ट्रंप को नाकेबंदी पंसद है! समझें- फिर ईरान में क्यों नहीं चल पाई वेनेजुएला-क्यूबा जैसी दादागिरी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर वही नौसैनिक नाकेबंदी रणनीति लागू करना चाहते हैं, जो वेनेजुएला और क्यूबा में अपनाई गई थी, लेकिन ईरान ने यह फार्मूला कमजोर कर दिया है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर ईरान की पकड़, तेल सप्लाई पर असर और सैन्य जवाबी क्षमता अमेरिका के लिए चुनौती बन गई है.

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ईरान‑अमेरिका जंग ने दुनियाभर की मुश्किलें बढ़ा दी हैं (File Photo: ITG) ईरान‑अमेरिका जंग ने दुनियाभर की मुश्किलें बढ़ा दी हैं (File Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 6:33 PM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से दबाव की राजनीति में नौसैनिक नाकेबंदी को एक बड़े हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं. वेनेजुएला और क्यूबा पर इसी रणनीति के जरिए दबाव बनाया गया, लेकिन जब यही फार्मूला ईरान पर आजमाया गया तो हालात बिल्कुल अलग निकले.

रक्षा विशेषज्ञों और भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि खाड़ी क्षेत्र की वास्तविकता कैरेबियन देशों (वेनेजुएला और क्यूबा) से कोसों दूर है. यही कारण है कि ट्रंप की पसंदीदा रणनीति को मिडिल ईस्ट में कैरिबियन की तुलना में अलग चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

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न्यूज एजेंसी एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के खिलाफ अमेरिकी नौसेना की कार्रवाई का मकसद प्रतिबंधित तेल और दूसरे सामानों की आवाजाही रोकना है. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज, जहां से दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल की सप्लाई गुजरती है. ईरान ने इसे हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए क्यूबा या वेनेजुएला के विपरीत, ऊर्जा शिपमेंट के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर नाकेबंदी कर दी. इसका सीधा मतलब है कि यह युद्ध जितना लंबा चलेगा, वैश्विक अर्थव्यवस्था को उतना ही अधिक नुकसान होगा.

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका-ईरान युद्ध लंबा चला तो तेल और गैस की कीमतें और बढ़ सकती हैं. इसका असर अमेरिका समेत पूरी दुनिया में महंगाई और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है. चुनावी साल में बढ़ती ईंधन कीमतें ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक मुश्किल भी बन सकती हैं. 

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काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के वरिष्ठ फेलो और सैन्य इतिहासकार मैक्स बूट के अनुसार, 'अब सवाल यह है कि अमेरिका और ईरान में से किस देश की सहन शक्ति अधिक है? ईरान पर दबाव बनाना क्यूबा या वेनेजुएला जितना आसान नहीं होगा.'

रिपोर्ट में कहा गया है कि वेनेजुएला में ट्रंप की सफलता सिर्फ नाकेबंदी की वजह से नहीं, बल्कि अमेरिकी सैन्य छापेमारी और वहां के आंतरिक राजनीतिक समीकरण भी थे. वेनेजुएला और ईरान की स्थितियां भौगोलिक, सैन्य या राजनीतिक रूप से बिल्कुल अलग हैं. विपक्षी पार्टी मादुरो की सत्ता के खिलाफ थी. कई नेता जेल में बंद थे जो लगातार विरोध कर रहे थे. मादुरो को सत्ता से हटाने और उसके बाद उनकी उपराष्ट्रपति और अब कार्यवाहक राष्ट्रपति बनीं डेल्सी रोड्रिगेज से मिले भी अमेरिका को सीधा सहयोग मिला. वहीं ईरान में सभी एकजुटता दिखाते हुए अमेरिका के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं.

क्यूबा पर अमेरिका के तेल प्रतिबंध के कारण इस द्वीप को दशकों में सबसे गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा है. हालांकि अमेरिकी और क्यूबा के अधिकारियों ने हाल ही में इस द्वीप पर दुर्लभ बातचीत के लिए मुलाकात की है, लेकिन इस आर्थिक घेराबंदी से ट्रंप प्रशासन का घोषित लक्ष्य यानी नेतृत्व परिवर्तन - हासिल नहीं हो पाया है. 

