मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच जापान ने रविवार को घोषणा की है कि वो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में कमर्शियल जहाजों के सुगम आवागमन के लिए ईरान द्वारा बिछाई गई संभावित नेवल माइंस को हटाने में मदद करेगा. विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी के अनुसार, यदि क्षेत्र में सीजफायर हो जाता है तो जापान अपने 'माइनस्वीपर' जहाजों के जरिए समंदर के नीचे बिछे बारूद के जाल को साफ करने पर विचार कर सकता है. हालांकि, अमेरिका के नाटो सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ किसी भी नौसैनिक ऑपरेशन में शामिल होने से इनकार कर दिया था, लेकिन जापान ने शांतिवादी संविधान की सीमाओं के अंदर रहकर सुरक्षा कानूनों के तहत ये प्रस्ताव दिया है.
माइनस्वीपर ऐसे विशेष जहाज होते हैं जो समुद्र के एक बड़े हिस्से से संभावित माइंस को निष्क्रिय कर सुरक्षित रास्ता बनाने का काम करते हैं. जापान की 'मैरीटाइम सेल्फ-डिफेंस फोर्स' (JMSDF) को इस तकनीक में दुनिया का सबसे सक्षम संगठन माना जाता है जो अवाजी क्लास जैसे आधुनिक जहाजों से लैस है.
क्या है माइनस्वीपर और माइनहंटर में अंतर?
समुद्री बारूद को खत्म करने के लिए दो तरह के जहाजों का इस्तेमाल होता है, जिनके काम करने का तरीका अलग है. 'माइनहंटर' जहाजों का मुख्य काम किसी विशेष माइन को खोजना और उसे नष्ट करना होता है, जिसके लिए सोनार और गोताखोरों की मदद ली जाती है. इसके अलावा 'माइनस्वीपर' जहाज पूरे समुद्री इलाके या एक निश्चित रूट को बारूदी सुरंगों से मुक्त करने का काम करते हैं. इनका उद्देश्य किसी एक माइन को ढूंढना नहीं, बल्कि पूरे रास्ते को सुरक्षित बनाना होता है. ताकि कार्गो और युद्धपोत बिना किसी खतरे के वहां से गुजर सकें. ये जहाज मैकेनिकल या इलेक्ट्रिकल डिवाइस का इस्तेमाल कर माइंस को निष्क्रिय करते हैं.
जापान का इतिहास
जापान का माइनस्वीपिंग का इतिहास काफी पुराना है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद विकसित हुआ. युद्ध के बाद जापान के सामने अपनी समुद्री सीमा में बिछी माइंस को साफ करना सबसे बड़ी चुनौती थी. अमेरिका के साथ मिलकर जापान ने 5 साल से ज्यादा समय तक समुद्र की सफाई की, ताकि व्यापार और मछली पकड़ने का काम फिर से शुरू हो सके. 1954 में स्थापित जापान की 'मरीन सेल्फ-डिफेंस फोर्स' आज इस क्षेत्र में विश्व स्तर पर सबसे ताकतवर मानी जाती है. जापान पहले भी फारस की खाड़ी (गल्फ ऑफ पर्शिया) में युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में समुद्री सुरंगों को सफलतापूर्वक हटा चुका है.
माइंस हटाने में माहिर है जापानी सेना
जापान के पास वर्तमान में 'अवाजी क्लास' (Awaji Class) जैसे दुनिया के सबसे आधुनिक माइनस्वीपर जहाज मौजूद हैं. इन जहाजों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें 'फाइबर-रीइन्फोर्स्ड प्लास्टिक' (FRP) से बनाया जाता है, जिससे इन पर माइंस का चुंबकीय (मैग्नेटिक) असर नहीं होता. ये जहाज 'मानव रहित अंडरवाटर वाहन' (UUVs) और उन्नत सोनार सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं. ये पानी के अंदर छिपी माइंस की हाई-रेजोल्यूशन इमेजिंग करते हैं और फिर 'माइन न्यूट्रलाइजिंग सिस्टम' के जरिए उन्हें सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय कर देते हैं. इसके अलावा जापान के पास 'सुगाक्षिमा क्लास' के जहाज भी हैं जो पारंपरिक माइंस को हटाने में माहिर हैं.
जापान की सैन्य गतिविधियां उसके युद्धोत्तर शांतिवादी संविधान के कारण सीमित हैं, लेकिन 2015 में बने नए सुरक्षा कानून उसे विशेष परिस्थितियों में विदेशों में अपनी सेना के इस्तेमाल की अनुमति देते हैं. यदि किसी हमले से जापान के अस्तित्व को खतरा हो या उसके करीबी सुरक्षा साझेदार पर हमला जापान के लिए संकट पैदा करे तो वह आत्मरक्षा में कदम उठा सकता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाला तेल और व्यापार जापान की अर्थव्यवस्था के लिए लाइफलाइन की तरह है, इसीलिए यहां माइनस्वीपिंग ऑपरेशन को जापान के अस्तित्व की सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है.
क्यों जरूरी है माइनस्वीपिंग?
समुद्री बारूदी सुरंगें या माइंस किसी भी व्यापारिक मार्ग के लिए सबसे बड़ा खतरा होती हैं. प्रथम विश्व युद्ध के वक्त से शुरू हुई, ये परंपरा आज बहुत घातक हो चुकी है. मिंग डायनेस्टी के वक्त से जुड़े इस इतिहास में आज की तकनीक ने बहुत बदलाव किए हैं.
माइनस्वीपर जहाज एक तरह से समंदर के 'सफाईकर्मी' की तरह काम करते हैं. वो ये सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी हाल में बारूद का जाल किसी जहाज के पास विस्फोट न करे. यदि होर्मुज जैसे संकरे और महत्वपूर्ण जलमार्ग में माइंस बिछी रहती हैं तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह ठप हो सकती है, जिसे सुचारु बनाना ही जापान का मुख्य लक्ष्य है.
आशुतोष मिश्रा