पाकिस्तान में इमरान खान की सत्ता का जाना अपने आप में एक बड़ा नाटकीय मोड़ रहा. उनको सत्ता से हटाने के लिए जो दल साथ आए, जिन नेताओं ने हाथ मिलाए, उनकी राजनीति हमेशा से एक दूसरे से जुदा थी, एक दूसरे को निशाने पर लेना लाजिमी रहता था. लेकिन क्योंकि इमरान खान को सत्ता से हटाना था, ऐसे में सभी साथ आए और पाकिस्तान की राजनीति में शहबाज शरीफ का युग शुरू करवा दिया गया.
तीन साल से चल रही थी तैयारी
अब इमरान को हटाने में वैसे तो पाकिस्तान के कई बड़े चेहरों ने सक्रिय भूमिका निभाई है, लेकिन एक नाम सबसे ज्यादा अहम रहा- पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सह-अध्यक्ष आसिफ अली जरदारी. इनकी आंखों में इमरान खान हमेशा से खटके हैं. इमरान भी इन्हें अपना दुश्मन नंबर वन मानते रहे हैं. आलम ये है कि 2019 में ही आसिफ अली जरदारी ने कह दिया था कि वे इमरान खान को सत्ता से बेदखल कर देंगे. अब उनका वो सपना तीन साल बाद पूरा हुआ है.
इस मौके पर पाकिस्तानी चैनल जियो टीवी को दिए इंटरव्यू में जरदारी ने कई ऐसे खुलासे कर दिए हैं जिससे साफ समझा जा सकता है कि एक तय रणनीति के तहत इमरान खान को सत्ता से बेदखल किया गया है. इंटरव्यू में जब जरदारी से सवाल पूछा गया कि वे शहबाज शरीफ के नाम पर राजी कैसे हो गए, जो शहबाज शरीफ लगातार उनके खिलाफ बोलते थे, खुद वे नवाज शरीफ को लेकर गंभीर आरोप लगाते थे, ऐसे में ये सब कैसे संभव हो पाया?
सीक्रेट मीटिंग जिसने किया इमरान का खेल खराब
इस सवाल पर आसिफ अली जरदारी ने बताया कि उन्होंने खुद शहबाज शरीफ को पाकिस्तान का नया प्रधानमंत्री बनवाया है. वे कहते हैं कि मैंने इस पद पर उन्हें सिर्फ नियुक्त नहीं किया है, बल्कि राजी भी किया था. मैं गया था शहबाज शरीफ के पास, उनसे मुलाकात की थी. उन्हें कहा था कि आप प्रधानमंत्री बन जाएं. उस समय मेरे पास 70 सांसदों का समर्थन था (साथी दलों के मिलाकर). मैंने उनसे कहा कि आप अपनी पार्टी से बात कीजिए, उन्हें मनाइए. तब शहबाज ने कहा था कि वे अपने भाई नवाज और कुछ दोस्तों से बात कर फैसला लेंगे.
आसिफ अली जरदारी के मुताबिक ये एक सीक्रेट मीटिंग थी जिसकी भनक किसी को भी नहीं थी. इसी मीटिंग में उनकी तरफ से शहबाज शरीफ को पीएम पद का ऑफर दे दिया गया था. तभी ये भी साफ हो गया था कि विपक्ष के पास कुल इतने वोट हो गए हैं कि इमरान खान को सत्ता से बेदखल किया जा सकता. अब जब तक इमरान खान ये रणनीति समझ पाते, उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और देखते ही देखते कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्हें पीएम पद छोड़ना पड़ गया.
चुनाव करवाने पर नहीं कोई स्पष्टता
अब जब नई सरकार का गठन हो चुका है, जरदारी कह रहे हैं कि वे अपने सभी साथी दलों को साथ लेकर चलने वाले हैं. जो भी जायज मांगें रहने वाली हैं, उन्हें पूरा करने का भी प्रयास रहेगा. लेकिन चुनाव को लेकर उनकी तरफ से कोई स्पष्टता नहीं दी गई है. सिर्फ इतना कह रहे हैं कि हम कलेक्टिव डिसिजन लेंगे कि कब इलेक्शन में जाना है.
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