scorecardresearch
 

हिंदी दिवस विशेष: बाज़ार की हिंदी बनाम हिंदी का बाज़ार

आजादी के पचहत्तर साल बाद और संविधान लागू होने के इकहत्तर साल बाद भी क्या हम हिंदी को रोजगार के योग्य बना पाए हैं. इसका एक उत्तर हां बनता है दूसरा नहीं भी

अपनी लाज और धार बचाने की कोशिश में हिंदी अपनी लाज और धार बचाने की कोशिश में हिंदी

हमारे देश की राजभाषा हिंदी है तथा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल अन्य 22 भारतीय भाषाओं के साथ देश भर के अनेक राज्यों में बोली जाती है. दुखद तथ्य यह है कि देश की राजभाषा होते हुए भी जब हिंदी की स्थिति ही दयनीय है तो अन्य प्रादेशिक भाषाओं का भला क्या कहना. वे अपने सीमित भूगोल में सिमटी हैं तथा केवल स्थानीय संभाषण, संपर्क, संप्रेषण आदि पहलुओं को छोड़ कर बाजार में उनकी उपयोगिता बेहतर नहीं है. इसीलिए अपने प्रदेश की भाषा में पारंगत होकर भी कोई न तो संघ की सेवाओं के योग्य बन पाता है न ही नौकरी के बाजार में उसकी कोई बहुत कीमत है. ऐसे में देश की राजभाषा होते हुए भी हिंदी की आज क्या स्थिति है इससे कोई अनभिज्ञ नहीं है. हिंदी-हिंदी की रटंत बहुत है किन्तु हिंदी में न तो उचित रोजगार है न पर्याप्त संसाधन. अकारण नहीं कि हिंदी के एक कवि ज्ञानेन्द्रपति कहते हैं, ''हिंदी की गाय को दुहने वाले ज्यादा हैं, खिलाने वाले कम."
सितंबर का महीना आ गया है, ऐसा इसलिए भी लगता है कि इसी महीने कहीं हिंदी माह, कहीं हिंदी पखवाड़ा व कहीं हिंदी सप्ताह के आयोजन किए जाते हैं. जगह-जगह सरकारी कार्यालयों के सामने इस आशय के बैनर लगा कर एक माहौल बनाने का अभियान चलाया जाता है. क्या केंद्र, क्या राज्य, क्या विद्यालय हर तरफ हिंदी के नाम पर कई तरह की प्रतियोगिताओं से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्न होते हैं. पर इससे उलट हिंदी का बाजार भाव क्या है या बाजार में हिंदी की क्या स्थिति है यह विचारणीय हो उठता है.
आजादी के 75 वर्ष और हिंदी
आजादी के पचहत्तर साल बाद और संविधान लागू होने के इकहत्तर साल बाद भी क्या हम हिंदी को रोजगार के योग्य बना पाए हैं. इसका एक उत्तर हां बनता है दूसरा नहीं भी. क्योंकि जहां तक हिंदी भाषी राज्यों का प्रश्न है, वहां पढ़ाई का माध्यम हिंदी है, जहां बच्चों के हाथ हिंदी में तंग होते हैं. वे हिंदी माध्यम से पढ़ कर भी एक आवेदन शुद्ध हिंदी में नहीं लिख सकते. हिंदी पढ़ा लिखा अध्यापक वर्ग जिसमें शिक्षा मित्र जैसे संविदायुक्त अध्यापक हैं, वे भी न तो हिंदी का व्याकरणिक ज्ञान दे पाते हैं न भाषा में विद्यार्थियों को दक्ष बना पाते हैं. सो अधजल गगरी की तरह हिंदी का ज्ञान छलकता तो है पर उसकी कोई उपयोगिता नहीं होती. जब हिंदी में ही बच्चों का हाथ तंग है तो उनके अंग्रेजी ज्ञान का भला क्या कहना. वह तो ऐसे इलाकों में फारसी की तरह है. दुर्लंघ्य और अभेद्य. रोजगार की गारंटी के बिना भाषा वैसी ही है जैसे बिना रोशनी के लालटेन.
