'ईरानी जहाज का डूबना भारत की गलती नहीं', हिंद महासागर में अमेरिकी हमले को लेकर क्या कह रहे एक्सपर्ट

4 मार्च को हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत IRIS डेना को डुबो दिया. ये जहाज हाल ही में भारत में नौसैनिक अभ्यास में भाग लेकर लौट रहा था. भारत ने इस घटना पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है, जबकि विपक्ष ने सरकार की चुप्पी की आलोचना की है.

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ईरानी जहाज IRIS डेना भारत से लौट रहा था तभी अमेरिका ने उसे डुबो दिया ईरानी जहाज IRIS डेना भारत से लौट रहा था तभी अमेरिका ने उसे डुबो दिया

अभिषेक डे

  • नई दिल्ली,
  • 06 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:04 PM IST

4 मार्च को ईरान युद्ध ने एक खतरनाक मोड़ ले लिया. जब भारत में होली मनाई जा रही थी, उसी समय यह संघर्ष देश के रणनीतिक क्षेत्र के करीब पहुंच गया. एक अमेरिकी पनडुब्बी ने हिंद महासागर में ईरान के एक निहत्थे युद्धपोत पर टॉरपीडो से हमला कर उसे डुबो दिया. इस हमले में 80 से अधिक नाविकों की मौत हो गई और करीब 100 लापता बताए जा रहे हैं. यह घटना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि डूबा हुआ युद्धपोत IRIS डेना भारतीय नौसेना की तरफ से आयोजित दो अभ्यासों में हिस्सा लेने के बाद लौट रहा था.

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इस घटना को लेकर भारत सरकार की भारी आलोचना हो रही है. कांग्रेस ने इसे इस तरह पेश किया है कि अपने ही पड़ोस में भारत का प्रभाव कमजोर पड़ गया है. लेकिन क्या इस घटना के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराना सही है?

इस सवाल के जवाब पर आने से पहले यह समझना जरूरी है कि यह घटना भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है. इस घटना ने साफ कर दिया कि कुछ ही दिन पहले शुरू हुआ अमेरिका-इजरायल का ईरान के खिलाफ युद्ध केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं है. अब यह भारत के रणनीतिक क्षेत्र तक पहुंच चुका है.  

हिंद महासागर में कैसे डूबा ईरानी जहाज?

IRIS डेना ईरानी नौसेना के दक्षिणी बेड़े की एक फ्रिगेट थी जो 16 फरवरी को विशाखापत्तनम पहुंची थी. वो यहां अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू (IFR) और बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास MILAN-2026 में हिस्सा लेने आई थी. भारत के ईस्टर्न नेवल कमांड ने गर्मजोशी से उसका स्वागत किया था.  

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भारतीय नौसेना ने उस समय सोशल मीडिया पर लिखा था कि 'विशाखापत्तनम पहुंचने पर ईरानी नौसेना के IRIS डेना का स्वागत किया गया, जो दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सांस्कृतिक संबंधों को दिखाता है.'

इस अभ्यास में करीब 74 देशों ने हिस्सा लिया था, लेकिन अमेरिका इसमें शामिल नहीं हुआ. अमेरिकी नौसेना का गाइडेड-मिसाइल डेस्ट्रॉयर USS Pinckney इसमें शामिल होने वाला था, लेकिन उसने आखिरी समय पर भारत आने का अपना प्रोग्राम रद्द कर दिया. भारत में चल रहा ये अभ्यास 25 फरवरी को समाप्त हुआ. इसके तीन दिन बाद अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, जिसके बाद पूरा मध्य-पूर्व युद्ध की चपेट में आ गया.  

4 मार्च को IRIS Dena विशाखापत्तनम से लौटते समय श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास अमेरिकी हमले का शिकार हो गया.

अमेरिका ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में उसने ईरानी जहाज को डुबो दिया. 

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि एक अमेरिकी पनडुब्बी ने उस ईरानी युद्धपोत को डुबो दिया जो खुद को अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षित समझ रहा था. ईरानी जहाज को टॉरपीडो से निशाना बनाया गया.  

ईरान ने कहा कि जहाज इंडियन नेवी का मेहमान था और अमेरिका को अपने किए पर बहुत पछताना होगा. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने कहा कि लगभग 130 नाविकों को लेकर जा रही फ्रिगेट Dena को बिना किसी चेतावनी के अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में निशाना बनाया गया.

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मोदी सरकार की चुप्पी और विपक्ष के हमले

जहाज को डुबोया जाना युद्ध का भारत के करीब पहुंचना माना जा रहा है. जिस क्षेत्र में ईरानी जहाज डुबोया गया, वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'महासागर' (MAHASAGAR) रणनीति से जुड़ा इलाका है, जिसमें भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता का प्रमुख स्तंभ माना जाता है.  

अमेरिकी पनडुब्बी ने जिस जगह से ईरानी जहाज पर हमला किया वहां भारत और श्रीलंका अक्सर मिलकर पेट्रोलिंग करते हैं. ऐसी जगह अमेरिकी पनडुब्बी का होना भारत के लिए स्ट्रैटेजिक चिंताएं पैदा कर सकता है.

अब तक नरेंद्र मोदी सरकार ने इस घटना पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है, हालांकि उसने इस दावे को खारिज किया है कि अमेरिका भारत के बंदरगाहों का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए कर रहा है.  

