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जयंती विशेष: लोक यायावर देवेंद्र सत्यार्थी की आत्मकथा में है धरती की गंध

लोक यायावर देवेंद्र सत्यार्थी की कृतियों में उनकी आत्मकथा का पलड़ा शायद सबसे अधिक भारी है. यों उनकी कविता, कहानी और उपन्यासों की खासी धूम रही, और लोक साहित्य के तो वे मर्मज्ञ थे ही.

अपने गुरु देवेंद्र सत्यार्थी के साथ लेखक प्रकाश मनु अपने गुरु देवेंद्र सत्यार्थी के साथ लेखक प्रकाश मनु

लोक यायावर देवेंद्र सत्यार्थी की कृतियों में उनकी आत्मकथा का पलड़ा शायद सबसे अधिक भारी है. यों उनकी कविता, कहानी और उपन्यासों की खासी धूम रही, और लोक साहित्य के तो वे मर्मज्ञ थे ही. जब वे लोकगीतों की बात करते तो लगता, जैसे प्रकृति मां की गोद से रस का कोई झरना फूट पड़ा है, जिसमें भाव-स्नान करते हुए हमारी आत्मा भी निर्मल और पवित्र हो गई है. सत्यार्थी जी की प्रायः सभी रचनाओं में भावनाओं का यह उन्मुक्त वेग है जो हमें अपने साथ बहा ले जाता है, और हम महसूस करते हैं कि थोड़ी देर के लिए हमारे मन और आत्मा पर पड़े हुए दुनियादारी के आवरण हट गए हैं. धरती के सुख-दुख के सीधे-सरल और नैसर्गिक गीतों के साथ ही हमारा मन भी एकाएक मगन होकर गाने लगता है. लेकिन सत्यार्थी जी की आत्मकथा की तो बात ही कुछ और है. इसलिए कि उनकी आत्मकथा में ये सारी विधाएं खुद-ब-खुद मिल जाती हैं, और उसमें ठुमरी के से मधुर बोल और आलाप सुनाई देता है.
सत्यार्थी की कविताओं की स्वच्छंद लय हो या उनकी कहानियों की उस्तादाना किस्सागोई, उनके लोक साहित्य से फूटती धरती की गंध हो या उनके संस्मरण, रेखाचित्र और निबंधों का अनोखा लालित्य, सबका सब मानो एक अनूठी लय में ढलकर उनकी आत्मकथा में समा जाता है. खासकर उनकी आत्मकथा का पहला खंड ‘चाँद-सूरज के बीरन’ तो इस लिहाज से बेजोड़ है, जिसके शब्द-शब्द से कविता फूटती है. सच पूछिए तो हिंदी में ऐसी कोई दूसरी आत्मकथा है ही नहीं, जो पढ़ते हुए मन पर इस कदर छा जाती है, कि थोड़ी देर के लिए समय को भी ठिठककर, एक कोने में बैठ जाना पड़ता है. ताकि वह पूरी हो, तो समय आगे चले.
लोक यायावर देवेंद्र सत्यार्थी की आत्मकथा का पहला खंड ‘चाँद-सूरज के बीरन’ सन् 1954 में छपा था, और उसकी खूब धूम मची थी. शायद इसलिए कि यह आत्मकथा की एक अलग डगर थी, जिसमें बाहरी घटनाओं और ‘इतिहास’ से ज्यादा, मन के भीतर उठती-गिरती लहरों के साथ बहने का सुख है. और इसीलिए यह आत्मकथा लेखक के साथ-साथ खुद पाठकों की भी आत्मकथा बन जाती है, जिसके साथ वे अपने विगत जीवन के भूले-बिसरे प्रसंगों और राग-विरागपूर्ण स्मृतियों को जीने लगते हैं. सत्यार्थी ने पहली बार अपनी आत्मकथा में खुलकर अपने बचपन और किशोरावस्था के बारे में लिखा था और पंजाब के उन दिनों के भरे-पूरे सांस्कृतिक परिवेश के बारे में भी, जिसने आगे चलकर उन्हें लंबी और विलक्षण लोकयात्राओं के लिए तैयार किया. उन दिनों का पंजाब मानो लोकगीतों और लोकसंगीत के साथ छल-छल करता, जिंदादिली से भरा पंजाब था. लोगों में  भरपूर जीने और कुछ कर गुजरने की ललक थी. गुलामी की बेड़ियां भी पंजाब की इस बहुरंगी जीवन-धारा का रस नहीं खत्म कर पाई थी. सत्यार्थी ने बचपन और किशोरावस्था में पंजाब की इस बहुरंगी लोकधारा के रस और जीवंतता को महसूस किया था. और वही उनकी आत्मकथा के पहले और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण खंड में मानो छलछलाकर बहता है.