सो ऐसे बच्चे आगे चल कर न अच्छे भाषा के अध्यानपक बन पाते हैं न अपनी हिंदी के सहारे कोई रोजगार सृजित कर पाते हैं. वे यदि भाषा के स्तर पर माध्यमिक स्त‍र तक ठीक से उसके बहुविध उपयोग से परिचित हो जाएं तो निश्चय ही वे कुछ रोजगार जुटा सकते हैं किन्तु देश भर में कुछ विश्वविद्यालयों, कॉलेजों व विद्यालयों की बात छोड़ दी जाए तो हिंदी के अच्छे अध्यापक आज भी नहीं हैं जो आपको हिंदी को रोजगारपरक भाषा के रूप में विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करने का बीड़ा उठा सकें. निश्चय ही यदि वे ऐसा कर सकते तो हिंदी भाषा के आधार पर ही अनुवाद, संपादन, पत्रकारिता, वीडियो पत्रकारिता, फिल्म या वृत्त चित्र निर्माण, फिल्मों में गीत लेखन, रेडियो के लिए जिंगल्स लेखन, रेडियो धारावाहिक एवं टेलीविजन धारावाहिक पटकथा लेखन, संवाद लेखन, ध्वनि/ संवाद संयोजन, संपादन, आवाज संयोजन, साहित्यिक अनुवाद, भाषाई अनुवाद, विज्ञापन लेखन, शब्द संशोधन, विज्ञापन चलचित्र निर्माण आदि की दक्षता हासिल कर किसी न किसी रोजगार से जुड़ सकते थे.
आज के दौर में जब वेब सीरीज का बोलबाला है, जरा सा किस्से कहानी में उस्ताद लेखक वेब सीरीज के लेखन में दक्ष हो सकता है और अच्छा खासा पैसा कमा सकता है. इसके फिल्मांकन की प्रक्रिया भी कम दुरूह है. पुस्तक प्रकाशन का बाजार हर वक्त है, जहां साल भर कंपोजिंग, प्रूफ रीडिंग चलती रहती है. हिंदी में दक्ष व्यक्ति आसानी से डीटीपी प्रक्रिया के जरिए ही रोजमर्रा का खर्चा निकाल सकता है तथा परिवार चला सकता है. आज बड़े से बड़े प्रकाशकों के पास अच्छे संपादक व अनुवादक नहीं हैं, जो अच्छी पुस्तकें संपादित कर सकें, लिहाजा बड़े प्रकाशनों से आई किताबें भी भाषाई अराजकता व अशुद्ध मुद्रण का शिकार देखी जाती हैं.

बाजार में हिंदी
अमूमन हिंदी भाषी व अर्धहिंदी भाषी इलाकों में बोलचाल की भाषा हिंदी ही है या मिली-जुली. पर इस हिंदी से बोलचाल के अलावा कोई रोजगारपरक फायदा नहीं उठाया जा सकता. हिंदी माध्यम से उच्चस्तर तक पढ़े-लिखे विद्यार्थियों को अमूमन वह आत्मविश्वास हासिल करने में कठिनाई होती है, जो आत्मविश्वास इंटर तक अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा लिखा बच्चा हासिल कर लेता है तथा इंजीनियरिंग, मेडिकल, अध्‍यापन या अन्य प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षाओं के प्रति गंभीर हो जाता है. भाषाई शिक्षण का जहां तक ताल्लुक है, आज जितनी संख्या में लोग भाषाओं में पढ़ाई कर रहे हैं उन्हें एमए या पीएचडी कर लेने तथा नेट की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने पर भी स्थायी नौकरी मिलनी मुश्किल जान पड़ती है. इधर पिछले कुछ दशकों से जब से मुक्त बाजार और उदारीकरण का दौर शुरू हुआ है, मीडिया का बाजार भी काफी आकर्षक दिखता है पर इस क्षेत्र में भी कोई खास उछाल या इनटेक नहीं है. जिस संख्या में पूरे देश में पत्रकारिता, वेब जर्नलिज्म, मीडिया पाठ्यक्रमों की पढ़ाई हो रही है तथा छात्र पास आउट होकर निकल रहे हैं उतनी संख्या में उन्हें जॉब आफर नहीं हो रहा है. ऐसे पाठ्यक्रमों के लिए कैंपस सिलेक्शन भी एक समस्या है. लिहाजा डिग्री होने के बावजूद छात्र नौकरी ढूंढ़ता रह जाता है. इधर कई समाचार पत्रों ने कोरोना के चलते नौकरियों में छंटनी की है तथा वेब चैनलों पर परोसी जा रही सामग्री का कोई उचित भुगतान लेखक को नहीं होता. ऐसे में पत्रकारिता में सहयोजित होने के बाद भी उपयुक्त वेतन की कोई गारंटी नहीं है.
