्स-फ्यूल इंजन को ऊपर से देखने पर आप शायद ही कोई अंतर कर पाएं, लेकिन इनके भीतर की दुनिया पूरी तरह अलग होती है. फ्लेक्स-फ्यूल वाहन (Flexible Fuel Vehicle) एक ऐसी मशीन है जिसका इंजन पेट्रोल और इथेनॉल के किसी भी ब्लेंडिंग पर चल सकता है. चाहे वो 20% इथेनॉल हो या 85% या फिर 100%. यानी ये इंजन इस तरह से डिज़ाइन किए जाते हैं जिन्हें किसी भी तरह के फ्यूल ब्लेंडिंग से कोई नुकसान नहीं होता है. बल्कि ये और बेहतर ढंग से परफॉर्म करते हैं.
इथेनॉल का केमिकल नेचर पेट्रोल से अलग होता है. इथेनॉल 'हाइग्रोस्कोपिक' (Hygroscopic) होता है, जिसका अर्थ है कि यह हवा से नमी सोख लेता है. इसके अलावा, इथेनॉल संक्षारक (Corrosive) होता है जैसे एसिड या क्षार. और रबर व प्लास्टिक के कुछ हिस्सों को गला सकता है. इसलिए फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों में इस ब्लेंडिंग को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष बदलाव किए जाते हैं.
ईंधन टैंक और पाइप: वाहन के फ्यूल टैंक को इस तरह से बनाया जाता है जिससे वो जल्दी डैमेज न हो. क्योंकि इथेनॉल कोरोसिव होता है. फ्यूल की पाइपों को एथेनॉल-प्रतिरोधी रबर या नायलॉन से बदला जाता है.
फ्यूल इंजेक्टर और पंप: इथेनॉल का ऊर्जा घनत्व (Energy Density) पेट्रोल से कम होता है, इसलिए इंजन को एक समान पावर जेनरेट करने के लिए अधिक फ्यूल की जरूरत होती है. इसके लिए हाई फ्लो वाले फ्यूल पंप और बड़े इंजेक्टर लगाए जाते हैं. इसिलिए कई बार पुराने वाहनों में E20 फ्यूल के इस्तेमाल के चलते उनके माइलेज कम होने की भी शिकायत मिलती रहती है.
इथेनॉल सेंसर (Ethanol Sensor): यह इस तकनीक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह सेंसर फ्यूल लाइन में लगा होता है और पलक झपकते ही पहचान लेता है कि पेट्रोल में कितना इथेनॉल मिला है. यह सूचना सीधे इंजन कंट्रोल मॉड्यूल (ECM) को भेजी जाती है. जिसके अनुसार इंजन के अंदर कम्बंशन प्रोसेस शुरू होता है.
इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल मॉड्यूल (ECM) कैलिब्रेशन: ECM से मिले मैसेज के आधार पर 'इग्निशन टाइमिंग' और 'फ्यूल इंजेक्शन' की मात्रा को तुरंत एडजस्ट करता है ताकि इंजन के कम्बंशन (दहन) की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती रहे.
जिन्हें नहीं पता उनके लिए: इंजन के अंदर कम्बंशन चेंबर (सिलिंडर) होता है, जिसमें एक तरफ से फ्यूल और दूसरी ओर से हवा (Air) का प्रवाह होता है. इनके बीच स्पार्क प्लग के जरिए आग लगाई जाती है जो लगातार जलती रहती है. ये एक तरह से भट्ठी की तरह काम करता है. इससे निकलने वाली एनर्जी ही पहियों को घुमाती है और वाहन चलता है.
इथेनॉल का इवैपोरेशन यानी वाष्पीकरण तापमान पेट्रोल से अधिक होता है. इसका मतलब है कि बहुत ठंड (15°C से कम) में इथेनॉल पर चलने वाली गाड़ी को स्टार्ट करने में परेशानी हो सकती है. ब्राजील में पुरानी गाड़ियों में इसके लिए एक छोटी अलग पेट्रोल टंकी दी जाती थी. मॉडर्न फ्लेक्स-फ्यूल इंजनों में 'हीटेड फ्यूल रेल' (Heated Fuel Rail) तकनीक का उपयोग होता है, जो फ्यूल को कम्बशन चैंबर में जाने से पहले ही गर्म कर देता है.
