मिडिल ईस्ट में जंग छिड़ गई है. इज़रायल और अमेरिका ने संयुक्त तौर पर ईरान पर कड़ा हमला किया है. इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए हैं. ईरान की ओर से भी ये पुष्टि की गई है. ईरान का कहना है कि वह खामेनेई के मौत का बदला लेगा और अब तक सबसे घातक हमला करेगा.
1979 में सत्ता में आए खामेनेई के गुरु अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी का भारत से कनेक्शन है. खुमैनी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले थे और बाद में फिर ईरान चले गए. तेहरान की राजनीति को 1979 की इस्लामिक क्रांति के माध्यम से नई दिशा देने के लिए जाने जाते हैं.
तेहरान की राजनीति को सत्तर के आखिर में नई दिशा देने वाले सर्वोच्च नेता रूहोल्लाह खुमैनी की छवि ईरान में नोटों से लेकर सड़कों और कॉलेजों तक नजर आती है. वे वही शख्स हैं जिन्होंने 1979 की इस्लामिक क्रांति को जन्म दिया, जिसने शाह मुहम्मद रजा पहलवी की सरकार को खत्म कर देश में इस्लामिक शासन स्थापित किया.
आज इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के बीच खुमैनी की विरासत पर चर्चाएं हो रही हैं, जिनमें एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि खुमैनी का खानदान भारत के उत्तर प्रदेश से जुड़ा हुआ है.
अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी के दादा सैयद अहमद मुसावी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंतूर गांव में हुआ था, जो शिया मुस्लिम विद्वानों का एक मुख्य केंद्र था. मुसावी ने अपने नाम के साथ ‘हिंदी’ जोड़कर भारत के प्रति अपने लगाव का इजहार किया. यह परिवार मूल रूप से 18वीं शताब्दी के अंत में ईरान से यहां आया था. उनकी भारत आगमन का उद्देश्य शिया धर्म का प्रचार-प्रसार माना जाता है, क्योंकि उस समय लखनऊ, बाराबंकी और हैदराबाद जैसे क्षेत्रों में ईरानी शिया विद्वानों का आगमन हुआ और उन्हें नवाबों द्वारा संरक्षण मिला.
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हालांकि उस समय ईरान में सत्ता संघर्ष और अस्थिरता थी, जिस कारण मुसावी और उनके परिवार ने धार्मिक कार्यों और बेहतर जीवन के लिए भारत का निवास चुना. बाद में मुसावी इराक होते हुए ईरान लौट गए जहां उनका परिवार बढ़ा. रूहोल्लाह खुमैनी इसी परिवार के वंशज थे जिन्होंने ईरान में इस्लामिक क्रांति का नेतृत्व किया.
रजा पहलवी की सरकार ने खुमैनी को विदेशी, ख़ासतौर से भारतीय मूल का बताकर उनकी वैधता पर हमले किए और उन्हें जेल में भी डाल दिया, लेकिन निर्वासन में खुमैनी ने साफ किया कि उनके पूर्वजों ने धर्म के प्रचार के लिए भारत का दौरा किया था, उनकी जड़ें ईरान में ही हैं. इस बात ने शाह सरकार को कमजोर कर दिया और जनता का समर्थन खुमैनी के पक्ष में आ गया.
1979 में इस्लामिक क्रांति सफल हुई और खुमैनी ईरान के सर्वोच्च नेता बने. उनके बाद उनकी जगह उनके शिष्य अयातुल्ला खामेनेई ने सत्ता संभाली.
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