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क्यूबा एक छोटा सा कैरिबियन द्वीप देश है, जहां सिर्फ 1 करोड़ 10 लाख लोग रहते हैं. यह अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य से मात्र 170 किलोमीटर दूर है. पिछले 67 सालों में अमेरिका के 13 राष्ट्रपतियों ने क्यूबा पर कब्जा करने या वहां अपनी सरकार लगाने की कोशिश की, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ. अब ट्रंप फिर वही पुरानी हसरत पूरी करना चाहते हैं.

फिलहाल क्यूबा की हालत बहुत खराब है. पूरा देश बिजली के बिना अंधेरे में डूबा हुआ है. न तेल है. न गैस है. न बिजली. घरों में लाइट नहीं जल रही. गैस चूल्हे बंद हैं. सड़कों पर गाड़ियां नहीं चल रही. अस्पतालों में ऑपरेशन नहीं हो पा रहे. फैक्टरियां बंद हैं. स्कूल-कॉलेज-दफ्तर सब बंद पड़े हैं.

यह संकट इसलिए आया क्योंकि क्यूबा अपनी बिजली मुख्य रूप से डीजल से बनाता है. पहले वह तेल वेनेजुएला से लेता था, लेकिन जब अमेरिका ने जनवरी 2026 में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाकर वहां अपना प्रभाव बढ़ाया, तो वेनेजुएला से क्यूबा को तेल की सप्लाई बंद हो गई. अमेरिका ने अन्य देशों को भी चेतावनी दी कि जो क्यूबा को तेल बेचेगा, उसके साथ व्यापार में टैरिफ लगाए जाएंगे. 

जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के राष्ट्रीय सुरक्षा कानून कार्यक्रम के निदेशक टॉड हंटले के मुताबिक, 'वेनेजुएला की परिस्थितियों को ईरान पर लागू करना एक बड़ी गलती हो सकती है. ईरान एक बड़ी सैन्य शक्ति है और उसका भूगोल पूरी तरह अलग है. ऐसे में ईरान पर वही मॉडल लागू करना जोखिम भरा माना जा रहा है.'

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हालांकि अमेरिकी सेंट्रल कमांड का दावा है कि कई जहाजों को रोका गया है और कोई जहाज अमेरिकी निगरानी से बच नहीं पाया. लेकिन शिपिंग ट्रैकिंग कंपनियों और समुद्री विश्लेषकों का कहना है कि ईरान अब भी शैडो फ्लीट और लोकेशन स्पूफिंग जैसी तकनीकों से तेल भेजने में कामयाब हो रहा है. 

लॉयड्स लिस्ट इंटेलिजेंस ने बताया कि अदृश्य जहाज़ों का एक लगातार प्रवाह खाड़ी क्षेत्र के अंदर और बाहर होता रहा है. इनमें 11 ऐसे तेल टैंकर भी शामिल हैं जिनमें ईरानी माल लदा हुआ था और जो 13 अप्रैल के बाद से होर्मुज के बाहर स्थित ओमान की खाड़ी से गुजरे हैं.

विशेषज्ञों के मुताबिक ईरानी जहाज पाकिस्तान के जलक्षेत्र या दूसरे वैकल्पिक समुद्री रास्तों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इतनी भारी शिपिंग ट्रैफिक में हर जहाज की निगरानी करना अमेरिकी नौसेना के लिए बड़ी चुनौती है. 

समुद्री इतिहासकार साल्वातोरे मर्कोग्लियानो का कहना है कि नाकेबंदी किसी संघर्ष में सिर्फ एक टूल की तरह होता है, अकेले इससे ईरान को झुकाना मुश्किल है. रिपोर्ट में यह भी जिक्र किया गया है कि इतिहास में नाकेबंदियों का असर अक्सर लंबे समय में दिखा है. प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन की जर्मनी पर नाकेबंदी इसका उदाहरण है. लेकिन ट्रंप त्वरित नतीजे चाहते हैं, जबकि ईरान जैसे मामले में यह संभव नहीं दिखता.

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