अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को भारत, रूस, पाकिस्तान, तुर्की, कतर समेत दुनिया के कई देशों को गाजा के लिए गठित 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने का न्योता भेजा है. भारत ट्रंप के इस न्योते पर प्रतिक्रिया देने की जल्दबाजी में नहीं दिख रहा. वहीं पड़ोसी पाकिस्तान निमंत्रण मिलने पर उछल रहा है. उसकी खुशी उसके बयान में साफ-साफ झलक रही है जिसमें वो कह रहा है कि विश्व शांति की हर कोशिश में वो सहयोग करेगा.
इस बीच खबर है कि फ्रांस ट्रंप के निमंत्रण को ठुकराने जा रहा है. समाचार एजेंसी एएफपी को फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के एक करीबी सूत्र ने बताया कि फ्रांस ट्रंप के निमंत्रण को ठुकरा सकता है.
इस बीच चर्चा भारत की हो रही है. भारत को बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निमंत्रण देते हुए भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने ट्वीट किया, 'मुझे गर्व है कि मैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आमंत्रण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे रहा हूं ताकि वो बोर्ड ऑफ पीस में हिस्सा ले सकें जो गाजा में स्थायी शांति लाएगा.'
इसी के साथ ही देश में इस बात पर बहस शुरू हो गई है कि पीएम मोदी को इसमें हिस्सा लेना चाहिए या नहीं. इन सबके बीच पहले जान लेते हैं कि बोर्ड ऑफ पीस है क्या-
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कोशिशों से इजरायल-हमास के बीच पिछले साल अक्टूबर में सीजफायर हुआ था. यह सीजफायर ट्रंप के 20 सूत्रीय शांति योजना के तहत हुआ और अब इस योजना का दूसरा चरण शुरू हो चुका है.
दूसरे चरण के तहत 'बोर्ड ऑफ पीस' का गठन किया जा रहा है और राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही खुद को इस बोर्ड का अध्यक्ष घोषित कर चुके हैं. यह बोर्ड गाजा के अस्थायी शासन और उसके पुनर्निर्माण का कामकाज देखेगा जिसे एक टेक्निकल एक्सपर्ट्स की कमेटी को सौंपा गया है.
बोर्ड का काम केवल गाजा तक ही सीमित नहीं होगा बल्कि राष्ट्रपति ट्रंप इसे संयुक्त राष्ट्र के विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं. ट्रंप कह रहे हैं कि यह अब तक का सबसे मजबूत बोर्ड होगा जो दुनिया में शांति और उन्नति पर काम करेगा.
बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए दुनिया के कई देशों को निमंत्रण भेजा जा चुका है जिसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी शामिल हैं.
मामले से परिचित सरकारी सूत्रों ने बिजनेस लाइन से बात करते हुए कहा है कि भारत ट्रंप के निमंत्रण पर प्रतिक्रिया देने की जल्दबाजी में नहीं है. एक सूत्र ने कहा, 'भारत को हाल ही में बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता मिला है. इस पर प्रतिक्रिया देने की कोई जल्दबाजी नहीं है, क्योंकि जवाब सोच-समझकर और संतुलित तरीके से दिया जाना है.'
एक अन्य सूत्र ने कहा, 'यह स्वाभाविक है कि भारत कुछ समय तक इंतजार करना चाहे. वह यह भी देखना चाहेगा कि जिन-जिन देशों को बुलाया गया है, वो कैसा जवाब दे रहे हैं.'
अधिकांश डिप्लोमैट्स और एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत को इस बोर्ड में शामिल नहीं होना चाहिए.
भारत के पूर्व विदेश सचिव और कई देशों में राजदूत रह चुके कंवल सिब्बल कह रहे हैं कि भारत को इस बोर्ड का हिस्सा बिल्कुल नहीं होना चाहिए. एक्स पर उन्होंने कई ट्वीट किए हैं जिसमें वो निमंत्रण स्वीकार न करने के पीछे कई तर्क दे रहे हैं.