हाल के दिनों में कोरोना काल में ही मुंबई में रह रहे फिल्म, पटकथा, संवाद, अनुवाद, डबिंग, संपादन या वायसओवर करने वाले कलाकारों को काफी दिक्कत का सामना करना पड़ा. यों भी कितने चरित्र अभिनेताओं के पास रेगुलर काम नहीं आता. उन्हें अन्य बहुतेरे काम करने होते हैं जिससे उनकी गुणवत्ता प्रभावित होती है.

हिंदी का बाजार
हिंदी या उसकी जननी संस्कृत को पढ़ कर क्या हुआ जा सकता है, यह सवाल आज उठ रहा है. जिस पवित्रता के साथ हम हिंदी का गुणगान या कीर्तन करते हैं उसमें एमए, पीएचडी कर जीवन के तीस वर्ष गंवा देने पर भी रोजगार की गारंटी नहीं है. संस्कृत का हाल मदरसों से भी बदतर है. विद्यालय की छत है तो पानी टपकता है. खिड़कियां टूटी हैं, ऐसे ही संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों के हालात हैं. ऐसे में हिंदी व संस्कृतत में डिग्री मिल भी जाए तो हर विद्यार्थी न तो पढ़ाने योग्य हो पाता है न उसकी सहज अभिरुचि भाषा में होती है. गांव कस्बे के स्तर पर पत्र-पत्रिकाएं भी नहीं जातीं. जो जाती हैं वे बस ह्वीलर तक महदूद होती हैं. वहां भी बिकाऊ बाजारू साहित्य ही बिकता है. गांव कस्बे के विद्यालयों में अच्छे पुस्तकालय तक नहीं हैं, वहां इसके लिए पर्याप्त बजट ही नहीं है तो कहां से स्तरीय शोध हो. बड़े शहरों के पुस्तकालय भी जीर्णशीर्ण हालत में हैं. रखरखाव पहले जैसा नहीं रहा. उसके सदस्यों की संख्या प्रतिदिन घटती जाती है. पढ़ने लिखने की ललक कम हो रही है. जाहिर है जब लिखने छपने का पैसा ही नहीं मिलना तो कोई क्यों कर लिखे. हिंदी का अध्ययन, अध्यापन ऐसा है कि हिंदी प्रदेशों में लाखों विद्यार्थी हिंदी भाषा में फेल हो रहे. ऐसे में हिंदी के हालात कैसे सुधरेंगे यह चुनौती शिक्षा व्यवस्था के सम्मुख है. हिंदी के इसी बदतर हालात को देखते हुए देश में यहां तक कि हिंदी प्रदेशों में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की शुरुआत हुई. हिंदी भाषी प्रदेशों में मातृभाषा माध्यम से शिक्षा देने की शिक्षा नीति के बावजूद देश में गली-गली में अंग्रेजी और कान्वेंट स्कूल पनपे जो न तो अंग्रेजी सही तरीके से सिखा पाए न हिंदी का माहौल पैदा कर सके.

