15 देश खिलाफ, टॉप लीडरशिप भी खत्म.. जानें- फिर कैसे पलटवार कर रहा ईरान

इस युद्ध में यूरोप के तीन बड़े देशों की एंट्री हो गई और ये तीन देश ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी हैं. इन तीनों देशों ने संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि वो इस युद्ध में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का साथ देने के लिए तैयार हैं.

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खामेनेई समेत टॉप लीडरशिप खत्म होने पर भी कैसे हो रहा पलटवार. (Photo: ITG) खामेनेई समेत टॉप लीडरशिप खत्म होने पर भी कैसे हो रहा पलटवार. (Photo: ITG)

आजतक ब्यूरो

  • नई दिल्ली,
  • 02 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:28 AM IST

अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान को धुआं-धुआं कर दिया है. सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई समेत ईरान की पूरी टॉप लीडरशिप को खत्म कर दिया गया है लेकिन सवाल है कि इसके बावजूद ईरान पलटवार कैसे कर पा रहा है?

इसका सीधा सा जवाब है कि ईरान ने इन परिस्थितियों के लिए खुद को लगभग चार दशकों तक तैयार किया है. ईरान में मचे इसे कोहराम से ईरान की सेना प्रतिशोध की ऐसी आग में जल रही है कि उसने अपनी मिसाइलों और Combat Drones से मिडिल ईस्ट में तबाही मचा दी है.

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जेरूसलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान अब तक अपने दुश्मन देशों पर एक हजार 481 मिसाइलें और Combat Drones दाग चुका है. इनमें 588 मिसाइलें और 893 Combat Drones हैं. इनमें सबसे ज्यादा 370 मिसाइलें और 12 ड्रोन इजरायल पर दागे गए हैं. इसके बाद यूएई पर 167 मिसाइलों और 541 कॉम्बैट ड्रोन से हमला हुआ है. कुवैत पर 97 मिसाइलें और 283 कॉम्बैट ड्रोन दागे गए हैं.

कतर पर 66 मिसाइलें और 12 Drones से हमला हुआ है. बहरीन पर 45 मिसाइलें और 9 ड्रोन दागे गए हैं. इराक पर 7 मिसाइलें दागी गई हैं जबकि इराक में ईरान की तरह बहुसंख्यक आबादी शिया मुसलमानों की है और वहां 65 से 70 फीसदी शिया मुसलमान हैं. जॉर्डन पर भी ईरान ने 13 बैलेस्टिक मिसाइलें और 36 ड्रोन से हमला हुआ है जबकि सीरिया पर एक मिसाइल गिरी है. ओमान पर दो ड्रोन से हमला हुआ और अब तो ईरान की ये मिसाइलें इजरायल से भी आगे बढ़कर साइप्रस पहुंच गई हैं.

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अब तक ईरान मिडिल ईस्ट के देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा था लेकिन अब साइप्रस में उसने 'ब्रिटिश एयरबेस को ड्रोन हमलों से निशाना बनाकर इस युद्ध की आग को और भड़का दिया है. ईरान ने ये हमला आधी रात को किया, जिससे एयरफील्ड को नुकसान हुआ.

कौन सा देश किसके पाले में खड़ा?

अब इस युद्ध में यूरोप के तीन बड़े देशों की एंट्री हो गई और ये तीन देश ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी हैं. इन तीनों देशों ने संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि वो इस युद्ध में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का साथ देने के लिए तैयार हैं. इन देशों ने ये भी कहा है कि ईरान ने उन देशों पर हमला करके बहुत बड़ी गलती की है, जो उसके खिलाफ हुई 'सैन्य कार्रवाई' में शामिल नहीं थे. इसका सीधा सा मतलब ये है कि अब इस युद्ध में ईरान के खिलाफ 15 देश एकजुट हो गए हैं और अब इस युद्ध को रोकना नामुमकिन होता जा रहा है.

क्षेत्रफल के मामले में पूरे मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा देश सऊदी अरब है और कहा जा रहा है कि ईरान ने इजरायल के बाद सबसे ज्यादा मिसाइलें सऊदी अरब पर ही दागी हैं लेकिन हैरानी की बात ये है कि सऊदी अरब लगातार इन हमलों को छिपाने की कोशिश कर रहा है.

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सऊदी अरब अकेला ऐसा देश है, जिसने अब तक ये नहीं बताया है कि ईरान ने उस पर कितनी मिसाइलें दागी हैं. इससे भी ज्यादा बड़ी बात ये है कि सऊदी अरब ने एक एडवाइजरी जारी की है, जिसमें सभी लोगों से ये कहा गया है कि वो ना तो किसी भी हमले का वीडियो बनाए और ना ही सोशल मीडिया पर इसके बारे में कोई बात करें.