भारत में इथेनॉल की कहानी ने 2014 के बाद रफ्तार पकड़ी. इस साल तक इथेनॉल ब्लेंडिंग केवल 1.5-2% थी, जो 2025 तक बढ़कर 20% (E20) तक पहुंच गई. मौजूदा समय में भारत में बेचे जाने वाले पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल की ब्लेंडिंग होती है. सरकार ने पिछले साल दावा किया कि, भारत ने समय से पहले ही E20 फ्यूल का टार्गेट पूरा कर लिया. अब सरकार की नजर भविष्य पर है.
फिलहाल, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने 'सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स, 1989' में संशोधन के लिए एक ऐतिहासिक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया. इस ड्राफ्ट में पेट्रोल को दो कैटेगरी में बांटा गया है. अब इसे E10/E से बदलकर E10/E20 कर दिया जाएगा. इसमें आधिकारिक तौर पर E85 (85% इथेनॉल) और E100 (शुद्ध इथेनॉल) को भी शामिल किया गया है. इसी तरह बायोडीजल को B10 से बढ़ाकर B100 (100% बायोडीजल) किया जाएगा.
सरकार ने इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन को फिलहाल पब्लिक कमेंट के लिए जारी किया है. यानी आम लोग और इंडस्ट्री से जुड़े लोग इस मुद्दे पर अपनी राय दे सकते हैं. सभी सुझाव मिलने के बाद ही सरकार अंतिम फैसला लेगी.
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85-90% आयात करता है. ईरान-इजरायल युद्ध के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते होने वाली ऑयल सप्लाई बुरी तरह बाधित हुई है. इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में भी 1 डॉलर की बढ़ोत्तरी भारत के इंपोर्ट बिल में सालाना 16,000 करोड़ रुपये का बोझ डालती है. इथेनॉल भारत के लिए एक 'सुरक्षा कवच' की तरह काम कर सकता है.
इसके बारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते मार्च में संसद के बजट सत्र के दौरान अपने भाषण में कहा था कि, "संकट के इस समय में देश की एक और तैयारी भी बहुत काम आ रही है. पिछले 10-11 साल में इथेनॉल के उत्पादन और उसके ब्लेंडिंग पर बहुत बढ़िया काम हुआ है. एक दशक पहले तक पेट्रोल में केवल 1-2% तक इथेनॉल ब्लेंडिंग करते थें. लेकिन अब हम पेट्रोल में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग कर रहे हैं, जिसके कारण सालाना करीब साढ़े 4 करोड़ बैरल कम पेट्रोल इंपोर्ट करना पड़ रहा है."
दूसरी ओर केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने ऑटो इंडस्ट्री को पहले ही अलर्ट कर दिया है. उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित बसवर्ल्ड कॉन्क्लेव 2026 में बोलते हुए कहा कि, "आने वाले समय में इन ट्रेडिशनल फ्यूल (पेट्रोल-डीजल) पर चलने वाली गाड़ियों का कोई भविष्य नहीं है." गडकरी ने अपील की कि वाहन कंपनियां जल्द से जल्द बायोफ्यूल और अन्य वैकल्पिक फ्यूल की तरफ शिफ्ट करें. उनका कहना है कि पेट्रोल और डीजल न सिर्फ महंगे हैं बल्कि ये देश के लिए गंभीर समस्या भी बनते जा रहे हैं.