तकनीकी कौशल नहीं
इस तरह भाषा ज्ञान तो प्रभावित हो ही रहा, बच्चा जब तक किसी व्यवसायिक पाठ्यक्रम में दक्ष नहीं होता केवल भाषाई दक्षता के आधार पर उसे नौकरी नहीं हासिल होती. उच्च शिक्षा का जहां तक ताल्लुक है, इंजीनियरिंग, मेडिकल, विज्ञान, वाणिज्य, सीए, सीएस, फैशन डिजाइनिंग आदि की पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी है. यहां तक आते-आते विद्यार्थी की सीखी हुई हिंदी केवल बातचीत के लिए काम आती है, उसे इंटरव्यू में सम्मिलित होने के योग्य अंग्रेजी बोलनी सीखनी पड़ती है. उतनी भाषा जरूरी है जितने में वह इंटरव्यू का सामना कर सके. बाकी का तकनीकी ज्ञान तो अनिवार्य है ही. इसलिए आप कितनी भी भाषाई दक्षता रखते हों, बिना तकनीकी या विषय ज्ञान के, किसी हूनर आधारित नौकरी के योग्य नहीं हो सकते. कहने के लिए हिंदी समाज के हर तबके तक फैल चुकी है पर बिना अंग्रेजी के सारी तालीम अधूरी मालूम होती है. गांवों कस्बों के लाखो बच्चे तकनीकी कौशल के बावजूद अंग्रेजी न बोल पाने के कारण अपने को अच्छी नौकरियों के लिए प्रस्तुत नहीं कर पाते. प्रशासनिक सेवाओं में इक्का-दुक्का छात्र हिंदी विषय या हिंदी माध्यम से ऐसी परीक्षाओं में बैठते हैं. हिंदी में परीक्षा व इंटरव्यू दोनों का विकल्प होने के बावजूद उम्मीदवार अंग्रेजी का ही चयन करते हैं. क्योंकि अपने तकनीकी कौशल के बारे में वे हिंदी में बता पाने में असमर्थ होते हैं.

हिंदी में नौकरियां नहीं
हिंदी में नौकरियां लगभग नहीं के बराबर हैं. अकादमिक जगत थोड़ा बहुत बचा है, पर वहां भी यह अब सिमट रही है. हिंदी अध्यापक के विज्ञापन कितने कम आते हैं क्योंकि अब भाषाई अध्यापक कम तकनीकी कौशल वाले अध्यापक ज्यादा चाहिए. धीरे-धीरे परंपरागत सामान्य ज्ञान, विज्ञान विषय में पढ़ने वाले विद्यार्थी बड़ी कक्षाओं तक में कम आ रहे हैं. वे बीएससी, एमएससी करके क्या करें जब ऐसा करके नौकरी नहीं है. जबकि बीटेक, एमटेक, एमएस, एमबीए करने वाले छात्रों के पास नौकरियों के आफर तमाम होते हैं. हालांकि अब बीटेक विद्यार्थियों के लिए भी नौकरियों के लाले हैं. हिंदी में परास्नातक एवं स्नातकोत्तर तक अंग्रेजी उत्तीर्ण विद्यार्थियों के लिए अनुवादक व हिंदी अधिकारी की नौकरियां थीं. पर इधर कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में भी गिरावट या गतिरोध आया है. जगहें कम रिक्त हो रही हैं अथवा राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय के मानक के अनुसार पदों का सृजन नहीं किया गया है, जिससे इन नौकरियों में भी अब खपत कम हो रही है. आकाशवाणी व दूरदर्शन में पत्रकारिता डिग्रीधारी अथवा संपादन अनुवाद अनुभव रखने वालों या प्रसारण योग्यता के आधार पर प्रसारण अधिशासी, कार्यक्रम अधिशासी या प्रोड्यूसर की नौकरियां निकलती थीं, जो शायद दशकों से नहीं निकली हैं. संविदा आधार पर काम चलाया जा रहा है. इस बीच दूरदर्शन व आकाशवाणी जैसे चैनल पिट से गए हैं. कोई देखना नहीं चाहता ऐसे शाकाहारी तरीके से या फिर सरकार की जोहार मुद्रा में कार्यक्रम चलाए जाते हैं. निजी चैनलों में हिंदी प्रसारक, एंकर, संपादक के काम हैं, रिपोर्टर के भी, पर वहां की सेवा शर्ते बहुत आसान नहीं हैं, काम का दबाव सर्वाधिक है. दूसरे कमाऊ चैनल होने के नाते सारा ध्यान कार्यक्रमों की गुणवत्ता पर कम राजस्व अर्जन पर ज्यादा होता है. विज्ञापक का ध्यान रखना होता है. पर यह अवश्य है कि चैनलों में विशेषज्ञता प्राप्त चैनलों के पास थीम का वैविध्य है जिसके लिए अनुवाद, डबिंग, एडिटिंग एवं प्रस्तुतीकरण हेतु एंकर या नैरेटर और वाइसओवर के काम के लिए योग्य आदमियों की हर वक्त मांग रहती है पर इसके बावजूद हिंदी में नौकरियों का टोटा है.
