न युद्धविराम, न इलाकों की वापसी... ट्रंप की बचकानी डिप्लोमेसी ने जेलेंस्की को मंझधार में फंसा दिया?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की विदेश नीति का आधार अमेरिकी फर्स्ट पॉलिसी है, जिसमें वह सिर्फ अमेरिका के हितों पर जोर दे रहे हैं. यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य और आर्थिक सहायता पर ट्रंप ने सवाल उठाए हैं, जिससे जेलेंस्की पर दबाव बढ़ा है.

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यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 28 मई 2025,
  • अपडेटेड 11:02 AM IST

रूस और यूक्रेन की जंग थमने का नाम नहीं ले रही. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मध्यस्थता से इस युद्ध को रुकवाने की कोशिश का खुलेआम ऐलान कर चुके हैं. यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की सीजफायर के इच्छुक हैं लेकिन पल-पल बदलते रूसी राष्ट्रपति पुतिन के तेवर और ट्रंप के व्यवहार से मामला अधर में लटका हुआ है.

ये तो जगजाहिर है कि ट्रंप की विदेश नीति का आधार अमेरिकी फर्स्ट पॉलिसी है, जिसमें वह सिर्फ अमेरिका के हितों पर जोर दे रहे हैं. रूस और यूक्रेन के बीच सीजफायर के लिए जेलेंस्की ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है. इस युद्ध की वजह से यूक्रेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है. इन्फ्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुका है. ऐसे में सीजफायर का सपना दिखाकर ट्रंप यूक्रेनी राष्ट्रपति से अहम समझौते कर चुके हैं लेकिन उन्हें देने के लिए उनके पास सिवाए वादों के कुछ नहीं है.

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सबसे पहले ट्रंप ने यूक्रेन को दी जाने वाली अमेरिकी सैन्य सहायता को कम करने या रोकने की धमकी भी दी, जिससे जेलेंस्की पर सीजफायर के लिए सहमति बनाने का दबाव बढ़ा.

ट्रंप ने रूस के साथ यूक्रेन के सीजफायर का हवाला देकर जेलेंस्की के साथ दुर्लभ खनिज डील का दबाव डाला. इसमें यूक्रेन को अमेरिका के साथ खनिज संसाधनों की आपूर्ति सुनिश्चित करनी थी. ट्रंप ने जेलेंस्की पर दबाव डाला कि अगर जेलेंस्की इस सौदे से पीछे हटते हैं, तो उनके लिए बड़ी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं.यह डील सीजफायर वार्ता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, क्योंकि ट्रंप ने इसे आर्थिक और रणनीतिक लाभ के रूप में देखा. 

वहीं, यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य और आर्थिक सहायता पर ट्रंप ने सवाल उठाए हैं, जिससे जेलेंस्की पर दबाव बढ़ा. उन्होंने सबसे पहले जेलेंस्की पर युद्धविराम के लिए रूस के साथ समझौता करने का दबाव बनाया.

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ट्रंप ने जेलेंस्की को संकेत दिया कि रूस के कब्जे वाले क्षेत्रों (क्रीमिया और डोनबास) को सीजफायर के लिए एक समझौते के तहत छोड़ा जा सकता है, बशर्ते यूक्रेन के बाकी हिस्सों को नाटो की सुरक्षा गारंटी मिले.

इस तरह देखा जा सकता है कि सीजफायर के नाम पर ट्रंप ने जेलेंस्की से अहम करार कर लिया. उन्हें जरूरी आश्वासन भी दिया लेकिन जमीनी सतह पर ऐसा कुछ नहीं हो पया. 

इससे पहले ट्रंप ने व्हाइट हाउस में हुई मुलाकात में जेलेंस्की को चेतावनी दी थी कि यूक्रेन युद्ध नहीं जीत रहा और वह फिलहाल मोलभाव यानी बार्गेनिंग की स्थिति में नहीं है.

वहीं, रूस ने युद्धविराम के लिए दो प्रमुख शर्तें रखी हैं, जिनमें पहली यूक्रेन को नाटो का मेंबर नहीं बनाना और दूसरा क्रीमिया और यूक्रेन के चार  क्षेत्रों दोनेत्सक, लुहांस्क, खेरसॉन और ज़ापोरिज़्ज़िया पर रूस के कब्जे को अंतरराष्ट्रीय मान्यता देना है. जेलेंस्की इन शर्तों को स्वीकार करने के खिलाफ हैं क्योंकि यह यूक्रेन की संप्रभुता के लिए खतरा है.

बता दें कि सऊदी अरब में यूक्रेन, अमेरिका और सऊदी अधिकारियों के बीच युद्धविराम को लेकर बातचीत हुई थी, जिसमें 30 दिन के युद्धविराम का प्रस्ताव रखा गया. हालांकि रूस ने अपनी शर्तों के साथ अड़ंगा लगाया और ट्रंप ने पुतिन को दो टूक चेतावनी दी. 

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ट्रंप की नीतियों ने जेलेंस्की को दोहरी चुनौती दी है. एक तरफ, वह रूस के साथ समझौता नहीं करना चाहते क्योंकि यह यूक्रेन की हार और क्षेत्रीय नुकसान का प्रतीक होगा. दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन से सहायता में कमी और दबाव ने उनकी स्थिति को कमजोर किया है. यूरोप और नाटो से मिलने वाली सहायता भी अब ट्रंप की नीतियों के कारण अनिश्चित हो सकती है.

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