सरकार की इस चुप्पी को लेकर विपक्ष ने तीखी आलोचना की है. कांग्रेस ने सवाल उठाया कि क्या अपने ही पड़ोस में भारत का प्रभाव अमेरिका और इजरायल के हाथों में चला गया है. कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का समझौता भारत को शर्मिंदा कर रहा है और यह कायरता स्वीकार नहीं की जा सकती.

 

पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने भी भारत की चुप्पी पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि क्या भारत इतना कमजोर हो गया है कि अमेरिका से यह नहीं कह सकता कि वो भारत के पास एक ईरानी जहाज को डुबोकर 80 नाविकों की हत्या नहीं कर सकता.  

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यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब सरकार पर पहले से ही यह आरोप लग रहे हैं कि ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंधों के बावजूद, उसने ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों की स्पष्ट निंदा नहीं की. हालांकि, सरकार इसे जिम्मेदार कूटनीति बताते हुए संतुलन की नीति कह रही है.  

क्या ईरानी जहाज के डूबने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

अब मुख्य सवाल पर आते हैं कि क्या ईरानी जहाज के डूबने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

विशेषज्ञों और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों का कहना है कि इस घटना के लिए भारत को दोष नहीं दिया जा सकता. इसके अलावा यह घटना श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र के पास हुई, जिससे भारत के लिए खुद को अलग रखना आसान हो जाता है.  

यह भी याद रखना चाहिए कि हिंद महासागर में भारत का अधिकार क्षेत्र सीमित है. भारत का विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) उसके तट से केवल 200 नॉटिकल मील यानी लगभग 370 किलोमीटर तक ही फैला हुआ है. IRIS डेना इसी सीमा के बाहर डुबोई गई थी.  

'ईरानी जहाज को भारत में ही रुक जाना चाहिए था'

रक्षा विशेषज्ञ संदीप उन्नीथन का कहना है कि इसमें भारत की कोई गलती नहीं है और किसी जहाज के आने-जाने के लिए भारत को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.  

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इंडिया टुडे से बात करते हुए उन्होंने कहा, 'ये हमारी गलती नहीं है. भारत को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. ईरानी जहाज ने भी हमसे किसी तरह की मदद, एस्कॉर्ट या सुरक्षा की मांग नहीं की थी.  

उनके मुताबिक, जहाज के कैप्टन को पता था कि ईरान युद्ध में है, इसलिए उसे भारत से शरण मांगनी चाहिए थी. वो किसी भारतीय बंदरगाह पर रुक सकता था और कुछ समय के लिए वहीं ठहर सकता था.  

उन्होंने कहा, 'अमेरिका ईरानी नौसेना पर हमला कर रहा था. ऐसे में जहाज का कैप्टन किसी भारतीय बंदरगाह में आकर शरण मांग सकता था. इसमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए थी. वो कुछ समय वहां रह सकते थे. लेकिन ये कहना कि ईरानी जहाज वहां था और भारतीय नौसेना को अपने-आप आगे बढ़कर उसे सुरक्षा देना चाहिए थी क्योंकि हमने उनकी मेजबानी की थी, यह सही नहीं है. किसी जहाज ने किसी प्रोग्राम या अभ्यास के बाद क्या किया, उसके लिए कोई देश जिम्मेदार नहीं होता.'

उन्नीथन की बात को दोहराते हुए लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे ने कहा कि ईरानी जहाज ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में भारतीय नौसेना से किसी एस्कॉर्ट की मांग नहीं की थी. 

उन्होंने कहा, 'जब कोई जहाज हमारे क्षेत्रीय जलक्षेत्र से बाहर निकल जाता है, तो हमारी निगरानी वहीं खत्म हो जाती है. हम तब तक उनकी निगरानी नहीं रख सकते जब तक कि वो अपने घर तक न पहुंच जाएं. उनका देश युद्ध में है. उन्हें भारत की शरण में ही रहना चाहिए था.'

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हालांकि, यह तर्क दिया जा सकता है कि अमेरिका ने भारत की संवेदनशीलताओं को नजरअंदाज किया, क्योंकि ईरानी जहाज इन जलक्षेत्रों में भारत के बुलावे पर नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने आया था. 

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने ट्वीट कर कहा, 'अगर हमने उसे अपने अभ्यास में भाग लेने के लिए न बुलाया होता तो ईरानी जहाज वहां नहीं होता… अमेरिका के हमले के लिए हम राजनीतिक या सैन्य रूप से जिम्मेदार नहीं हैं. हमारी जिम्मेदारी नैतिक और मानवीय स्तर पर है.'

LEMOA समझौते पर फोकस

इस बीच एक और मुद्दा चर्चा में है- अमेरिका और भारत के बीच 2016 में हुआ समुद्री लॉजिस्टिक्स समझौता LEMOA. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध के माहौल में अमेरिका भारत से इस समझौते को सक्रिय करने का दबाव डाल सकता है, ताकि अमेरिकी नौसैनिक संसाधन जरूरत पड़ने पर भारतीय जलक्षेत्र का इस्तेमाल कर सकें.  

हालांकि LEMOA के तहत लॉजिस्टिक सहायता केवल तभी दी जाती है जब भारत हर मामले में अलग-अलग सहमति देता है. यह समझौता भारत को किसी युद्ध में स्वतः शामिल होने के लिए बाध्य नहीं करता.  

तथ्य यही बताते हैं कि ईरानी जहाज अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में था. इसलिए किसी नौसैनिक अभ्यास के बाद वो जहाज क्या करता है, उसके लिए भारत को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.  

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