एक जमाने में पत्रकारिता एक मिशन था बड़े औद्योगिक घरानों के लिए. तमाम साहित्यिक व विचार पत्रिकाएं निकलती थीं, जिनमें काफी लोग सहयोजित किए गए पर धीरे-धीरे कम विज्ञापन वाली पत्रिकाएं बंद कर दी गयीं. छोटे, मध्यमवर्गीय हिंदी अखबारों के पास विज्ञापनों की आमद कम होने से वे रस्म अदायगी के लिए निकलने लगे. इलाकाई अखबारों में मुफ्त में खबर मिल जाए, मुफ्त में आलेख, इस पर बल दिया जाने लगा या नाम मात्र का पारिश्रमिक देय होता था, लिहाजा भाषाई पत्रकारिता के क्षरण के ये दिन भाषा जानकारों के लिए भी भारी पड़े हैं. इसमें अब भविष्य नहीं बचा.
अब विपणन का क्षेत्र लें. हर क्षेत्र में एमबीए की नई खेप आ रही है. अच्छे प्रबंध संस्थानों के छात्रों को अच्छा पैकेज है पर छोटेमोटे संस्‍थानों के एमबीए को बीस हजार की नौकरी भी उपलब्ध नहीं है. ये एमबीए भी हिंदी बोलना पसंद नहीं करते न ही अंग्रेजी में ही कमांड रखते हैं. दो लाइन अंग्रेजी बोलकर हिंदी के ट्रैक पर आ जाते हैं. ऐसे में हिंदी में विपणन कला भी मुहल्ले की दुकानदारी तक सीमित हो चुकी है. शोध, उच्च-अध्ययन, अध्यायन में नवाचार के सारे उपक्रम अंग्रेजी में सुलभ हैं. यह है हिंदी की दूकानदारी. पाठ्यक्रमों की हालत यह है कि सोशल वर्क, जिसका अर्थ समाज कार्य है यानी सरल अर्थों में समाज सेवा पर इसकी सारी अवधारणा पश्चिम के विचारकों की देन है. एमएसडब्लू की पढ़ाई का अधिकांश बाहर के विचारकों की सैद्धांतिकी पर निर्भर रहना होता है और यह सब केवल अंग्रेजी में सुलभ है. यानी हिंदी में समाज कार्य तक के विषयों की पढ़ाई सुलभ नहीं है तो बीएससी, एमएससी, बीटेक, एमटेक, एमएस की कौन कहे.
आप कहेंगे बाजार में तो हिंदी ही हिंदी है. देखो मोबाइल में हिंदी और भारतीय भाषाएं हैं. कमांड और अप्लीकेशन दोनों में. कम्यूटर प्रणालियों में हिंदी और भारतीय भाषाएं आ गयी हैं पर गृह मंत्रालय व संसदीय राजभाषा समिति के भय के कारण जो हिंदी थोड़ी बहुत पासबुक आदि में दिखती थी, वह पीसी के नवीनतम वर्जन आने के बाद बैंकों से गायब है, बैंकों के अप्लीकेशन्स में हिंदी व्यवहार्य ही नहीं है. दूसरे यदि शब्द संसाधन के रूप में फांट या यूनीकोड सिस्टम इन्स्टाल भी कर दिया तो थोड़े ही दिनों में लेन-देन में गड़बडी की आशंका दिखा कर उसे सिस्टम से हटा दिया जाता है. यानी हिंदी फिर वहीं पहली पायदान पर आ जाती है. बस हिंदी की पत्रिकाएं, गृह पत्रिकाएं निकालते रहिए जिसमें अध्यक्ष का संदेश, निदेशक का संदेश, डीजीएम आदि का संदेश, संपादक का संदेश यानी एक तरह से संदेशों की शोभादायक यात्रा ही निकल पड़ती है, जो लगभग दस पेज हजम कर जाते हैं. बाकी में चिकने कागज पर कट पेस्ट सामग्री व चित्रावलियां आदि होती हैं यानी पैसे की बरबादी और पत्रिकाओं का व्यक्तित्व शून्य. एक जमाने में आईडीबीआई 'विकासप्रभा' नामक पत्रिका निकालता था, जिसका हर अंक संग्रहणीय होता था क्योंकि उसमें शोध व चिंतन मनन शामिल होता था. अब यह पत्रिका भी बहुत साधारण सी निकलती है.

