साउथ एशिया की जंग जारी है. ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल की जंग को अब 25 दिन हो चुके हैं. इस तरह देखें तो वॉर अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है. फिर भी हमले अभी जारी हैं. शहरों बमबारी हो रही है और मिसाइलें भी दागी जा रही हैं. लेकिन धमाकों की दहशत भरी आवाज के बीच कुछ छोटी-छोटी फुसफुसाहटें भी हैं. इन फुसफुसाहटों में जंग को रोके जाने की बातें हैं. अटकलें हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सीजफायर की बात हो सकती है.
कहा जा रहा है कि स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुशनर और मोहम्मद बगेर गलीबाफ के जरिए ट्रंप जंग के बीच डिप्लोमेसी की राह भी देख रहे हैं. क्या ये तालमेल फिट बैठ सकता है? अगर हां तो बड़ा सवाल उभरता है कि इस पूरी प्लानिंग की बैकएंड स्टोरी क्या है? ये थॉट प्रोसेस कहां से हुआ है?
खबरें हैं कि विटकॉफ और कुशनर अमेरिकी हितों और इजरायल के साथ तालमेल बिठा रहे हैं. जबकि गलीबाफ ईरान की ओर से बातचीत की मेज पर शर्तें रख रहे हैं. CNN की एक रिपोर्ट की मानें तो ये सारी बातें एक लॉन से शुरू हुईं.
एक लॉन से निकला आइडिया!
हुआ यूं कि वॉशिंगटन से पिछले हफ्ते फ्लोरिडा के लिए रवाना होते समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप इस बारे में सोच रहे थे. ईरान के साथ युद्ध खत्म करने का विचार उनके जेहन में लग रहा था. व्हाइट हाउस के साउथ लॉन से शुक्रवार को हेलिकॉप्टर में बैठने से पहले उन्होंने कहा, 'जब आप सामने वाले को पूरी तरह खत्म कर रहे हों, तो सीज़फायर नहीं करते.' लेकिन महज़ तीन दिन, एक अल्टीमेटम और उनके मुताबिक तेहरान के एक रहस्यमय ऑफिसर से कुछ बातचीत के बाद ट्रंप का रुख बदल गया.
धमकी के तेवर से समझौते के सुर तक
सोमवार को टेनेसी के मेम्फिस में एक पब्लिक मीटिंग को संबोधित करते हुए, ग्रेसलैंड का दौरा करने से पहले उन्होंने कहा, 'वे समझौता करना चाहते हैं, और हम इसे पूरा करेंगे.' यह अचानक बदलाव प्रशासन की नीति में बड़ा मोड़ था. शनिवार शाम तक ट्रंप ईरान के पावर प्लांट्स पर हमला करने की धमकी दे रहे थे. उनके शब्द थे कि अगर 48 घंटे के भीतर होर्मुज नहीं खोला गया तो ईरान बड़े हमले के लिए तैयार रहे.
अब खबर है कि अमेरिका और ईरान के बीच इस हफ्ते बातचीत के लिए पाकिस्तान में बैठक का प्रस्ताव है, जिसमें उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी शामिल हो सकते हैं.
कैसे बदला-बदला सा है अमेरिका का रुख?
अमेरिका के रुख में बदलाव तब आया, जब खाड़ी देशों ने चेतावनी दी कि ईरान के सिविलयन पावर साइट पर अटैक लोकल लेवल पर डिजास्टरस एस्केलेशन ला सकता है. इसके अलावा, सोमवार को बातचीत के ऐलान के बाद वॉल स्ट्रीट में तेजी आई और ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट दर्ज हुई, जो ट्रंप प्रशासन के लिए परेशानी बनी हुई थीं.
हालांकि, बातचीत को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है. ट्रंप ने जिस ईरानी ऑफिसर का जिक्र किया, उसका नाम बताने से इनकार कर दिया. इसी बीच, अमेरिकी मरीन यूनिट्स का मध्य-पूर्व की ओर बढ़ना इस बात पर संदेह पैदा करता है कि बातचीत कितनी वास्तविक है.
...पर ईरान कर रहा हर दावे को खारिज
उधर, ईरान की ओर से इन दावों को खारिज किया गया. संसद अध्यक्ष मोहम्मद गलीबॉफ ने कहा कि अमेरिका के साथ कोई बातचीत नहीं हुई है. उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका ने ईरान की जवाबी कार्रवाई के डर से अपने हमले टाल दिए. हालांकि, ईरान ने यह पूरी तरह से नहीं नकारा कि बैक डोर से बातचीत हुई हो सकती है.
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान, तुर्किए, मिस्त्र, ओमान इस पूरे मामले में मध्यस्थता कर रहे हैं. इन प्रयासों का लक्ष्य सीजफायर के साथ-साथ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही तय करना है. बताया जा रहा है कि अमेरिका ने 15 पॉइंट्स का एक प्रपोजल पाकिस्तान के जरिए ईरान तक पहुंचाया है, हालांकि यह साफ नहीं है कि ईरान ने इनमें से किसी को स्वीकार किया है या नहीं. कुछ सूत्रों का कहना है कि इनमें से कई शर्तें ईरान के लिए स्वीकार करना लगभग असंभव हैं.
क्या हैं ट्रंप की शर्तें?
सोमवार को ट्रंप ने कहा कि उनकी प्रमुख शर्त यह है कि ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ईरान के उच्च स्तर पर समृद्ध यूरेनियम (highly enriched uranium) को अपने कब्जे में लेना चाहता है, जो इसफॉन के अटॉमिक सेंटर के नीचे मौजूद बताया जा रहा है. इसके अलावा, प्रपोजल में ईरान की सैन्य क्षमताओं पर रोक, प्रॉक्सी समूहों को समर्थन बंद करना और इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार करना जैसी शर्तें शामिल हैं.
ईरान में कौन हैं डिसीजन मेकर?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईरान की ओर से अंतिम निर्णय कौन लेगा. नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामनेई की स्थिति और उनकी भूमिका भी अभी क्लियर नहीं हो पा रही है. वहीं, विदेश मंत्री अब्बास अरागाची ओमान के जरिए बातचीत में शामिल हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कि वे ही अंतिम फैसला लेने वाले हैं.
ट्रंप ने मेम्फिस में कहा, 'मेरी पूरी जिंदगी नेगोशिएशन में बीती है. ईरान के साथ हम लंबे समय से बात कर रहे हैं, और इस बार वे गंभीर हैं' हालांकि, ज़मीनी हकीकत यह है कि बातचीत अभी शुरुआती दौर में है, कई प्रस्ताव टेबल पर हैं और किसी पर भी अंतिम सहमति नहीं बनी है. ऐसे में यह देखना अहम होगा कि क्या यह डिप्लोमेटिक कोशिशें असल में सीजफायर तक पहुंच पाती हैं या नहीं.
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