नेपाल में राजनीतिक संकट, EC की पीएम ओली को सलाह- कोरोना के बीच एक ही चरण में हो चुनाव

कोरोना के बढ़ते प्रकोप के बीच चुनाव आयोग की तरफ से प्रधानमंत्री को सलाह दी गई है कि इस चुनाव को सिर्फ एक ही चरण में संपन्न करवाया जाए. जोर देकर कहा गया है कि देश में कोरोना का संकट गहराता जा रहा है, अब चुनाव के जरिए इसे और ज्यादा फैलने का मौका नहीं दिया जा सकता है.

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पीएम केपी शर्मा ओली पीएम केपी शर्मा ओली

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 मई 2021,
  • अपडेटेड 5:53 PM IST
  • नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता
  • एक ही चरण में चुनाव कराने की मांग
  • विपक्ष का राष्ट्रपति पर आरोप

भारत के पड़ोसी देश नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता लंबे समय से बनी हुई है. जब से राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी की तरफ संसद को फिर भंग कर दिया गया है, देश में राजनीतिक संकट मंडराने लगा है. एक तरफ विपक्ष इसे लोकतंत्र की हत्या बता रहा है तो वहीं पीएम केपी ओली अब चुनावों की तैयारी में लग गए हैं. अभी के लिए नेपाल में चुनाव इसी साल नवंबर में होने जा रहे हैं. इस चुनाव को दो चरणों में करने की तैयारी है.

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नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता

लेकिन कोरोना के बढ़ते प्रकोप के बीच चुनाव आयोग की तरफ से प्रधानमंत्री को सलाह दी गई है कि इस चुनाव को सिर्फ एक ही चरण में संपन्न करवाया जाए. जोर देकर कहा गया है कि देश में कोरोना का संकट गहराता जा रहा है, अब चुनाव के जरिए इसे और ज्यादा फैलने का मौका नहीं दिया जा सकता है.

मुख्य चुनाव आयुक्त दिनेश कुमार थपालिया ने कहा है कि ये चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि चुनाव को शांतिपूर्ण अंदाज में पूरा करवाया जाए. चुनाव की तैयारी के लिए हमारे पास पर्याप्त समय है. हमने सरकार को सलाह दी है कि अब इस चुनाव को सिर्फ एक चरण में ही करवाया जाए. अब अभी तक पीएम ओली की तरफ से इस सुझाव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा है कि चुनाव आयोग अपने अनुभवों के आधार पर इस चुनाव की तैयारी करे.

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बयान में केपी ओली ने कहा है कि एक तरफ देश में कोरोना का खतरा बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ चुनाव को भी 6 महीने के अंदर संपन्न करवाना है. महामारी की वजह से चुनाव को पोस्टपोन नहीं किया जा सकता है. भारत, अमेरिका और यूके में कोरोना के बीच सफल अंदाज में चुनाव हुए हैं. ऐसे में हम भी ऐसा कर दिखाएंगे.

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विपक्ष का राष्ट्रपति पर आरोप

नेपाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों की बात करें तो केपी ओली एक तरफ अपनी ही पार्टी में अकेले पड़ते दिखाई दे रहे हैं, वहीं उनकी पार्टी में जारी फूट भी मुसीबत को और ज्यादा बढ़ा रही है. उस बीच राष्ट्रपति का संसद को भंग करना चुनौतियों को जटिल करने वाला साबित हुआ है.

विपक्ष की तरफ से जोर देकर कहा गया है कि वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रहे हैं. उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार भी सुप्रीम कोर्ट की तरफ से राष्ट्रपति के इस फैसले को असंवैधानिक बता दिया जाएगा. इससे पहले जब पिछले साल भी संसद को भंग किया गया था, तब कोर्ट ने उस फैसले को गलत बता दिया था.

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लेकिन एक बार फिर राष्ट्रपति की तरफ से ये फैसला हुआ है. फिर उन्होंने तर्क दे दिया है कि कोई भी पार्टी बहुमत साबित नहीं कर पाई है. लेकिन विपक्ष उनकी दलीलों से संतुष्ट नहीं है और उन पर पीएम के आदेश अनुसार काम करने के आरोप लगा रहा है.
 

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