पर आत्मकथा लिखने का खयाल सत्यार्थी जी के मन में आया कैसे? मेरे मन में यह उत्सुकता थी. क्या इसकी भी कोई कहानी है? एक बार उनसे अंतरंग मुलाकात में उनके लेखन और जीवन संघर्षों पर खुलकर बात हो रही थी. तभी अचानक बातों-बातों में मैंने यह सवाल उनसे पूछ लिया. तब उन्होंने अपना 90वां जन्मदिन मनाया था और उम्र की कोई थकान उनके चेहरे पर नहीं थी. सवाल सुनते ही एकाएक बहुत-से चेहरे उनकी आंखों के आगे कौंधने लगे. इनमें सुप्रसिद्ध साहित्यकार और राजनेता राजगोपालाचारी भी थे.
“पहले राजगोपालाचारी जी का किस्सा लीजिए.” कहकर सत्यार्थी स्मृतियों में कोई आधी सदी पीछे लौटे. यह छठे दशक की शुरुआत का समय था, जब वे चेन्नई गए थे और वहां चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से भी मिलने चले गए. उन दिनों राजगोपालाचारी किसी बड़े काम में लगे थे. इसलिए किसी से मिलते नहीं थे. पर सत्यार्थी जी की बड़ी इच्छा थी उनसे मिलने की. वे उधेड़बुन में थे कि क्या करें? क्या वापस जाना ही ठीक होगा? तभी एक लड़का उनके घर की सीढ़ियों पर दिखाई दिया. सत्यार्थी जी ने उसे इशारे से पास बुलाया और एक हाथ से अपनी दाढ़ी को पकड़कर दूसरे हाथ से दो-तीन बार ऊपर की ओर इशारा किया.
लड़का समझ गया. झट सीढ़ियां फलांगता हुआ वह राजगोपालाचारी जी के पास गया और बोला, “कोई दाढ़ी वाला आदमी आपसे मिलना चाहता है.” बस, फौरन सत्यार्थी जी को ऊपर बुला लिया गया. उन दिनों सत्यार्थी जी अपनी आत्मकथा लिखने की उधेड़बुन में थे. उन्होंने राजगोपालाचारी जी से पूछा, “क्या आत्मकथा को भी साहित्य का अंग माना जा सकता है?”
सुनकर राजगोपालाचारी ने कहा, “हां, अगर उसमें जीवन की बड़ी तसवीर और भावना है.” इसी कसौटी पर उन्होंने कहा कि गांधी जी की आत्मकथा तो साहित्य है, पर नेहरू जी की आत्मकथा उस कोटि में नहीं आती. फिर काफी देर तक बातें हुईं. बरसों पहले राजगोपालाचारी ने मद्रास (आज का चेन्नई) में आयोजित उस सभा की अध्यक्षता की थी, जिसमें यायावर सत्यार्थी ने अपनी लोकयात्राओं और धरती की कोख से फूट निकले लोकगीतों पर अंग्रेजी में धाराप्रवाह भाषण दिया था. उस सभा में राजगोपालाचारी ने अपने अनोखे अंदाज में लोक साहित्य में सत्यार्थी के काम और देश के अलग-अलग अंचलों के लोकगीत एकत्र करने की उनकी धुन की खासी सराहना की थी. खास बात यह है कि सत्यार्थी लोकगीतों को हृदय की आंख से देखते थे, और स्वयं उनके सुख-दुख, गहरे मर्म और भावनाओं के साथ बहते हुए उन पर लिखते थे. इसलिए लोकगीतों का हृदय उनके आगे खुल पड़ता था. राजगोपालाचारी ने लोकगीतों के अनुसंधानकर्ता के रूप में, सत्यार्थी की इस सहृदयता और निश्छल भावना की सबसे ज्यादा तारीफ की थी, जिसके कारण ये लोकगीत जन-जन के दिलों तक पहुंच गए.