भारत की कार और बाइक निर्माता कंपनियां अब केवल पेट्रोल के भरोसे नहीं बैठी हैं. सरकार के संकेतों के बाद कई कंपनियों ने अपने फ्लेक्स-फ्यूल मॉडलों पर काम करना शुरू कर दिया है. हाल के दिनों में इन कंपनियों ने अपने फ्लेक्स-फ्यूल वाले वाहनों के प्रोटोटाइप को शोकेस भी किया था. जिसमें मारुति सुजुकी, टोयोटा, टीवीएस मोटर्स और टाटा मोटर्स जैसे दिग्गज ब्रांड शामिल हैं.
Toyota Innova Hycross FFV: टोयोटा ने अपनी मशहूर एमपीवी इनोवा को दुनिया के पहले 'इलेक्ट्रीफाइड फ्लेक्स-फ्यूल' वाहन के तौर पेश किया है. यह न केवल E85 तक के फ्यूल पर चल सकता है, बल्कि इसमें हाइब्रिड तकनीक भी है, जिससे माइलेज की कमी को पूरा किया जा सके.
Maruti Suzuki WagonR, Fronx: मारुति ने अपनी लोकप्रिय हैचबैक कार वैगन-आर का फ्लेक्स-फ्यूल प्रोटोटाइप डेवलप किया है. जिसे कंपनी ने बतौर कॉन्सेप्ट बीते भारत मोबिलिटी ग्लोबल एक्सपो में भी शोकेस किया था. ये कार E20 से लेकर E85 के किसी भी ब्लेंडिंग फ्यूल पर आसानी से दौड़ सकती है. इसके अलावा ग्लोबल लेवल पर कंपनी ने Fronx के फ्लेक्स फ्यूल मॉडल को भी पेश किया है.
Tata Punch, Safari: टाटा मोटर्स ने भी हाल ही में 'पंच' का फ्लेक्स-फ्यूल वर्जन शोकेश किया था. जो 1.2 लीटर इंजन के साथ E85 से E100 ब्लेंडेड फ्यूल को सपोर्ट करता है. हालांकि इन सभी वाहन निर्माताओं ने अभी इन तकनीकी डेवलपमेंट और स्पेसिफिकेशन के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की है. लेकिन उम्मीद है कि, ये वाहन बेहतर माइलेज और पावर देंगे.
TVS Apache RTR 200 Fi E100: टीवीएस ने साल 2019 में भारत की पहली इथेनॉल -बेस्ड मोटरसाइकिल लॉन्च की थी. इस बाइक की शुरुआती कीमत 1.20 लाख रुपये है. इसमें 197.75 सीसी का इंजन दिया गया है जो 21 PS की पावर और 18.1 Nm का टॉर्क जेनरेट करता है. डबल डिस्क ब्रेक और एडवांस फीचर्स से लैस इस बाइक का वजन 152 किग्रा है.
Bajaj Pulsar NS160 Flex-Fuel: बजाज ने भी सितंबर 2024 में अपने मशहूर बाइक पल्सर का फ्लेक्स-फ्यूल प्रोटोटाइप शोकेस किया था. बजाज का मानना है कि इथेनॉल बाइक से परिचालन लागत में 50% तक की कमी आ सकती है. ये बाइक 100 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल पर भी दौड़ सकती है. हालांकि अभी इसे कमर्शियली बिक्री के लिए लॉन्च नहीं किया गया है.
Honda CB300F FlexTech: होंडा ने अक्टूबर 2024 में अपने पहले फ्लेक्स फ्यूल बाइक को बिक्री के लिए लॉन्च किया था. इसकी शुरुआती कीमत 1.70 लाख रुपये है. इस बाइक में 293.53 सीसी सिंगल सिलिंडर इंजन का इस्तेमाल किया गया है, जो E85 फ्यूल पर आसानी से चल सकता है. ये इंजन 24.5 bhp की पावर और 25.9 Nm का टॉर्क जेनरेट करता है.
वाहनों में इथेनॉल के प्रयोग को लेकर सबसे बड़ी चुनौती 'एनर्जी डेंसिटी' को लेकर है. प्योर पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल में लगभग 33% कम ऊर्जा होती है. इसका मतलब है कि एक ही दूरी तय करने के लिए इंजन को अधिक इथेनॉल जलाना पड़ेगा. इसके लिए आपको माइलेज का गणित और कॉस्टिंग भी समझन होगा.
