ममता सी सीरत, सयानी सी सूरत... TMC की फायरब्रांड लेडी घोष की कहानी

सयानी घोष टीएमसी का सिर्फ राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं बल्कि वे बंगाली अस्मिता की सांस्कृतिक प्रतिनिधि के रूप में सामने आईं है. उनके संबोधनों में 'बांग्लार मेये', 'बांग्लार गर्बो' जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं. सयानी की कहानी छोटे स्क्रीन से शुरू हुई है. उन्होंने फिल्मों से पहचान बनाई और अब वे बंगाल के राजनीतिक मानचित्र पर उभर रही हैं.

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सयानी घोष बंगाल चुनाव में TMC का यूथ फेस बनकर उभरी हैं. (Photo: ITG) सयानी घोष बंगाल चुनाव में TMC का यूथ फेस बनकर उभरी हैं. (Photo: ITG)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 26 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 7:38 AM IST

"अगर मैं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी में हूं, तो यह मुश्किल होगा कि मैं नरेंद्र मोदी जैसी दिखूं या सीपीएम नेता या सोनिया गांधी जैसी दिखूं. तो कोई दिक्कत नहीं, मुझे खुशी है कि जिस पार्टी में हूं, वह मुझे उनके जैसी दिखाती है. मैं उनकी तरह ही सरल रहना चाहती हूं. मैं उनकी तरह जमीन से जुड़ी रहना चाहती हूं."

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ममता बनर्जी से तुलना पर सयानी घोष जरा भी नहीं हिचकिचातीं, वह बड़े आत्मविश्वास के साथ इसे own करती हैं.

इस बंगाल विधानसभा चुनाव में सयानी घोष महज वो स्टार प्रचारक नहीं हैं जिनकी स्टार वैल्यू मात्र सिनेमा कलाकार होने की वजह से होती है. इस कैटेगरी के सितारे टीएमसी नेता मिमी चक्रवर्ती और नुसरत जहां थीं.

लेकिन सयानी घोष सीएम ममता बनर्जी की स्ट्रीट फाइटर वाली छवि को स्वयं भी जीती हैं. धारदार, सीधा वार और रूरल बंगाल से कनेक्ट उनके चुनाव प्रचार का स्टाइल है. वह स्टार प्रचारक ही नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस की नई पीढ़ी की आक्रामक चुनावी आवाज के रूप में सामने आई हैं.

2026 के विधानसभा चुनाव अभियान में उनका प्रचार-सिस्टम पारंपरिक “स्टेज-स्पीच नेता” वाला नहीं रहा, बल्कि यह पहचान-राजनीति, यूथ-मोबिलाइजेशन और नैरेटिव-कंट्रोल के मिले-जुले स्वरूप वाले एक राजनीतिक मॉडल के रूप में दिख रहा है.

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इस चुनाव में उनका सबसे बड़ा योगदान- तृणमूल कांग्रेस के उस संदेश को धार देना, जिसे ममता बनर्जी लंबे समय से “Banglar pokkhe lorai” कहती रही हैं. सयानी घोष ने इस लाइन को युवाओं की भाषा में अनुवाद किया.

हाल में सयानी के पहनावे में भी काफी बदलाव आया है. वह आजकल सफेद साड़ी और खोपा पहने (बालों में जुड़ा बांधना), माथे पर बड़ी लाल बिंदी लगाए नजर आती हैं. पैरों में हवाई चप्पल पहनती हैं. इस पहनावे को देखकर कई लोगों को लगता है कि सयानी तृणमूल सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पहनावे की नकल करती हैं.

इसी नकल की बात पर सयानी ने कहा था कि अगर वे ऐसा करती हैं तो इसमें बुरा क्या है? सयानी अपनी पहचान के बीच इससे इनकार भी नहीं करती हैं. 

सयानी के भाषणों में बार-बार 'बांग्लार मेये', 'बांग्लार गर्बो', 'लोराई चोल्बे' जैसे शब्द सुनाई दिए. इससे वे सिर्फ पार्टी की प्रवक्ता नहीं रहीं, बल्कि बंगाली अस्मिता की सांस्कृतिक प्रतिनिधि के रूप में सामने आईं. सयानी की इस शैली से ममता के प्रति रुझान रखने वाले शिक्षित युवाओं के बीच उनकी स्वीकार्यता बनी.

एक और चुनावी रैली में उन्होंने वादा करो नहीं छोड़ोगे तुम मेरा साथ... और क्या हुआ तेरा वादा  गाकर बीजेपी पर निशाना साधा.

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इस बार सयानी के प्रचार अभियान की जितनी चर्चा है उतना गप तो ममता के भतीजे अभिषेक मुखर्जी को भी लेकर नहीं है.

बता दें कि सयानी को टीएमसी की मुख्य धारा में लाने का श्रेय अभिषेक बनर्जी को ही जाता है.