राजगोपालाचारी जी को वह प्रसंग अच्छी तरह याद था और जब उन्होंने सत्यार्थी के लेखन और जीवन संघर्षों को जानने की उत्सुकता प्रकट की थी. काफी देर तक बतकही के बाद जब सत्यार्थी जी चल रहे थे, तो राजगोपालाचारी जी को अचानक याद आया, कि किस तरह सत्यार्थी ने अपनी लंबी दाढ़ी की ओर इशारा करके, बड़े अनूठे ढंग से अपनी मिलने की बात उन तक पहुंचाई थी. वे हंसकर बड़े विनोदपूर्ण ढंग से बोले, “देखिए, मैं आजकल किसी से मिलता नहीं हूं. यहां तक कि राजनेता और मिनिस्टर लोग भी मिलना चाहते हैं, तो उन्हें समय नहीं दे पाता. पर आप तो ठहरे पब्लिसिटी मास्टर, आपने रास्ता निकाल ही लिया.”
इस पर दोनों खुलकर हंसे.
फिर राजगोपालाचारी ने सलाह दी, “अगर आप आत्मकथा लिखना चाहते हैं, तो जरूर लिखें. पर उसमें स्थूल घटनाएं न हों. मन के सागर में तैरने जैसी हो आत्मकथा, जिसे बड़े और उदार दिल से लिखा जाए.”
सत्यार्थी को यह राय पसंद आई. उन्होंने राजगोपालाचारी जी को धन्यवाद दिया और उठकर चले आए. उन्हें अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया था.
***

राजगोपालाचारी जी ने सचमुच सही राय दी थी, जिसका परिणाम है कि सत्यार्थी जी की आत्मकथा ‘चाँद-सूरज के बीरन’ ऐसी मोहने वाली किताब बन गयी. सत्यार्थी जी की आत्मकथा के इस खंड में कुल 57 अध्याय हैं. लोक यायावर के शैशव और बालपन से शुरू हुई यह कथा, आखिर उनकी तरुणाई के जोश-खरोश भरे दिनों तक पहुंचती है, जब उनके भीतर कुछ नया कर गुजरने की चाह अंगड़ाई ले रही थी. और अंततः लाहौर में पढ़ाई अधबीच छोड़कर, वे लोकगीतों के संग्रह के लिए घर से भाग खड़े हुए. इसके बाद सत्यार्थी ने न सिर्फ अपने जीवन की कहानी एक शानदार धुन और बुलंद इरादों के साथ लिखनी शुरू की, बल्कि लोक साहित्य में एक ऐसा अभूतपूर्व आंदोलन खड़ा कर दिया, जिसने देखते ही देखते पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया.
सत्यार्थी के शैशव काल से पता चलता है कि वह लोकगीतों के फकीर बादशाह यों ही नहीं बने. बचपन से ही उनमें हर बात को अपने ढंग से देखने की उत्सुकता थी, कौतुक भी. साथ ही एक ऐसी मस्ती भी, जो उन्हें एक अलग ही दुनिया में पहुंचा देती थी. घर में नई दुलहन के आगमन के बहाने सत्यार्थी जी ने एक अबोध शिशु की भावनाओं का अनोखा शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है. (देखें इसी लेख के साथ प्रस्तुत आत्मकथा के अंश) इसमें बालक के शैशव का चित्र इतना सहज, स्वाभाविक है कि मन से कभी उतरता ही नहीं. छोटे से बच्चे को जो दृश्य और छवियां पसंद हैं, वे हमेशा तो उसकी आंखों के आगे रहती नहीं हैं. तब वह अपनी कल्पना से उन्हें नए रंगों में रंग देता है. अनूठी कल्पनाओं से सजा देता है. इन्हें पढ़ते हुए एक बच्चे का सरल मन और भोलापन हमारे आगे आ जाता है, जो अपनी कल्पनाशीलता से नई-नई और अनूठी विस्मय भरी निर्मितियां करने लगता है. सत्यार्थी को खानाबदोश लेखक कहा गया. पर खानाबदोशों के लिए उनके मन में उत्सुकता और आकर्षण तो बचपन से ही नजर आने लगता है. आत्मकथा के इसी खंड में इसका भी दिलचस्प वर्णन है.