जब आप E85 फ्यूल का इस्तेमाल करते हैं, तो आपकी गाड़ी के माइलेज में 25% से 30% तक की गिरावट आ सकती है. वैज्ञानिक रूप से, 1 गैलन (3.7 लीटर स्टैंडर्ड) पेट्रोल में जितनी एनर्जी होती है, E85 में उसका केवल 73% से 83% ही होता है. हालांकि, इथेनॉल का ऑक्टेन नंबर (Octane Number) अधिक होता है, जो इंजन के 'नॉक' रेजिस्टेंस को बढ़ाता है और टर्बोचार्ज्ड इंजनों में बेहतर परफॉर्मेंस दे सकता है.
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी तकरीबन हर मंच से इथेनॉल के प्रयोग को बढ़ावा देने की बात करते रहे हैं. उन्होंने कई मौकों पर कहा है कि, इथेनॉल ब्लेंडिंग में इजाफा करना फ़्यूल को सस्ता करेगा. हालांकि, एक्सपर्ट का ये मानना है कि, यदि इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल की कीमतों को कम नहीं रखा गया तो माइलेज के चलते होने वाला नुकसान इसे पूरी तरह प्रचलन में आने से रोक सकता है. मौजूदा समय में इथेनॉल पर केवल 5% GST लगता है, जबकि पेट्रोल पर भारी वैट (VAT) और उत्पाद शुल्क है. यदि सरकार इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल की कीमतों को कम से कम रखती है तभी इसका फायदा मिलेगा.
भारत सरकार ने जबसे देश में इथेनॉल प्रोग्राम को शुरू किया है, तक से लगातार किसानों के हित की बात की जा रही है. इथेनॉल के जरिए किसानों को अन्नदाता से उर्जादाता बनाने की कवायद हो रही है. इंडिया का इथेनॉल प्रोग्राम 'गन्ने' पर टिका है. भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक है. जब चीनी की वैश्विक कीमतें गिरती हैं या उत्पादन सरप्लस होता है, तो मिलों के पास किसानों को भुगतान करने के लिए पैसा नहीं होता. इथेनॉल ने चीनी मिलों को एक नया बाजार दिया है. देश की चीनी मिलें अब गन्ने के रस और शीरे (Molasses) से सीधे इथेनॉल बना रही हैं. इससे मिलों की लिक्विडिटी बढ़ी है और किसानों को भुगतान समय से होने लगा है.
इस बारे में हमारे सहयोगी किसान तक के एडिटर ओम प्रकाश का कहना है कि, "ये कोई अहसान थोड़े ही है, कि सरकार किसानों को उनके मेहनत का भुगतान समय पर कर रही है. ऐसा किसी भी रूल बुक में नहीं लिखा है कि, आप देर से पेमेंट करेंगे." शुरुआत में देश के इथेनॉल प्रोग्राम पूरी तरह गन्ने पर बेस्ड था, लेकिन पिछले साल ये मक्के की तरफ शिफ्ट हुआ. जिसके बाद सरकार के दिशा निर्देश के बाद किसानों ने मक्के का प्रोडक्शन बढ़ा दिया.
ओम प्रकाश की एक रिपोर्ट बताती है कि, अप्रैल 2023 में फिक्की के एक कार्यक्रम में तत्कालीन कृषि सचिव मनोज आहूजा ने कहा था कि इथेनॉल प्रोडक्शन और पोल्ट्री उद्योग की मांग को पूरा करने के लिए भारत को अगले पांच वर्षों में मक्का उत्पादन में 10 मिलियन टन की वृद्धि करने की जरूरत है. 34 मिलियन टन से बढ़ाकर 44-45 मिलियन टन करना पड़ेगा. जिसके बाद किसानों ने सरकार की बात मानते हुए प्रोडक्शन को 43.4 लाख टन तक बढ़ा दिया. लेकिन ऐन वक्त सरकार ने अपने पॉलिसी में बदलाव किया और इथेनॉल प्रोडक्शन को राईस यानी चावल की तरफ मोड़ दिया. जिसका नतीजा हुआ कि, किसानों को 2400 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) वाला मक्का महज 1200 से 1600 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेचना पड़ा.