एक ट्वीट में वो लिखते हैं, 'बोर्ड ऑफ पीस पूरी तरह डोनाल्ड ट्रंप के कंट्रोल में होगा और सभी मामलों में अंतिम फैसला उन्हीं का होगा. अन्य सभी सदस्य उनके अधीन होंगे और उनके फैसलों के अनुसार ही काम करेंगे. ट्रंप का उद्देश्य शांति प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार करना और संघर्षों को सुलझाने का श्रेय खुद लेना है. ट्रंप खुलेआम कह चुके हैं कि वो अंतरराष्ट्रीय कानून को नहीं मानते हैं.'
कंवल सिब्बल कहते हैं कि वेनेजुएला के मामले में इसका उदाहरण देखा जा चुका है. ग्रीनलैंड अगला मामला है. वो हैरानी जताते हुए लिखते हैं कि बेलारूस के राष्ट्रपति ऐसे बोर्ड का हिस्सा बनने के लिए तैयार दिख रहे हैं, जिसकी बुनियाद ही अमेरिकी वर्चस्व पर टिकी है.
उन्होंने आगे लिखा, 'इस बोर्ड की विचारधारा संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन करती है. इसके अलावा, इसके साथ जुड़े कारोबारी और वित्तीय पहलू भी हैं, जिनमें ट्रंप का परिवार शामिल है. ये सभी वजहें हैं जिनके चलते भारत को इस बोर्ड से शालीनता के साथ दूरी बनाए रखनी चाहिए.'
एक अन्य ट्वीट में वो लिखते हैं, 'भारत का जवाब साफ तौर पर No, Thank You होना चाहिए. भारत को ऐसी किसी व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, जो मनमाने ढंग से बनाई गई हो, जिसे संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी न मिली हो, जो मुश्किलों से भरी हो और जिसकी संरचना में निजी पक्षों के कारोबारी हित शामिल हों. इस अत्यंत जटिल अरब मुद्दे को मुख्य रूप से अरब देशों पर ही छोड़ देना चाहिए.'
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्म चेलानी भारत-पाकिस्तान को एक साथ इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता दिए जाने पर सवाल उठाते हैं.
उन्होंने एक्स पर एक लंबे पोस्ट में लिखा, 'ट्रंप का तथाकथित बोर्ड ऑफ पीस, जिसके चार्टर में गाजा का कोई उल्लेख नहीं है, को एक नए अंतरराष्ट्रीय शांति की रक्षा करने वाले निकाय के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. हालांकि, इसकी स्थायी सदस्यता की कीमत 1 अरब डॉलर तय की गई है. अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ लगाया है और अब भारत को बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निमंत्रण भी दे रहा है. यह ट्रंप प्रशासन के कैरट एंड स्टिक यानी एक तरफ सजा देना, दूसरी तरफ इनाम देना वाली नीति को दिखाता है.'
उन्होंने लिखा कि भारत और पाकिस्तान को एक साथ आमंत्रित कर ट्रंप प्रशासन फिर से दोनों देशों को एक ही तराजू पर तौल रहा है. भारत को पाकिस्तान के साथ जोड़ना यह संकेत भी देता है कि अमेरिका का ‘रणनीतिक साझेदार’ होने का दर्जा भारत को किसी विशेष राजनीतिक, आर्थिक या कूटनीतिक रियायत की गारंटी नहीं देता.
अपने ट्वीट के अंत में डॉ. चेलानी लिखते हैं, 'सबसे बुनियादी बात यह है कि भारत को ट्रंप के रिकॉर्ड को ध्यान में रखना चाहिए. ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ‘बोर्ड ऑफ कॉन्फ्लिक्ट’ में भी बदल सकता है.'
भारत के कई नेता भी इस पक्ष में नहीं हैं कि पीएम मोदी इस बोर्ड का हिस्सा बने. शिवसेना की राज्य सभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी एक्स पर लिखती हैं, 'गाजा पीस बोर्ड का निमंत्रण पाकिस्तान को भी भेजा गया है. ऐसे देश को शामिल किया जाना हास्यास्पद है, जिसने न तो अपने अंदर, न अपने पड़ोस में और न ही वैश्विक स्तर पर कभी शांति को बढ़ावा दिया हो. उम्मीद है कि भारत इस निमंत्रण के जवाब में शालीन लेकिन स्पष्ट शब्दों में- Thanks but no thanks कहेगा.'
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