इतना ही नहीं, स्कूल की डांट-डपट वाली पढ़ाई भी उसे पसंद नहीं है, जिसमें न प्रेम से सिखाने वाला भाव है, न हृदय की कोमलता और न जीवन और प्रकृति से उसका कोई करीबी संबंध है. ऐसी जोर-जबरदस्ती वाली पढ़ाई से बच्चे को ऊब होती है. उसका मन चिड़ियों की तरह मुक्त पंखों से हवा में उड़ना और चहचहाना चाहता है. आश्चर्य नहीं, कि आत्मकथा के इस खंड का अंत भी उन्नीस बरस की अवस्था में, सत्यार्थी के पढ़ाई छोड़ देने और लोकगीत एकत्र करने के लिए घर से भाग जाने के ऐसे मार्मिक आत्मवृत्तांत से होता है, जिसे पढ़कर पता चलता है कि वह कौन सी प्रेरणा, कौन सा जोश और जुनून था, जिसने उनके पैरों में चक्कर डाल दिया, और वे उम्र भर खानाबदोशी की राह पर चलते रहे.
सत्यार्थी जी से उनकी इसी आत्मकथा पर चर्चा हो रही थी कि अचानक मुझे पुस्तक की भूमिका में लिखी गई कुछ बड़ी आत्मीय पंक्तियां याद आ गईं. मैंने इसके पीछे की कहानी जानना चाहा. “असल में अपनी आत्मकथा लिखने का खयाल कहीं न कहीं मन में तो था! पर उसके लिए अभी ठीक से मन नहीं बन पा रहा था. इसका श्रेय चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और उनसे भी पहले एक भद्र महिला को जाता है, जो साहित्य की बड़ी अच्छी पाठिका थी और मेरे साहित्य की प्रशंसिका थी. वह भद्र महिला जब भी मिलतीं, हर बार आग्रह करती, ‘आप अपनी आत्मकथा क्यों नहीं लिखते? आपको अपनी आत्मकथा जरूर लिखनी चाहिए, ताकि लोगों को पता चले, आपने कैसा बीहड़ जीवन जिया है.’ मैं कहता, ‘जो कुछ मैंने लिखा है, चाहे लेख हों, कहानियां हों, रेखाचित्र या संस्मरण, ये सब मेरी आत्मकथा ही तो हैं. सभी में मेरी अपनी जिंदगी के अक्स और घटनाएं हैं.’
“मैंने अपनी कुछ कहानियों और लेखों का नाम लेकर बताया कि इन्हें तो हू-ब-हू आत्मकथा के अध्याय के रूप में पढ़ा जा सकता है. बस, पात्रों का नाम बदलकर देवेंद्र सत्यार्थी लिख दीजिए, हो गई आत्मकथा! पर उस भद्र महिला का कहना था, ‘नहीं, आत्मकथा की तो बात ही कुछ और है. सत्यार्थी जी, आप जल्दी से जल्दी अपनी आत्मकथा लिख डालिए. उसे बहुत लोग पढ़ना चाहेंगे. हिंदी साहित्य की वह एक दुर्लभ कृति होगी.’ तो उस पाठिका के आग्रह की रक्षा करने के लिए ही ‘चाँद-सूरज के बीरन’ की रचना की गई.”
भूमिका में सत्यार्थी जी ने उनके प्रति आभार भी प्रकट किया है—
लिक्खाँ मैं आपणी जीवनी
तज के सारा प्यार,
मैंनूँ वी पसंद है
गोरिए तैडा विचार...!
यह प्रसंग सुनाते हुए सत्यार्थी जी की आंखों में अतीत की झांइयां जैसे झिलमिल कर रही थीं. और मैं सोच रहा था, सत्यार्थी जी की तो पूरी जिंदगी ही एक से एक अजब-अनोखे और अविस्मरणीय किस्सों से भरी हुई है. तो फिर उनकी आत्मकथा लिखने की कहानी भी भला इतनी उत्सुकता और कौतुक भरी क्यों न हो!