इसी तरह का आदेश 'कतर, बहरीन और कुवैत' ने भी जारी किया है और ये कहा है कि जो भी व्यक्ति ईरान के हमलों का वीडियो बनाएगा, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी. ये देश ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इससे इनकी सुरक्षित देश की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है और दुनिया अब दुबई, अबू धाबी और सऊदी अरब की इन तस्वीरों को देख कर डर रही है. इनमें भी भारत के लोग सबसे ज्यादा हैरान हो रहे हैं, जो अब गोवा से ज्यादा दुबई में छुट्टियां मनाना पसंद करते हैं.

आपको यकीन नहीं होगा कि साल 2024 में भारत के सबसे ज्यादा 77 लाख लोग UAE गए थे जबकि इसी सूची में सऊदी अरब दूसरे नंबर पर था, जहां भारत के 34 लाख लोग आए थे लेकिन अब ये देश ईरान के निशाने पर हैं और वहां कैसे ईरान की मिसाइलें और बारूद से भरे ड्रोन तबाही मचा रहे हैं.

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ईरान ने आज सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको की रिफाइनरी को भी निशाना बनाने की कोशिश की, जिसके बाद इस 'रिफाइनरी' को फिलहाल के लिए बन्द कर दिया गया. इसके अलावा आज सबसे भयानक तस्वीरें कुवैत से आई हैं, जहां अमेरिका के एक F-15E लड़ाकू विमान को क्रैश होते हुए देखा गया और इसके बाद कुवैत के रक्षा मंत्रालय ने जो दावा किया, उसने तो इस युद्ध में अमेरिका के नुकसान पर बड़ी बहस छेड़ दी.

कुवैत के रक्षा मंत्रालय का दावा है कि आज कई अमेरिकी लड़ाकू विमान उसके ''हवाई क्षेत्र'' में क्रैश हुए हैं, जिनमें एक विमान का मलबा कुवैत की उस तेल रिफाइनरी में गिरा है, जिसे मीना अल अहमदी रिफाइनरी कहा जाता है. इस घटना से इस तेल रिफाइनरी में काम करने वाले लोग घायल हो गए हैं और शुरूआती जांच में माना जा रहा है कि ये Friendly Fire का मामला हो सकता है यानी संभव है कि कुवैत के एयर डिफेंस सिस्टम ने इसे ईरान का लड़ाकू विमान समझा और बाद में इस पर हमला करके इसे वहां क्रैश करा दिया.

इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में ईरान के प्रॉक्सी हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं, जिनमें अब तक 30 मौतों की पुष्टि हो चुकी हैं हालांकि इजरायल का कहना है कि उससे पहले हिज्बुल्ला ने खामेनेई की मौत का बदला लेने के लिए उस पर मिसाइलें दागी थीं और इजरायल के कई सीमावर्ती गांवों को निशाना बनाया था.

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ईरान की मजबूती का राज क्या है?

ये बात पूरी दुनिया को हैरान कर रही है कि जब इजरायल और अमेरिका ने अयातुल्ला खामेनेई समेत ईरान की पूरी टॉप लीडरशिप को खत्म कर दिया, तब भी ईरान पलटवार कैसे कर पा रहा है? तो इसका सही जवाब ये है कि ईरान ने इन परिस्थियों के लिए खुद को लगभग चार दशकों तक तैयार किया है।

फरवरी 1979 में जब ईरान में राजशाही को हटाकर अल्लाह का शासन लाया गया, तब इस इस्लामिक शासन की रक्षा करने के लिए एक फोर्स बनाई गई थी. इस फोर्स का नाम था आईआरजीसी जिसकी स्थापना पांच मई 1979 को की गई थी. उस वक्त इसे ये जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि किसी भी युद्ध, संघर्ष और विद्रोह की स्थिति में इस फोर्स को इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की रक्षा करनी होगी.

धीरे-धीरे ये फोर्स ईरान में वहां की सेना से भी ताकतवर बन गई और इसने एक ऐसी रणनीति बनाई, जिससे ईरान नेतृत्व विहिन होते हुए भी दुश्मनों का सामना कर सके. आज भी अमेरिका और इजरायल लगातार ईरान पर बारूद तो बरसा रहे हैं लेकिन इतने हमलों के बाद भी ईरान हार नहीं है. ईरान पूरी ताकत के साथ अपने दुश्मनों पर मिसाइलें दाग रहा है और उसे रोकना अब तक काफी मुश्किल साबित हुआ है.

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ईरान जानता था कि अगर उसने अपने मिसाइल ठिकानों को दुश्मन की नजरों से नहीं बचाया तो वो इस युद्ध में अगले ही दिन हार जाएगा. इसके लिए ईरान ने अपने पहाड़ों और पर्वत श्रृंखला को हथियार बनाया. पश्चिमी ईरान में जो Zagros पर्वतमाला है, वहां ईरान ने Missile Cities बनाई. ये पहाड़ी चट्टानों को खोदकर बनाए गए वो शहर थे, जिनके नीचे बड़ी बड़ी सुरंगे थीं. इन्हीं सुरंगों में अलग-अलग जगहों पर मिसाइलों का विशाल जखीरा तैनात किया गया. ईरान जानता था कि इन सुरंगों को सैटेलाइट से कभी ढूंढ नहीं जा सकेगा. इसके अलावा ईरान ने इन्हीं पहाड़ों पर बंकर बनाए और उन बंकर में सैकड़ों मोबाइल लॉन्चर खड़े कर दिए.