सयानी घोष ने 2021 में औपचारिक रूप से टीएमसी जॉइन की. इसी साल वे आसनसोल दक्षिण से चुनाव लड़ी. लेकिन हार गईं. अभिषेक बनर्जी ने इसी साल उन्हें पार्टी की युवा इकाई टीएमसी यूथ कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया. यह पद पहले अभिषेक बनर्जी के पास था.

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज सयानी तृणमूल कांग्रेस की नई पीढ़ी का ऐसा चेहरा बन चुकी हैं, जो ममता बनर्जी की राजनीति के 'पोरिवर्तन' वाले दौर की अगली कड़ी मानी जा सकती हैं.

गाने पर विवाद

चुनावी मैदान में सयानी की सक्रियता ही है कि विवाद भी उनके साथ चलते हैं. सयानी के उस गाने की चर्चा सबसे ज्यादा हुई जिसे उन्होंने एक सभा के दौरान गया- एकबार छेड़े दे नौका माझी, जाबो मदीना... आमार हृदय माझे काबा, नयाने मदीना... यानी कि मांझी नाव छोड़ दो, मैं मदीना जाऊंगी. मेरे दिल में काबा है और आंखों में मदीना.

मुस्लिम समुदाय को ध्यान में रखकर गाए गए इस गीत को बीजेपी ने इसे तुरंत लपक लिया और कहा कि यह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति है. जबकि तृणमूल कांग्रेस ने इसे सांस्कृतिक भावनात्मक अभिव्यक्ति बताया, लेकिन चुनावी माहौल में यह बयान ध्रुवीकरण की बहस का हिस्सा बन गया. इस एक पंक्ति ने दिखा दिया कि सयानी घोष अब ऐसी नेता बन चुकी हैं जिनके शब्द हलचल पैदा करते हैं.

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2021 में सयानी तब भी विवादों में आई थी जब उनका एक पुराना विवादित ट्वीट चर्चा में आ गया था. इस ट्वीट में सायनी के अकाउंट से शिवलिंग को कंडोम पहनाती एक महिला का चित्र पोस्ट किया गया था.

सायनी ने इस पर सफाई देते हुए कहा था कि उनके अकाउंट को हैक कर ये पोस्ट किया गया था.  

 संस्कृति, राजनीति, संघर्ष और पहचान का अनोखा मेल

सयानी के सफर में  संस्कृति, राजनीति, संघर्ष और पहचान का अनोखा मेल दिखाई देता है.

सियासत में सयानी घोष ने जीत का स्वाद 2024 में चखा जब उन्होंने जादवपुर लोकसभा सीट से जीत हासिल की. यहां से जीत सिर्फ चुनावी सफलता नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि वे शहरी, शिक्षित और युवा मतदाताओं के बीच अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी हैं.

बंगाल की राजनीति में जहां भावनात्मक पहचान और सांस्कृतिक जुड़ाव बहुत मायने रखते हैं, वहां सयानी घोष ने खुद को एक ऐसी नेता के रूप में स्थापित किया है, जो 'बांग्ला भाषा', 'बांग्ला संस्कृति' और आधुनिक राजनीति तीनों को साथ लेकर चलने की कोशिश करती हैं. 

कोलकाता में जन्मी सयानी घोष का बचपन बंगाल की सांस्कृतिक विरासत के बीच बीता. यह वही शहर है, जहां अड्डा, साहित्य, रंगमंच और संगीत रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है.

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बचपन से ही उनका झुकाव अभिनय और संगीत की ओर था. स्कूल के दिनों से मंच पर सक्रिय रहने वाली सयानी ने जल्दी ही बंगाली टेलीविजन और फिल्मों में अपनी पहचान बना ली. 

2010 में शुरू हुआ फिल्मी सफर

सायनी घोष का फिल्मी सफर 2010 में शुरू हुआ, उन्होंने टेलीफिल्म इच्छे दाना से अभिनय की शुरुआत की.  बड़े पर्दे पर पहला कदम नाटोबार नोटआउट में छोटे रोल से हुआ. 2011 में राज चक्रवर्ती की फिल्म शोत्रु में जीत के साथ स्क्रीन शेयर कर उन्हें पहचान मिली. 

2013-2017 का दौर उनका सबसे सक्रिय रहा. कनामाची, अंतराल, एकला चलो, राजकाहिनी, ब्योमकेश ओ चिरियाखाना, मेघनाद बध रहस्य जैसी फिल्मों में उन्होंने  अलग अलग भूमिकाएं निभाईं.  कॉमेडी, ड्रामा, थ्रिलर और हॉरर में उनकी दमदार मौजूदगी रही. 

चारित्रहीन, बौ केनो साइको जैसी वेब सीरीज ने भी उनकी लोकप्रियता बढ़ाई. 2022 में सायनी ने फिल्म अपराजितो में काम किया. यह सत्यजीत राय  के जीवन पर आधारित एक बायोपिक-ड्रामा है. 

 

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