उस समझदार पाठिका को धन्यवाद देते हुए मैं चुपचाप सत्यार्थी जी के चेहरे की झुर्रियों में छिपे अनकहे, अनलिखे इतिहास को टोहने लगता हूं. तभी आत्मकथा के अन्य खंडों का ध्यान आया. ‘चाँद-सूरज के बीरन’ के बाद के जो खंड- ‘नील यक्षिणी’, ‘हैलो गुडमैन दि लालटैन’ और ‘नाच मेरी बुलबुल’ में वैसा कथारस नहीं है. बीच-बीच में काफी कुछ बिखरा-बिखरा सा है. जैसे यह आत्मकथा बीसवीं सदी के साहित्य और इतिहास के एक से एक विचित्र किस्सों, जीवंत नायकों और उनसे हुआ मुलाकातों का एक अद्भुत कोलाज बन गई हो. इनमें एक पूरी सदी का अनकहा इतिहास और कभी न भूलने वाली घटनाओं के अद्भुत आख्यान मिलेंगे. इतने बिखराव, बेतरतीब प्रसंगों और अस्तव्यस्तता के बावजूद इनमें बीच-बीच में जगमग-जगमग करते ऐसे सूत्र-वाक्य और उक्तियां मिलती हैं कि आप उनके आकर्षण से बच नहीं पाते. जैसे बनारस के गंगाघाट पर बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई या फिर कला और संगीत के मर्मज्ञों के बीच भीमसेन जोशी के शास्त्रीय संगीत का आलाप.
***

सत्यार्थी की आत्मकथा का पहला खंड उन दिनों छपा था, जब वे ‘आजकल’ के संपादक थे. संपादन के साथ-साथ उनकी लेखनी का भी वह उत्कर्ष काल था. इसलिए इसकी खासी धूम रही. हिंदी के बड़े से बड़े साहित्यकारों ने इसे सराहा. डॉ. शिवदान सिंह चौहान ने ‘कल्पना’ में लिखी गई अपनी समीक्षा में इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और इसे अपने ढंग की बेजोड़ आत्मकथा माना. जबकि यह सत्यार्थी जी के बीहड़ जीवन कथा के शुरुआती उन्नीस वर्षों की ही कथा है. इसके कोई इकतीस बरस बाद इस आत्मकथा का दूसरा खंड, ‘नीलयक्षिणी’ छपा और अगले दो खंड ‘हैलो गुडमैन दि लालटेन’ सन् 1995 और ‘नाच मेरी बुलबुल’ 1999 में छपी. इनमें ‘हैलो गुडमैन दि लालटेन’ शायद मंटो को ट्रिब्यूट देने के लिए रखा गया, जिनकी कहानी ‘टोबा टेकसिंह’ के सत्यार्थी जी घोर प्रशंसक थे. पर ‘नाच मेरी बुलबुल’ क्यों? कहीं यह अपनी शर्तों पर जीने वाले एक लेखक की लाचारी और असहायता की व्यंजना तो नहीं, जिसे अपने गुजर-बसर के लिए तमाम पापड़ बेलने पड़ते हैं और हर ढंग से नाच नाचना पड़ता है.
आत्मकथा के बाद वाले खंडों में से भी हमें सत्यार्थी जी की प्रतिभा का कायल होना पड़ता है और उनकी धूल और आंसुओं से मिली जिंदगी के प्रति मन में गहरा सम्मान पैदा होता है. ‘हैलो गुडमैन दि लालटेन’ में कुल अट्ठाईस अध्याय हैं और उनके जीवन में आए लोगों के संवेदनात्मक बिंब हैं. यह एक कोलाज की शक्ल में है. आत्मकथा और कहानी का मिला-जुला प्रभाव. और कहानियां इस कदर प्रयोगात्मक हैं कि उनमें बस इशारे हैं, पूरी बात कहीं नहीं. फिर भी इनसे गुजरकर बहुत कुछ हासिल होता है. पहले अध्याय ‘नदी और नारी’ में कुछ खूबसूरत उक्तियां हैं जो ध्यान खींचती हैं. मसलन, ‘किताब कहती है, तुम मुझे पढ़ो, मैं तुम्हें पढ़ूंगी!’ ऐसे ही अपने मौजूदा हाल को बताने के लिए सत्यार्थी जी एक बड़े मौजूं शेर का सहारा लेते हैं—
न जाने कल हों कहां, साथ अब हवा के हैं,
कि हम परिंदे मुकामाते गुमशुदा के हैं!
इस अध्याय का सबसे मार्मिक प्रसंग है बांग्ला कवि जीवनानंद दास का कालीघाट और चौरंगी के बीच एक ट्राम के नीचे आकर कुचला जाना. सत्यार्थी जी न केवल जीवनानंद दास को बहुत प्यार से याद करते हैं, बल्कि उनकी अद्भुत पुस्तक ‘वनलता सेन’ को भी. यहां इस बात का भी उल्लेख है कि उन्होंने बीवी के गहने बेचकर छपवाई थी यह लाजवाब किताब. बाद में जीवनानंद दास की यह पुस्तक इतनी चर्चित हुई कि उसे साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. फिर उन्हें शिल्पी-चक्र में अपनी षष्ठीपूर्ति समारोह की याद आती है. इस कार्यक्रम में सत्यार्थी जी ने कहा था, “दोस्तो, मैं समंदर वाले शहर से चला आया. एक लाख की रकम पर लात मारकर!”
और फिर अपनी आज की जिंदगी पर सत्यार्थी जी की बेबाक टीप, “लखपति बनने की बजाय अपनी दिल्ली में फटेहाल जिंदगी मुबारक!”
दिल्ली में सत्यार्थी जी की बस यही दिनचर्या कि दिन भर लिखना, लिखना और बस, लिखना! दूसरी तरफ धन, यश और कुर्सियों के खेल में लगे सफलतावादी लोगों को वे देखते हैं और मन ही मन गुनगुनाते लगते हैं—
कैसे-कैसे ऐसे-वैसे हो गए,
ऐसे-वैसे कैसे-कैसे हो गए.
इस अघोर फकीरी और यायावरी में कभी-कभी रास्ता चलते हुए सड़क के उस पार ऊंची चट्टान उन्हें सलामी देते हाथी की हमशक्ल लगती. और वे हंसकर गा उठते—
हाथी फिरे गाम-गाम,
जिसका हाथी उसका नाम.
मानो सत्यार्थी की हर बात के पीछे हुई कोई छिपी हुई कहानी है, जो बाहर आने के लिए सिर उठाए उझक रही होती है. फिर अचानक उन्हें मिर्जापुर का घंटाघर याद आता है जिस पर अबाबीलों ने घोंसले बना लिए थे. और वे तरंग में आकर मिर्जापुर की यह खूबसूरत कजरी गुनगुनाने लगते हैं—
एक ठो रही अबाबील,
ऊ तो करने चली अपील
घंटाघर के सामने!
किस्सा-दर किस्सा-दर किस्सा! फिर एक दिन सत्यार्थी जी के शब्दों में उनकी आत्मकथा का एक ‘विचित्र वृत्तांत’ खुलकर आया. पढ़कर मैं सन्न. हुआ यह कि एक बार लोकमाता ने सत्यार्थी जी को चार आने का दही लाने के लिए कहा, “तुम हलवाई की दुकान से दही लेते आओ, मैं अनारदाना डालकर गोभी वाले पकौड़े बनाती हूं.”
हलवाई की दुकान पर भीड़ थी. यायावर सत्यार्थी बिजली के खंभे से सटकर बैठ गए और कटोरी सामने रख ली. बैठे-बैठे उन्हें झपकी आ गई. आंखें खुलीं तो देखा, कटोरी रेजगारी से भरी थी. दानी लोगों ने यायावर सत्यार्थी को साधु बाबा समझकर कटोरी में कुछ सिक्के डाल दिए थे. और सत्यार्थी जी कटोरी में दही लेकर वापस जाते हुए सोचते हैं, “मैं अपनी अगली कहानी शीर्षक रखूंगा, ‘गुमशुदा की तलाश’!”
हालांकि गुमशुदा कौन है— लोग...या कि वे खुद? और गुमशुदा की तलाश कौन करेगा? यह तब भी उन्हें शायद पता नहीं था. पर कहानी लिखने के खयाल से उनके पैर तेज-तेज आगे बढ़ने लगे थे.
***

इसी तरह एक जगह लोकगीतों की शक्ति दर्शाने वाले एक लोकगीत को उन्होंने उद्धृत किया है, जिसे पढ़कर समझ में आता है कि अपने समय का बड़े से बड़ा यथार्थ भी लोकगीतों में स्थान पा सकता है. यह बांग्ला लोरी है जिसमें बरगियों के हमलों का जिक्र है—
खोका धुकालो पाड़ा जुड़ालो
बरगी एलो देशे,
बुलबुलीते धान खेए छे
खाजना दिबो किशे?
(अर्थात, शिशु सो गया, मोहल्ला खामोश हो गया, बुलबुलों ने धान खा लिया. हम खजाना यानी मालिया कहां से भरेंगे?)
बात छोटी-सी, लेकिन उसके पीछे संकेत बड़ा है. इतिहास का एक दुखद प्रसंग जो कि खुद-ब-खुद एक लोरी में ढल गया. उन दिनों बंगाल में नवाब अली वर्दी खाँ की हुकूमत थी. मराठा सैनिक जो कि बरगी कहलाते थे, बार-बार राज्य पर हमला करने के लिए आते थे. किसी तरह नवाब भारी रकम देकर उन्हें लौटा देता था. लेकिन फिर जनता पर उतना ही भारी कर लगा देता था और लोगों की मुश्किलें बढ़ जाती थीं. इसलिए मांएं बच्चों को यह कहकर डराती थीं कि, ‘चुप हो जा, नहीं तो बरगी आ जाएंगे!’
यह लोकगीत उन लोगों को खुद-ब-खुद जवाब दे देता है, जो यह समझते हैं कि लोकगीतों में कोरी भावुकता होती है और उनमें जीवन यथार्थ या बड़ी कठोर ऐतिहासिक सच्चाइयां नहीं कही जा सकतीं.
फिर स्वर बदलता है और माझे दी जट्टी का यह मीठा, सुरीला गीत अमृतयान के होंठों पर आ जाता है—
उच्चे-उच्चे मेरा डोला जावे
डोले दी टुट्ट गई फट्टी,
नरैणसिंहा! मैं माझे दी जट्टी.
नरैणसिंहा! मैं माझे दी जट्टी!
और इसी गीत के साथ ही चारों ओर नृत्य की गति, घूर्णन और उल्लास बिखर जाता है. लोकगीतों का यह दूसरा ध्रुव है जहां समूची धरती किसी उत्सवप्रिया वधू की तरह नाच उठती है!
***

‘हैलो गुडमैन दि लालटेन’ का एक और याद रह जाने वाला अध्याय है, ‘ब्रह्मा के दो आंसू’. इसमें एक नायाब शख्स आंसू मियां से हमारी मुलाकात होती है, जो राजधानी दिल्ली की यह अनोखी ग़ज़ल गुनगुना रहे हैं. ऐसी ग़ज़ल जिसमें गोपाल मित्तल और लाहौर के किस्से भी शामिल हैं—
जरा अपने वतन की राजधानी देखते जाओ,
जरा बहता हुआ जमना का पानी देखते जाओ.
बहुत बरहम हैं अलफाजो-मुआनी देखते जाओ,
यहीं पर खत्म होगी अब कहानी, देखते जाओ.
सुनाता है जो दिल्ली शहर में लाहौर के किस्से,
उसी गोपाल मित्तल की निशानी देखते जाओ.
कोई ‘तहरीक’ पर नाकाँ, कोई ‘शब-खून’ का कायल,
कहां तक है किसी की हुकमरानी, देखते जाओ.
कोई अंदर से टूटा है, कोई बाहर से टूटा है,
इसे दोहराओ और जादू-बयानी देखते जाओ.
कुछ आगे चलकर एक बड़ा दिलचस्प पंजाबी लोकगीत नजर आता है. इसमें यह कल्पना की गई है कि कोई भक्त ब्रह्मा के वेदों को चुराकर ले गया. यों भी हमारे यहां पौराणिक साहित्य में ऐसी अनेक कथाएं हैं, जिनमें वेदों को चुराकर ले जाने के विचित्र प्रसंग हैं, जिससे संसार में हाहाकार मच जाता है. ऋषि, मुनि और संन्यासी सभी विकल हैं. फिर वेदों को वापस लाने का उद्यम होता है. एक पंजाबी लोकगीत में यह बात बड़े अनूठे अंदाज में कही गई है—
कोई लै गया भगत चुरा के,
ब्रह्मा दे वेदा नूँ...!
अर्थात, कोई भक्त चुराकर ले गया ब्रह्मा के वेद. लगता है, शब्द-ब्रह्मा पर किसी ने किसी विद्वान का भाषण सुना होगा. और फिर अचानक ये पंक्तियां उसके होंठों से फिसल गई होंगी.
आगे सत्यार्थी जी के शब्दों में उनकी आत्मकथा की व्याख्या है- “यात्रा... यात्रा...यात्रा अमृतयान की आत्मकथा जो पाठक के अंतर्मन में उतरती रहती है.”
***

पुस्तक का एक और दिलचस्प संस्मरणात्मक अध्याय है, ‘जैनेंद्र कुमार: दागा वई वई वई’. इसमें जैंनेद्र कुमार का बड़ा अऩोखा शब्दचित्र तो है ही, साथ ही उर्दू के लेखक गोपीनाथ अमन भी हैं जिन्हें जैनेंद्र के साथ ही सत्यार्थी जी ने बड़े प्यार से याद किया है. गोपीनाथ अमन का प्रसंग चला, तो सत्यार्थी जी उनकी सुनाई हुई दो अलबेली कथाएं भी साथ ही गूंथ देते हैं. इनमें एक कथा जोश मलीहाबादी से संबंधित है. हुआ यह कि जोश साहब ने कोई ग़ज़ल लिखी जो उन्हें पसंद नहीं आई. उन्होंने उसे फाड़ा और डस्टबिन के हवाले किया. उनसे कोई व्यक्ति मिलने आया, उसने चुपके से कागज के उन टुकड़ों को उठा लिया. फिर उन्हें जोड़कर पूरी ग़ज़ल उतार ली गई. वह ग़ज़ल उस शख्स ने अपने किसी परिचित को दे दी जो एक नौसिखिया शायर था, मगर जिसका गला काफी अच्छा था. उसने लालकिले के मुशायरे में उसे पढ़ा तो ग़ज़ल खासी जम गई.
मुशायरे के अगले रोज वह नौसिखिया उत्साह में वही ग़ज़ल लेकर जोश साहब के सामने आ पहुंचा और झूम-झूमकर पढ़ने लगा. जोश साहब सुनते रहे, झेलते रहे और फिर किसी तरह उसे वहां से रवाना करके सीधे प्रकाशन विभाग के उप निदेशक श्रीकृष्ण सक्सेना के पास पहुंचे. उन्हें पूरा किस्सा सुनाने के बाद, माथे पर हाथ मारकर बोले, “वो...पट्ठा मुझे मेरा ही कलाम सुना रहा था. और मैं ऐसा अहमक कि खुद अपने ही कलाम की दाद दे रहा था!”
‘हैलो गुडमैन दि लालटेन’ में पग-पग पर सत्यार्थी जी की अतीत से वर्तमान में आवाजाही चलती है. आत्मकथा के एक अध्याय ‘मोहनजोदड़ो की राजनर्तकी’ में सत्यार्थी जी की एक पुरानी स्मृति है, जब वे भदंत आनंद कौसल्यायन के साथ मोहनजोदड़ो की यात्रा पर गए थे और उन्होंने प्राचीन संस्कृति की विरासत के उन खंडहरों को देखा था, जिनके नीचे एक महान सभ्यता सो रही है.
याद आता है, एक बार लंबी बतकही में मैंने उनसे पूछा था, “कुछ लोगों का कहना है कि एक लेखक जो कुछ लिखता है, वह किसी न किसी रूप में उसकी आत्मकथा ही है, क्योंकि उसमें उसके जीवन के बहुत गहरे निजी अनुभव ही शक्लें बदल-बदलकर आते हैं. क्या आपको भी ऐसा लगा?” जवाब में सत्यार्थी जी ने हां में सिर हिलाया. बोले, “आपको हैरानी होगी, इसी कारण लंबे समय तक मैं आत्मकथा लिखने का खयाल टालता रहा, क्योंकि ‘चंबा उदास है’ जैसे संस्मरणात्मक लेखों के अलावा मेरी कहानियों और उपन्यासों में भी मेरे जीवन की घटनाएं और घुमक्कड़ी के दिनों के अजीबोगरीब अनुभव ही हैं. हालांकि यह बात भी अपनी जगह सही है कि मेरी आत्मकथा में ऐसा बहुत कुछ है जो मेरी कहानियों और उपन्यासों में आने से छूट गया है. कोई गौर से पढ़े तो उसमें ऐसी तमाम घटनाएं हैं और इतिहास का पूरा ढाँचा मिलेगा, जिसने हमारे समय और हमारे दौर के आदमी को बनाया है.”
और सचमुच सत्यार्थी जी की आत्मकथा के ये चारों खंड एक तरह से दस्तावेजी महत्त्व रखते हैं.
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# लेखक प्रकाश मनु वरिष्ठ साहित्यकार हैं. संपर्कः 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, ईमेल- prakashmanu333@gmail.com

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