इससे हुआ ये कि अब ईरान इस तरह के ट्रकों पर अपनी मिसाइलों को रखकर उन्हें दुश्मन देशों पर आसानी से दाग सकता है और बाद में किसी भी तरह के हमलों से बचने के लिए इन 'मोबाइल लॉन्चर' को वापस से बंकर में छिपाकर इन्हें सुरक्षित रख सकता है आज भी ईरान इन्हीं Zagros पर्वतमाला से लगातार मिसाइल हमले कर रहा है और क्योंकि ये मिसाइल ठिकाने कुछ स्थानों की जगह सैकड़ों जगहों पर फैले हुए हैं इसलिए अमेरिका और इजरायल के कई हमलों के बाद भी ईरान के पलटवार को रोकना अब तक मुश्किल साबित हुआ है.

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ईरान के पास इतनी मिसाइलें कहां से आईं?

इसके अलावा इन मिसाइल ठिकानों का रिमोट आईआरजीसी के हाथ में है. कहा जाता है कि इस फोर्स का हर सैनिक अपने आप में हेड है और उसे किसी से आदेश की ज़रूरत नहीं है. अमेरिका और इजरायल इस फोर्स के सबसे बड़े नेता को तो मार सकते हैं लेकिन वो इस पूरी फोर्स को खत्म नहीं कर सकते, जिसमें एक लाख से ज्यादा सैनिक हैं. इन सैनिकों का एक ही काम है और वो है आखिर दम तक ईरान के इस्लामिक शासन की रक्षा करना और अभी वो यही कर रहे हैं.

लेकिन ईरान के पास इतनी सारी मिसाइलें आई कहां से. इसके पीछे अमेरिका के एक और दुश्मन का हाथ है और उस दुश्मन का नाम है उत्तर कोरिया. साल 1980 से 1988 के बीच जब ईरान और इराक का युद्ध लड़ा गया, तब ईरान के पास बैलेस्टिक मिसाइलें नहीं थी. इराक तो लगातार इस युद्ध में ईरान पर मिसाइलें दाग रहा था लेकिन ईरान कुछ नहीं कर पा रहा था. ऊपर से अमेरिका भी इराक की लगातार मदद कर रहा था ईरान पर दबाव बढ़ता जा रहा था. इसी दौर में उत्तर कोरिया ने अपने दुश्मन के दुश्मन को अपना दोस्त बताया. उसने अमेरिका के खिलाफ ईरान को बैलेस्टिक मिसाइलें देने का फैसला किया.

दोनों देशों के बीच ये तय हुआ कि ईरान उत्तर कोरिया के मिसाइल प्रोेग्राम के लिए आर्थिक मदद देगा और बदले में उत्तर कोरिया बैलेस्टिक मिसाइलों की Technology Transfer करेगा. साल 1987 में उत्तर कोरिया ने पहली बार 'Scud-B' मिसाइलों का पहला जखीरा ईरान को भेजा. इसके बाद जब इन्हीं Scud मिसाइलों का नया संस्करण आया तो उत्तर कोरिया ने साल 1993 में 200 Scud-C मिसाइलें ईरान को दीं, जिनकी मारक क्षमता 700 किलोमीटर तक थी.

सबसे बड़ा टर्निंग पॉयंट साल 1993 में आया, जब उत्तर कोरिया और ईरान के बीच एक ऑयल डील हुई. इस डील के तहत ईरान उत्तर कोरिया को कच्चा तेल देने वाला था और उत्तर कोरिया ईरान को लंबी दूरी की मिसाइलें देने वाला है.

जुलाई 1998 में ईरान ने पहली बार उत्तर कोरिया से खरीदी गई मीडिय रेंज की मिसाइल की परीक्षण किया, जिसे उत्तर कोरिया में No-Dong मिसाइल कहा जाता था. यहां से ईरान पीछे नहीं मुड़ा. उसने कई खतरनाक मिसाइलें बनाईं, जो आज पूरे मिडिल ईस्ट और यूरोप के आधे देशों को निशाना बना सकती है. उत्तर कोरिया ने ईरान की मदद करके अपने दुश्मन देश अमेरिका को कड़ा संदेश दिया तो रशिया भी इसमें पीछे नहीं रहा.

आज ईरान की 38 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है. 9 करोड़ की आबादी में 3 करोड़ 27 लाख लोग गरीबी और भूखमरी का सामना कर रहे हैं और इसका कारण ये है कि ईरान ने अपना सारा पैसा गरीबी हटाने पर नहीं बल्कि अपने दुश्मनों को मिटाने पर खर्च किया। और खुद को उस युद्ध के लिए तैयार किया, जो आज वो लड़ रहा है. Kpler का कहना है कि अगर ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मिसाइल दागकर इस समुद्री रास्ते को बंद कर दिया तो कच्चे तेल की कीमतें 75 डॉलर प्रति बैरल से 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं.

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