मिडिल ईस्ट में जारी संकट के बीच पूरे दुनिया में ऊर्जा संकट पर तेजी से खतरा मंडराने लगा है. अमेरिका-इजरायल का ईरान पर हमले को दो सप्ताह से ज्यादा समय हो चुके हैं. जंग तीसरे सप्ताह में है. हार्मुज स्ट्रेट बंद होने की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है. इन सब के बीच अमेरिका ने ईरानी तेल को लेकर बड़ा फैसला लिया है. उम्मीद जताई जा रही है कि अमेरिका के इस फैसले से तेल की कीमतों पर काबू पाया जाएगा.
ट्रंप सरकार ने कहा है कि ईरान के तेल पर जो पाबंदी लगी हुई थी, उसे अगले 30 दिनों के लिए थोड़ा ढीला किया जा रहा है. यानी इस दौरान ईरान का तेल खरीदा और बेचा जा सकता है बिना किसी सजा के डर के.
यह छूट उस तेल पर लागू होगी जो 20 मार्च से लेकर 19 अप्रैल के बीच जहाजों में भरा गया हो. मतलब जो तेल इस दौरान समुद्र के रास्ते भेजा जा रहा है, उस पर फिलहाल कोई कार्रवाई नहीं होगी.
इतना तेल बाजार में आएगा
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया कि इस फैसले की वजह से करीब 14 करोड़ बैरल तेल दुनिया के बाजार में आ सकता है. यह बहुत बड़ी मात्रा है. इतने तेल के आने से बाजार में सप्लाई बढ़ेगी और दाम नीचे आने की उम्मीद है.
यह पहली बार नहीं हुआ
जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है वो यह है कि पिछले सिर्फ दो हफ्तों में यह तीसरी बार है जब अमेरिका ने इस तरह की छूट दी है.
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इससे पहले रूस के तेल पर भी ऐसी ही राहत दी गई थी. यानी अमेरिका एक के बाद एक उन देशों के तेल पर से पाबंदी हटा रहा है जिन पर पहले उसी ने रोक लगाई थी. यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है क्योंकि ईरान और रूस दोनों अमेरिका के कट्टर दुश्मन माने जाते हैं.
अमेरिका ऐसा क्यों कर रहा है?
अब सवाल यह उठता है कि आखिर अमेरिका अपने दुश्मनों का तेल बाजार में क्यों आने दे रहा है? इसकी वजह सीधी है तेल के दाम. जंग की वजह से दुनियाभर में तेल की सप्लाई पर असर पड़ रहा था. जब सप्लाई कम होती है तो दाम बढ़ते हैं. और तेल के दाम बढ़ने का मतलब है पेट्रोल महंगा, डीजल महंगा, और इसका असर हर चीज की कीमत पर पड़ता है.
ट्रंप सरकार नहीं चाहती कि अमेरिका में महंगाई बढ़े. इसीलिए उन्होंने यह कदम उठाया ताकि बाजार में तेल ज्यादा आए और दाम काबू में रहें.
तो क्या ईरान को फायदा होगा?
यहीं पर असली चालाकी है. बेसेंट ने साफ कहा कि यह छूट ईरान की मेहरबानी से नहीं दी जा रही. बल्कि यह रणनीति इस तरह बनाई गई है कि ईरान के तेल का इस्तेमाल तो हो. लेकिन साथ ही ईरान पर दबाव भी बना रहे.
मतलब साफ़ है कि तेल बाजार में आएगा, दाम नीचे रहेंगे, अमेरिकी जनता को राहत मिलेगी. लेकिन ईरान के खिलाफ बड़ी नीति में कोई बदलाव नहीं आएगा. यह एक तरह का अस्थायी इंतजाम है, कोई समझौता नहीं.
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