पिछले साल तक इथेनॉल प्रोडक्शन में मक्के की अहम भूमिका रही. लेकिन अब सरकार चावल ने इथेनॉल बनाने की तैयारी में है. ओम प्रकाश बताते हैं कि, केवल 1 किग्रा चावल के प्रोडक्शन (खेत से आपकी थाली तक पहुंचने) में तकरीबन 3,000 लीटर से 5,000 लीटर (अलग-अलग वेरायटी के अनुसार) पानी खर्च होता है. वहीं 1,000 किग्रा चावल से तकरीबन 427 से 470 लीटर इथेनॉल बनता है. यानी 2.5 किग्रा चावल को प्रोसेस करने के बाद इससे 1 लीटर इथेनॉल बनाया जाता है. इसके अलावा चावल से 1 लीटर इथेनॉल बनाने के लिए 10,790 लीटर की जरूरत होती है. यानी महज एक लीटर इथेनॉल के लिए ही आपको कई हजार लीटर पानी बर्बाद करना पड़ता है.
सरकार इथेनॉल के प्रोडक्शन को लेकर तमाम दावे करते रही है. लेकिन किसान अभी भी भुगतान में देरी की शिकायत करते हैं. चीनी मिलों का लाभ तो बढ़ा है, लेकिन क्या वो लाभ छोटे किसानों तक पूरी तरह पहुँच रहा है, यह एक नीतिगत चुनौती बनी हुई है. बहरहाल, इथेनॉल को लेकर सरकार की तैयारियां जोरों पर हैं और फेज़्ड मैनर में ही सही लेकिन सरकार कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ाने में पूरजोर कोशिश में लगी है.
आर्थिक लाभ: इथेनॉल ने भारत को 1.4 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद की है.
तकनीकी तैयारी: भारतीय ऑटोमोबाइल कंपनियां फ्लेक्स-फ्यूल इंजन बनाने में सक्षम हैं, लेकिन उन्हें क्लीयर पॉलिसी और कर प्रोत्साहन की जरूरत है.
एनवायरमेंट बैलेंस: इथेनॉल से उत्सर्जन तो कम होता है, लेकिन पानी की खपत और खाद्य सुरक्षा के मुद्दों को दरकिनार नहीं किया जा सकता.
यूजर एक्सेप्टेंस: E85 तभी सफल होगा जब इसकी कीमत माइलेज के नुकसान की भरपाई कर सके.
भारत का इथेनॉल की ओर यह झुकाव केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक मजबूरी और अवसर दोनों है. वैश्विक अशांति के दौर में 'एनर्जी इंडिपेंडेंसी' बहुत जरूरी है. इसकी बानगी हमने हाल ही में पश्चिमी एशिया में चल रहे यु्द्ध में देखी है. हजारों मील दूर गिर रहे बम, मिसाइल और ड्रोन वार का असर भारत की सड़कों और यहां तक की 'रसोई घर' तक पहुंच गया. लेकिन इथेनॉल का रास्ता इतना आसान भी है. जिस मुकाम को हासिल करने में ब्राजील को 50 साल लगे, भारत उसे 10 साल में हासिल करने की कोशिश कर रहा है.
तो ये थी एथेनॉल और फ्लेक्स-फ्यूल की पूरी रामकहानी. उम्मीद है कि अगली बार जब आप अपने वाहन में पेट्रोल भरवाने जाएंगे, तो आप केवल मीटर नहीं देखेंगे, बल्कि पेट्रोल के उस मिश्रण को भी महसूस करेंगे जिसमें भारत के खेतों की मिट्टी की खुशबू मिली हुई है.
अश्विन सत्यदेव