पिछले तीन हफ्तों से पूरी दुनिया की नजरें बस एक ही बात पर टिकी हैं, क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान में अपनी फौज भेजेंगे? वैसे तो ट्रंप इस मामले में काफी सीक्रेट रहे हैं, लेकिन सैटेलाइट की नजरों से कुछ नहीं छिप पाया. ताजा सैटेलाइट तस्वीरों ने हलचल मचा दी है. खबर है कि 2,200 घातक मरीन सैनिकों से लैस अमेरिका का एक नया युद्धपोत, यूएसएस त्रिपोली, मिडिल ईस्ट की ओर निकल चुका है. दिलचस्प बात ये है कि इस वक्त ये जहाज दक्षिण हिंद महासागर में भारत के काफी करीब है. जानकार मान रहे हैं कि अगले हफ्ते से ईरान युद्ध एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच सकता है.
गुरुवार को जब मीडिया ने ट्रंप को इस बारे में घेरा, तो उन्होंने अपने अंदाज़ में चुटकी लेते हुए कहा, 'मैं कहीं भी सेना नहीं भेज रहा हूं. अगर भेज भी रहा होता, तो किसी को बताता नहीं.' अब ट्रंप की ये बातें कितनी सच हैं और कितनी नहीं, ये तो वक्त बताएगा, क्योंकि वो अपने अप्रत्याशित फैसलों के लिए ही जाने जाते हैं. अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि ट्रंप ईरान में अपने अभियान को और मजबूत करने के लिए हजारों सैनिकों की तैनाती पर काफी गंभीरता से विचार कर रहे हैं.
अब सवाल उठता है कि अमेरिका आखिर जमीनी स्तर पर अपनी सेना क्यों उतारना चाहता है? इसके पीछे दो बहुत बड़े कारण हैं. पहला तो है 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को फिर से खोलना. आपको बता दें कि दुनिया का 20% तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है. 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने इस रास्ते को लगभग ठप कर दिया है, जिससे पूरी दुनिया में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. ईरान ने भले ही भारत और पाकिस्तान की तरफ जाने वाले कुछ टैंकरों को रास्ता दे दिया हो, लेकिन पश्चिमी देशों के जहाजों पर हमले की धमकी भी दे रखी है. ऊपर से वो अब यहां से गुजरने वालों से मनमाना टैक्स भी वसूल रहा है. एक टैंकर ऑपरेटर ने तो यहां तक दावा किया है कि उसे सुरक्षित निकलने के लिए करीब 20 लाख डॉलर रुपये देने पड़े.
क्या यूएसएस त्रिपोली बनेगा ट्रंप का सबसे बड़ा हथियार?
ट्रंप चाहते हैं कि उनके साथी देश भी इस रास्ते की सुरक्षा के लिए अपने युद्धपोत भेजें, लेकिन अभी तक वहां से कोई खास रिस्पॉन्स नहीं मिला है. ऐसे में यूएसएस त्रिपोली ट्रंप के लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकता है. जानकारों का कहना है कि अगर ट्रंप को तेल का ये रास्ता सुरक्षित करना है, तो उन्हें ईरान के तट पर अपने सैनिक उतारने ही होंगे. चूंकि ईरान की नौसेना का काफी हिस्सा पहले ही तबाह हो चुका है, इसलिए अमेरिका के लिए ये कम जोखिम वाला काम हो सकता है. कुछ अधिकारियों का मानना है कि ट्रंप इन मरीन सैनिकों का इस्तेमाल ईरान के छोटे द्वीपों पर कब्जा करने के लिए कर सकते हैं, ताकि वहां से कमर्शियल जहाजों की सुरक्षा की जा सके.
दूसरी बड़ी वजह है ईरान का परमाणु खजाना. बताया जा रहा है कि ईरान के पास करीब 950 पाउंड से ज्यादा उच्च संवर्धित यूरेनियम है, जिसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में हो सकता है. ये सारा यूरेनियम उन ठिकानों के मलबे के नीचे दबा है जहां अमेरिका और इजरायल ने बमबारी की थी. अब इस खजाने को सुरक्षित करने के लिए जमीनी सेना की जरूरत पड़ेगी. ट्रंप शुरू से ही एक बात पर अड़े रहे हैं कि वो ईरान को कभी भी परमाणु बम नहीं बनाने देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी कदम उठाना पड़े.
यहां यूएसएस त्रिपोली की एंट्री बहुत अहम है. इस पर जापान के ओकिनावा में स्थित 31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट के 2,200 सैनिक सवार हैं. सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, ये सैनिक जमीनी और हवाई युद्ध, हर जगह लड़ने में माहिर हैं. ये कोई मामूली युद्धपोत नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता किला है जिस पर एफ-35 स्टील्थ लड़ाकू जेट और घातक हेलीकॉप्टर तैनात हैं. अगर ट्रंप अगले हफ्ते इन सैनिकों को उतारने का फैसला करते हैं, तो 20 साल में ये पहली बार होगा जब अमेरिकी सेना किसी बड़े युद्ध क्षेत्र में जमीन पर कदम रखेगी.
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