हिंदी का बाज़ार हाथी का दांत
हिंदी का बाज़ार हाथी के दांत सरीखा है यानी हिंदी में बाजार तो दिखती है पर काम नहीं. किसी भी दूकानदार के यहां बिक्री स्लिप तक हिंदी में नहीं मिलेगी. हिंदी भाषी राज्यों में भी नहीं, तो काहे की हिंदी. केवल बातचीत और पूछताछ के लिए! क्या फायदा ऐसी हिंदी से जो इलाके के ग्राहकों को भी अंग्रेजी में स्लिप देती हो? जहां तक पुस्तकों के बाजार का प्रश्न है, सरकार इसे उद्योग नहीं मानती पर उत्पाद पर जीएसटी लगाती है. संस्करण दो-तीन सौ तक सिमट गए हैं. रायल्टी के नाम पर अधिकांश लेखकों को बहुत कम या नहीं मिलता है, उलटे प्रकाशक लेखक को ही निकियाता है. कुछ बेस्टसेलर की बात करें तो वहां भी बेस्टसेलिंग की हाईप भी क्रियेट की जाती है तो बाकी पुस्त‍कों की नियति केवल अमेजॉन आदि प्लेटफार्म पर सूचीबद्ध होना होता है, पर उससे आगे के लिए न प्रकाशक जहमत उठाता है न विक्रेताओं की कड़ी प्रयास करती है. यह हाल उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में नही है. जहां सब कुछ मोबाइल पर सिमट गया हो, और बाजार में खुलेआम 10 रुपये किलो पुस्तकें बिकती हों, पुस्तकालय के पाठक इक्के-दुक्के रह गए हों वे भी छात्र टाइप के वहां पुस्तकों का बाजार और इस बाजार में हिंदी पुस्तकों की हालत पतली होगी ही. हिंदी का लेखक वैसे तो हर विषय का ज्ञाता बनता फिरेगा पर अंग्रेजी के आगे उसकी बोलती बंद हो जाती है. अपनी पुस्तक के पक्ष में वह ढंग का प्रचार भी नहीं कर सकता. शरमाता है जैसे यह नीतिविरुद्ध काम हो. छि..छि...छि....
ऐसे वातावरण में क्या तो बाजार की हिंदी और क्या हिंदी का बाजार! सब कुछ घाटे का सौदा है. कुछ लोग यह भी सोचते हैं, बही लिख-लिख के क्या होगा, वही किस्सा पुराना है. यानी हिंदी वालों के पास किस्से भी घिसे-पिटे ही हैं. कविता है तो प्रतिरोध की छौंक दे दो और महान कविता करार दे दो. विमर्श की कविता है तो उड़ेल दो स्त्री या दलित विषयक असंतोष, हो गया विमर्श. शुद्ध कविता के तत्व आंसू बहाते मिलेंगे. यानी कविता में सब कुछ होगा, कविता न होगी. यह है हिंदी का बाजार और बाजार में कविता. एक या एकाधिक शोध पर लेखक इतराता है और उसके कदम 'आजकल पांव जमी पर नहीं पड़ते मेरे' गाते हुए नृत्य करने लगते हैं. पाठक नहीं है, पर शोध हो रहा है. डिग्रियां बंट रही हैं. डॉक्टर बन रहे हैं और हिंदी सद्गति को प्राप्त हो रही है.
यही है बाजार में हिंदी और हिंदी के बाजार का असली परिदृश्य. देश की आर्थिक ताकत उसकी भाषा की ताकत पर निर्भर करती है. विश्व बाजार में भारत की आर्थिक स्थिति कोई बहुत सुदृढ़ नहीं कही जा सकती, लिहाजा न उसकी हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन सकी न बाजार में हिंदी सफल हो सकी न हिंदी का कोई लाभदायक बाजार ही विकसित हुआ. हिंदी में अंतत: भारत मां का नारा लगा कर सियासत चमकाने की सुविधा जरूर है, पेट भरने की नहीं. हिंदी दिवस की भरे मन से शुभकामनाएं.
***
डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हैं. वे हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान तथा यूको बैंक प्रवर्तित सही वात्स्यायन 'अज्ञेय' भाषा-सेतु सम्मान से विभूषित हैं.  
संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059, फोनः 9810042770, मेलः dromnishchal@gmail.com

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें