ईरान की लड़ाई प्लान के मुताबिक नहीं चल पा रही है. प्लान यानी US-इजरायली प्लान के मुताबिक. ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और ऑपरेशन Roaring Lion का मकसद ईरानी सरकार पर ऐसे हमले करने थे जिससे वो तिलमिलाकर रह जाए और खामेनेई सरकार की मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करने की क्षमता खत्म हो जाए, जैसा कि इन्होंने पिछले साल 12 दिन की लड़ाई के दौरान किया था.
ये जॉइंट ऑपरेशन इस साल 3 जनवरी को वेनेजुएला में हुए सरकार बदलने को दोहराने के लिए थे. ऑपरेशन Absolute Resolve के दौरान US स्पेशल फोर्सेज़ ने प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो को किडनैप किया था लेकिन इस ऑपरेशन में दर्जनों सटीक बम गिराए गए.
सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई 28 फरवरी को किए गए एयर स्ट्राइक में मारे गए. ट्रंप ने कहा था कि ये ईरानी शासन को बदलने और ईरानी खतरे को खत्म करने के लिए किया गया ऑपरेशन था. ईरान का शासन बदला, लेकिन उस तरह से नहीं जैसा US चाहता था. खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई ने अब सुप्रीम लीडर का पद संभाल लिया है.
ऐसा लग रहा है कि ईरानी सरकार ने डीसेंट्रलाइज़्ड कमांड और कंट्रोल की ‘मोज़ेक स्ट्रैटेजी’ अपनाकर खुद को बड़े हमलों के लिए तैयार कर लिया है. 28 फरवरी से ईरान ने 3000 किलोमीटर के वेस्ट एशिया एरिया में सैकड़ों एक्सप्लोसिव प्रोजेक्टाइल,क्रूज़ और बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन लॉन्च किए हैं. इनका टारगेट मेडिटेरेनियन सी पर साइप्रस और इजरायल से लेकर अरब सागर में ओमान तक है. ईरान ने गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के छह मुख्य देश जिनमें सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, UAE, कतर और ओमान शामिल हैं, की इकॉनमी को टारगेट किया है.
ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलें और तेहरान का ग्लोबल मिलिट्री हार्डवेयर में खास पेशकश शाहेद-136 खुदकुश ड्रोन अमेरिका के अरबों डॉलर के एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम को भेदकर निकल गए हैं.
इससे US सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के जमीन पर लगे मिलिट्री रडार टूट गए हैं. इससे GCC देशों का रक्षा कवच टूट गया है. इस टकराव की वजह से होर्मुज स्ट्रेट्स का टैंकर ट्रैफिक थम गया है, ये वो जलमार्ग है जिससे दुनिया का 20 परसेंट तेल और नेचुरल गैस गुज़रता है.
दो फैक्टर से तय होगा लड़ाई का नतीजा
इस लड़ाई का नतीजा दो फैक्टर से तय होगा. गोला-बारूद और बाज़ार. ईरान कम कीमत वाले हथियारों जैसे- क्रूज़ मिसाइल, ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल की कभी खत्म न होने वाली सप्लाई में हाथ डाल रहा है ताकि एक गंभीर आर्थिक चोट दुश्मन को दी जा सके. हर शाहेद-136 ड्रोन की कीमत $50,000 है. एक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल की लागत एक राउंड में $1 मिलियन से ज़्यादा है. US और उसके खाड़ी सहयोगियों ने ईरान के कम कीमत वाले प्रोजेक्टाइल को मार गिराने के लिए कई पैट्रियट इंटरसेप्टर खर्च किए हैं. यह कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि किस तरफ़ मिसाइलें पहले खत्म होंगी. इस बीच बाजारों ने कभी न खत्म होने वाली लड़ाई की संभावना पर बुरा रिएक्शन दिया है. स्टॉक की कीमतें गिर गई हैं. सप्लाई में रुकावट का डर, रुके हुए टैंकर ट्रैफ़िक और तेल के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों की वजह से तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ज़्यादा हो गई हैं. ग्लोबल स्टैगफ्लेशन का डर इस समय तेहरान के ऊपर मंडरा रहे भयानक आसमान से भी ज़्यादा घना है.
इस जंग में कई 'पहली बार' हैं
ईरान युद्ध एक ऐसा संघर्ष है जो पहले कभी नहीं हुआ, इस जंग में कई चीजें पहली दफे हो रही हैं. पहली बार दो न्यूक्लियर हथियार वाले देशों ने एक नॉन-न्यूक्लियर देश पर हमला किया. पहली बार सरकार के सपोर्ट से किसी दूसरे देश के लीडर को एलिमिनेट किया गया. पहली बार एक देश ने लगभग एक साथ कई देशों पर हमला किया.
सबसे जरूरी बात. पहली बार 21वीं सदी में किसी देश ने US मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़े पैमाने पर तबाह किया. यह सरकार बदलने के लिए एयर पावर का पहला मिलकर किया गया इस्तेमाल भी है. मिलिट्री एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि एयर पावर से कभी भी सरकार नहीं बदली गई है. (जैसा कि मैं समझाऊंगा, यह बात आंशिक रूप से ही सही है). वे कहते हैं कि सैनिकों के साथ जमीन पर हमला, यानी कि 'बूट्स ऑन ग्राउंड' ही काम करेगा.
ईरान इराक से तीन गुना बड़ा है
और क्योंकि ईरान इराक से तीन गुना बड़ा है और पहाड़ों से घिरा एक कुदरत का बनाया हुआ किला भी है, इसलिए यह सैनिकों को 'निगल' जाएगा. यही वजह है कि US ने जमीन और समुद्र से हमला करने का फैसला किया. पिछले हफ़्ते ईरान ने अपनी ज़्यादातर नेवी और एयर फ़ोर्स खो दी है, लेकिन तेहरान में सरकार ने लड़ाई जारी रखने की कसम खाई है. ट्रंप बिना शर्त सरेंडर के अलावा कुछ नहीं चाहते, जैसा कि उन्होंने 8 मार्च को रिपोर्टर्स से कहा था.
परिस्थितियों का यह मेल और एक और खतरनाक पहली घटना की आशंका इस लड़ाई के अगले कदमों को इतना जोखिम भरा बनाती है.
जापान पर परमाणु बम से हमला
80 साल से भी पहले US मिलिट्री जापान के साथ युद्ध के दौरान गहरे असमंजस में थी. उसके जंगी जहाजों और सबमरीन ने विदेशी जापानी साम्राज्य को खत्म कर दिया था और लॉन्चपैड के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए उसके आस-पास के सभी द्वीपों पर कब्जा कर लिया था. जापान ने अपने ज़्यादातर जंगी जहाज और लगभग पूरी एयर फ़ोर्स खो दी थी. लेकिन जापानी राष्ट्र आखिर तक लड़ने के लिए तैयार था. इसलिए US ने मैनहैटन प्रोजेक्ट के तहत चुपके से बनाए गए हथियारों का इस्तेमाल किया.
6 अगस्त को US के B-29 सुपरफोर्ट्रेस ने हिरोशिमा पर 4.4 किलोटन का न्यूक्लियर बम गिराया, और 9 अगस्त को नागासाकी पर एक और 4.6 KT का बम गिराया. दोनों शहरों में लगभग 240,000 जापानी जनता मारी गई. B-29 ही अकेले ऐसे एयरक्राफ्ट थे जो बम ले जा सकते थे, हर एक का वजन चार टन से ज़्यादा था. वे बिना सुरक्षा के उड़ रहे थे क्योंकि एलाइज ने जापानी एयर फ़ोर्स को खत्म कर दिया था और जापान के आसमान पर अमेरिका की एयर सुपीरियरिटी के हालत थी.
15 अगस्त को छह दिन बाद जापान ने अपने सरेंडर का ऐलान किया. US का मानना था कि ये नुकसान, चाहे कितने भी भयानक क्यों न हों, जापानी होमलैंड पर US के नेतृत्व वाले जमीनी हमले से कहीं ज़्यादा ठीक थे, जिससे दस लाख से ज़्यादा लोग मारे जाते.
ये बमबारी जर्मनी और जापान के ऊपर वर्ल्ड वॉर-2 के एलाइड देशों के स्ट्रेटेजिक हवाई हमले का नतीजा थी, जिसे साइकोलॉजिकल शॉक देने और दुश्मन की युद्ध करने की क्षमता को खत्म करने के लिए डिज़ाइन किया गया था.
तब से, US ने कम से कम चार बार न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल करने के बारे में सोचा है. कोरियाई युद्ध के दौरान, ताइवान स्ट्रेट संकट के दौरान, क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान, और 1960 के दशक में वियतनाम में. वह हर बार खतरे से बच निकला है. ट्रंप के प्रेसिडेंटशिप में US एक बार फिर खतरनाक इलाके में जा सकता है.
अगर हमारे पास न्यूक्लियर हथियार हैं तो...
“अगर हमारे पास न्यूक्लियर हथियार हैं, तो हम उनका इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते?” CNBC ने एक बार रिपोर्ट किया था कि ट्रंप ने 2016 में अपने पहले टर्म के दौरान एक एडवाइज़र से पूछा था. व्हाइट हाउस ने उस स्टोरी पर कोई कमेंट नहीं किया, लेकिन उसके काम बातों से ज़्यादा असरदार थे.
2018 में पहले ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने न्यूक्लियर पोस्चर रिव्यू की मांग की थी. इसमें दो सबसे विवादित बातें थीं ‘सप्लीमेंटल कैपेबिलिटीज़’ की शुरुआत. यानी कि मौजूदा ट्राइडेंट सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) को बदलकर W-76-2 लो-यील्ड ‘टैक्टिकल’ वॉरहेड्स को तैनात करना.
और एक नई न्यूक्लियर-आर्म्ड सी-लॉन्च्ड क्रूज़ मिसाइल (SLCM-N) को आगे बढ़ाना ताकि एक फ्लेक्सिबल, सर्वाइवेबल नॉन-स्ट्रेटेजिक न्यूक्लियर ऑप्शन को रिस्टोर किया जा सके. इसे US ने पहले रिटायर कर दिया था.ये दोनों ही हथियार ओहियो-क्लास बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन पर लगे हैं.
टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन (TNWs) ऐसा इसलिए कहलाते हैं क्योंकि इनका इस्तेमाल आम लड़ाइयों में किया जा सकता है. ये मिलिट्री टारगेट को तबाह कर सकते हैं, इसकी विनाशक शक्ति GBU-57A/B मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर (MOP) से भी ज़्यादा होती है, इसका इस्तेमाल US ने पिछले साल ईरान के खिलाफ ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के दौरान किया था.
माना जाता है कि इन नए पेश किए गए हर टैक्टिकल वॉरहेड की यील्ड 5 से 7 किलोटन के बीच है, जो हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु ‘लिटिल बॉय’ की ताकत का एक-तिहाई है.
ईरान के खिलाफ अमेरिका इसका इस्तेमाल कैसे करेगा?
स्कॉलर रॉबर्ट पेप ‘स्मार्ट म्यूनिशन ट्रैप’ को सटीक एयर पावर के साथ ऐसी उम्मीद बताते हैं जो कारगर नहीं होता है. अगर US इस ट्रैप से बाहर निकलता है, यह महसूस करते हुए कि स्मार्ट हथियार नतीजे नहीं दे रहे हैं, तो वह TNW ट्रैप में फंस सकता है. इससे यह विश्वास पैदा होगा कि TNWs लड़ाई के मैदान में रिजल्ट देने पर मजबूर कर देंगे, लेकिन यह धारणा ज्यादा खतरनाक है.
कोल्ड वॉर के दौरान US ने एक बार TNWs को लिमिटेड, नॉन-स्ट्रेटेजिक न्यूक्लियर हमले का जवाब देने, कमांड सेंटर, एयरफील्ड और डैम जैसे मज़बूत, हाई-वैल्यू मिलिट्री टारगेट को नष्ट करने, या बड़े पैमाने पर कन्वेंशनल फोर्स की बढ़त को टक्कर देने के लिए इस्तेमाल किया था.
TNWs को उनके विध्वंसक नतीजों और तेजी से स्ट्रेटेजिक हथियारों के इस्तेमाल में बदलने की आशंका के कारण वापस ले लिया गया था. TNWs की चर्चा फिर से इसलिए शुरू हुई क्योंकि रूस, चीन और उत्तर कोरिया के न्यूक्लियर हथियारों के जखीरे में बढ़ोतरी हुई है.
US इन तीन दुश्मनों के साथ लड़ाई में TNWs का इस्तेमाल लड़ाई को निर्णायक बनाने, जंग को बढ़ने से रोकने, या केमिकल और बायोलॉजिकल हथियारों के इस्तेमाल का जवाब देने के लिए कर सकता है.
ईरान के खिलाफ अमेरिका ईरानी सरकार को सरेंडर करने के लिए मजबूर करने के लिए ‘धक्का और दहशत’ की रणनीति के तहत इसका इस्तेमाल कर सकता है. यह चेतावनी देने के लिए एक सिग्नलिंग भी हो सकता है. जैसे- किसी खाली जगह पर ब्लास्ट करके जंग को एस्क्लेट करने का मंशा को साफ साफ बता देना. या फिर जमीन में गहरे दबे हुए फोर्डो जैसे एनरिचमेंट फैसिलिटी को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए ऐसे बमों को गिराना.
किसी भी हाल में अगर US न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल करता है, तो वह भीषण खतरनाक और अनिश्चित, अनिर्णय की स्थिति में जा रहा होगा.
इससे दुनिया भर में खतरनाक घटनाओं की एक सीरीज़ शुरू हो जाएगी, जिससे नॉन-न्यूक्लियर देश बम बनाने के लिए मजबूर होंगे और न्यूक्लियर हथियार वाले देश अपने हथियारों का जखीरा बढ़ाएंगे. इसीलिए पूर्व सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट एंथनी ब्लिंकन जैसे पुराने US अधिकारियों ने ट्रंप को 'ऑफ-रैंप' जीत का ऐलान करने की सलाह दी थी, यह कहते हुए कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई अब मर चुके हैं और ईरान के न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम अब 'डिग्रेड' हो गए हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप ऐसे किसी जीत को स्वीकार करेंगे?
संदीप उन्नीथन