अमेरिकी-ईरान के बीच अस्थायी सीजफायर और शांति वार्ता को लेकर पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में हैं. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बढ़ती नजदीकियों और ईरान की खुफिया एजेंसियों के साथ पुराने रिश्तों का इस्तेमाल कर वाशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत का रास्ता तैयार किया है. बताया जा रहा है कि मुनीर वर्तमान में अमेरिका-ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और फारस की खाड़ी में नौसैनिक नाकाबंदी को लेकर चल रही बातचीत में एक अनौपचारिक 'बैक चैनल' के रूप में काम कर रहे हैं. हालांकि, मुनीर की ये दोहरी भूमिका अमेरिकी विशेषज्ञों के बीच संदेह भी पैदा कर रही है.
पाकिस्तानी रिटायर्ड जनरल अहमद सईद ने फॉक्स न्यूज को बताया कि मुनीर कई महीनों से वाशिंगटन और तेहरान के बीच अनौपचारिक बैक-चैनल की भूमिका निभा रहे हैं. ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ संघर्ष, परमाणु कार्यक्रम और फारस की खाड़ी में नौसेना ब्लॉकेड खत्म करने के लिए बातचीत कर रहा है.
ईरानी खुफिया एजेंसियों से रिश्ते
सईद ने दावा किया कि आसिम मुनीर की ईरान में स्वीकार्यता का कारण उनके पुराने सैन्य और खुफिया संबंध हैं. मुनीर के संबंध ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के साथ साल 2016-17 से हैं, जब वो सैन्य खुफिया महानिदेशक थे.
इन्हीं पुराने रिश्तों के दम पर, जब मुनीर तेहरान पहुंचे तो ईरान में उनका जोरदार स्वागत हुआ और उन्होंने वरिष्ठ ईरानी सैन्य अधिकारियों के साथ बैठकें कीं, जबकि वह ट्रंप और उनकी टीम के साथ भी सीधे संपर्क में बने हुए हैं.
धोखेबाज है पाकिस्तान
मुनीर की बढ़ती शक्ति के बीच विशेषज्ञों ने ट्रंप प्रशासन को चेतावनी भी दी है. अमेरिकी थिंक टैंक 'फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज' के बिल रोगियो का कहना है कि पाकिस्तान के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए मुनीर और पाकिस्तानियों पर भरोसा नहीं करना चाहिए.
उन्होंने अफगानिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि पाकिस्तान एक विश्वासघाती सहयोगी रहा है, जिसने दोस्ती का नाटक करते हुए तालिबान का समर्थन किया था. मुनीर के IRGC के साथ संबंध ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा 'रेड फ्लैग' या खतरे का संकेत होने चाहिए.
PAK की विदेश नीति पर मुनीर का नियंत्रण
मुनीर के कार्यकाल में पाकिस्तान की विदेश नीति पर सेना का नियंत्रण पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है. आलोचकों का कहना है कि मुनीर ने राजनीतिक विपक्ष पर नकेल कसी है और सैन्य शक्ति का अभूतपूर्व केंद्रीकरण किया है.
द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और ईरान के साथ महत्वपूर्ण बातचीत अब इस्लामाबाद से नहीं, बल्कि रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय से संचालित हो रही है. विश्लेषक रज़ा रूमी के अनुसार, मुनीर का दृष्टिकोण वैचारिक के बजाय लेनदेनवादी (Transactional) है जो ट्रंप की कार्यशैली को काफी पसंद आ रहा है.
PAK का 'फेल्ड मार्शल'
आपको बता दें कि जनरल आसिम मुनीर और डोनाल्ड ट्रंप के बीच संबंधों की शुरुआत मई 2025 में भारत-पाकिस्तान संकट के दौरान हुई थी. मुनीर ने इस तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसके बाद पाकिस्तान ने ट्रंप का नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया था. उस वक्त युद्ध के मैदान में भारत से बुरी तरह मार खाने के बाद भी उन्हें (मुनीर) पाकिस्तानी सरकार ने पाकिस्तान का फील्ड मार्शल बनाया था, जिस पर दुनिया भर के विशेषज्ञों ने उन्हें फील्ड नहीं, बल्कि पाकिस्तान का 'फेल्ड मार्शन' बताया था.
इसी तरह अब उन्होंने ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौता में खुद को 'चौधरी' बनाने के चक्कर में पाकिस्तान की फजीहत करा दी है, क्योंकि इस्लामाबाद में हुई पहले दौर की शांति वार्ता बेनतीजा रही थी और अब वह फिर से दूसरे दौर की वार्ता के लिए दम भर रहा है. हालांकि, ईरान ने साफ कर दिया है कि वो इस वार्ता में शामिल नहीं होगा. इसके बावजूद पाकिस्तान ने अपने दो शहरों को मेहमाननवाजी के लिए सजा दिया है.
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मुनीर सार्वजनिक रूप से कम बोलते हैं, लेकिन उनके भाषण उनके नजरिए को दिखाते हैं. नवंबर 2024 में इस्लामाबाद में उन्होंने चेतावनी दी थी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए उचित नियमों का अभाव समाज के नैतिक मूल्यों को बिगाड़ रहा है. ये उनके आदेश, पदानुक्रम और केंद्रीकृत अधिकार पर जोर देने वाली मानसिकता को दिखाता है. रज़ा रूमी के मुताबिक, ट्रंप को मुनीर जैसे मजबूत और निर्णायक नेता पसंद आते हैं जो परिणामों की गारंटी दे सकें.
aajtak.in