दुनिया के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो और अमेरिका के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. बुधवार को जब नाटो प्रमुख मार्क रुटे व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलने पहुंचे, तो माहौल काफी गरम रहा. लगभग दो घंटे तक चली इस मुलाकात में ट्रंप ने साफ कर दिया कि वह अपने साथी देशों के रवैये से खुश नहीं हैं. दरअसल, ईरान के साथ चल रहे तनाव के बीच ट्रंप को उम्मीद थी कि उनके सभी दोस्त देश कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे, लेकिन कई देशों ने ऐन मौके पर हाथ खींच लिए.
मार्क रुटे ने इस मुलाकात के बाद माना कि गठबंधन के अंदर इस समय काफी तनाव है. उन्होंने सीएनएन के शो 'द लीड विद जेक टैपर' में साफ-साफ कहा कि ट्रंप कई नाटो सहयोगियों से निराश हैं और उनकी बात में दम भी है. रुटे ने इस बातचीत को दो दोस्तों के बीच हुई खरी-खरी चर्चा बताया. ट्रंप के गुस्से की असली वजह ये है कि जब अमेरिका ईरान के खिलाफ एक्शन लेने की तैयारी कर रहा था, तब कई साथी देशों ने हाथ खड़े कर दिए. उन्होंने न तो अपने देश के ऊपर से अमेरिकी लड़ाकू विमानों को उड़ने का रास्ता दिया और न ही समंदर में सुरक्षा के लिए अपनी नेवी भेजी.
व्हाइट हाउस ने भी ट्रंप की इस खींचतान की पुष्टि की है. ट्रंप का मानना है कि इस मुश्किल घड़ी में नाटो सहयोगियों की परीक्षा हुई और वे उसमें फेल हो गए. सीधे शब्दों में कहें तो ट्रंप को लगता है कि जब अमेरिका को अपने दोस्तों की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब उन्होंने मुंह फेर लिया. ट्रंप इतने गुस्से में थे कि उन्होंने सोशल मीडिया पर बड़े अक्षरों में लिखा कि 'जब हमें नाटो की जरूरत थी, तब वे मौजूद नहीं थे और अगर हमें फिर से उनकी जरूरत पड़ी, तो वे मौजूद नहीं होंगे.' उन्होंने तंज कसते हुए पुराने ग्रीनलैंड विवाद तक का जिक्र कर डाला.
कागजी शेर बना नाटो? ट्रंप ने दी गठबंधन छोड़ने की धमकी
ट्रंप का यह गुस्सा सिर्फ एक मीटिंग तक ही नहीं है, पिछले कुछ हफ्तों से तो वे नाटो को कागजी शेर बताने में लगे हैं. उनका कहना एकदम साफ है कि यूरोप के देश अपनी सुरक्षा के लिए तो पूरी तरह अमेरिका के भरोसे बैठे रहते हैं, लेकिन जब ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल को मदद की जरूरत पड़ी, तो इन्हीं देशों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए. उन्होंने यहां तक संकेत दे दिए हैं कि अगर हालात नहीं बदले, तो अमेरिका इस 32 देशों वाले संगठन से बाहर भी निकल सकता है. वे चाहते हैं कि जो देश खाड़ी के तेल पर निर्भर हैं, उन्हें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ईरान के कब्जे से छुड़ाने के लिए खुद भी पसीना बहाना चाहिए.
लेकिन दूसरी तरफ यूरोपीय देशों की अपनी मजबूरी है. डिप्लोमेट्स का कहना है कि जब तक युद्ध पूरी तरह रुक नहीं जाता, यूरोपीय सरकारें समंदर से बारूदी सुरंगें हटाने या जहाजों को सुरक्षा देने जैसे खतरनाक कामों में शामिल होने को तैयार नहीं हैं. वे नहीं चाहते कि वे सीधे तौर पर इस जंग का हिस्सा बनें. इसी खींचतान के बीच ट्रंप ने ईरान के साथ दो हफ्ते के युद्धविराम का ऐलान भी किया है. यह फैसला उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की गुजारिश के बाद लिया, ताकि कूटनीति को थोड़ा और वक्त मिल सके.
ट्रंप ने कहा है कि यह डबल-साइडेड युद्धविराम है और यह तभी चलेगा जब ईरान तेल और गैस की सप्लाई नहीं रोकेगा. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी भरोसा दिलाया है कि वे पलटवार रोक देंगे और जहाजों को रास्ता देंगे. याद रहे कि 28 फरवरी से शुरू हुई इस जंग ने हजारों जानें ले ली हैं और पूरी दुनिया की एनर्जी सप्लाई को हिलाकर रख दिया है. अब देखना यह है कि ये दो हफ्तों की शांति नाटो और अमेरिका के रिश्तों की कड़वाहट कम कर पाती है या नहीं.
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