ईरान में जारी जंग के बीच इजरायल ने लेबनान को भी निशाने पर ले रखा है, जहां उसका सीधा टकराव हिजबुल्लाह से है, जो ईरान समर्थित एक हथियारबंद समूह है. यह संघर्ष अब धीरे-धीरे एक ऐसी रणनीति का रूप लेता दिख रहा है, जिसमें जमीन, आबादी और पहचान को एक साथ बदलने की कोशिश हो रही है. इजरायल के ताजा हमलों ने लेबनान के दक्षिणी हिस्से को जिस तरह प्रभावित किया है, उससे लोगों कहना है कि इसे 'नया गाजा' बनाने की कोशिश चल रही है.
पिछले कुछ हफ्तों में जो तस्वीर सामने आई है, वह बेहद भयावह और बेचैन करने वाली है. करीब 1100 लोगों की मौत हो चुकी है और कमोबेश 12 लाख से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं. गांव के गांव खाली हो चुके हैं. जहां कभी खेतों में काम होता था, गलियों में बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा है, टूटी दीवारें हैं और इलाका मलबे के ढेर में समा गया है.
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यह सब अचानक नहीं हुआ है. जो कुछ हो रहा है, उसे देखने वाले कई लोग मानते हैं कि यह एक तय पैटर्न के तहत आगे बढ़ रहा है. गाजा में जो मॉडल देखने को मिला था, वही अब लेबनान में दोहराया जा रहा है. पहले लगातार बमबारी, फिर लोगों को इलाका खाली करने के आदेश और उसके बाद उस जगह को इस हालत में छोड़ देना कि लोग चाहकर भी वापस न लौट सकें.
दक्षिणी लेबनान इस समय इस पूरी रणनीति का केंद्र बना हुआ है. बिंत जबैल, मरजायौन, हसबाया, नबातियेह और सौर (टायर) जैसे इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. ये वही इलाके हैं जो इजरायली सीमा के करीब हैं और इस इलाके में दशकों से तनाव बना हुआ है. अब यहां की जमीन सिर्फ एक भूगोल नहीं रह गई, बल्कि एक संघर्ष का मैदान बन चुकी है.
हालात इस कदर बदल चुके हैं कि पूरे इलाके को एक तरह के "बफर जोन" में बदलने की कोशिश होती दिख रही है. लितानी नदी से लेकर जहरानी नदी तक का बड़ा हिस्सा खाली कराया जा रहा है. यह इलाका लेबनान के करीब 14% क्षेत्र के बराबर माना जाता है. इससे साफ संकेत मिलता है कि रणनीतिक रूप से यहां से लोगों को निकाला जा रहा है.
लेकिन यह इलाका कभी खाली नहीं था. यहां एक पूरी जिंदगी बसती थी. गांवों में ज्यादातर शिया मुस्लिम समुदाय रहता था, जहां हिजबुल्लाह और अमल मूवमेंट का प्रभाव रहा है. वहीं कुछ हिस्सों में ईसाई समुदाय भी बड़ी संख्या में रहते थे. टायर और सैदा जैसे इलाके के आसपास फिलिस्तीनी शरणार्थी कैंप भी हैं, जहां दशकों से लोग रह रहे हैं.
यहां रहने वाले लोग सिर्फ आंकड़े नहीं हैं. वे किसान हैं, छोटे दुकानदार हैं, शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी हैं. यह इलाका सिर्फ रणनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी बेहद अहम था. लेकिन अब यही लोग जंग में सबसे ज्यादा कीमत चुका रहे हैं.
इस जंग की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जो लोग पहले भी संघर्ष झेल चुके हैं, वही एक बार फिर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. 2023-24 की झड़पों में भी हजारों लोग विस्थापित हुए थे. कुछ समय बाद कई परिवार वापस लौटे, लेकिन ताजा जंग ने उन्हें फिर से बेघर कर दिया और इस बार हालात पहले से कहीं ज्यादा खराब हैं.
आज हजारों लोग स्कूलों, टूटी इमारतों और अस्थायी कैंपों में रहने को मजबूर हैं. रिपोर्ट्स की मानें तो कई परिवार ऐसे हैं, जो खुले आसमान के नीचे रात गुजार रहे हैं. गाजा की तरह यहां भी "सेफ जोन" बनाए गए हैं, लेकिन कई जगहों से ऐसी खबरें सामने आई हैं कि जिन इलाकों को सुरक्षित बताया गया था, वहां भी इजरायल की तरफ से हमले किए गए हैं. इससे लोगों के मन में डर और अविश्वास और गहरा हो गया है.
इस पूरी रणनीति के पीछे क्या मकसद है, यह सवाल अब और तेज हो गया है. कुछ लोगों का मानना है कि यह सिर्फ हिजबुल्लाह को कमजोर करने की कोशिश नहीं है, बल्कि उसके सामाजिक आधार को खत्म करने की भी रणनीति हो सकती है. अगर सीमा के पास के इलाके खाली हो जाते हैं, तो संगठन की जमीनी पकड़ भी कमजोर पड़ सकती है.
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इसके साथ ही, यह लेबनान के अंदर राजनीतिक दबाव भी बढ़ाता है. इजरायल की तरफ से यह संकेत भी दिए गए हैं कि अगर लेबानी सरकार हिजबुल्लाह को नियंत्रित नहीं करती, तो सरकारी ढांचे को भी निशाना बनाया जा सकता है. यही वह मोड़ है, जहां यह जंग सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि देश के भीतर भी दरारें पैदा करने लगती है.
हालांकि, इस रणनीति की अपनी सीमाएं भी हैं. लेबनान, गाजा नहीं है. गाजा एक छोटा और घिरा हुआ इलाका है, जबकि लेबनान का भूगोल और सैन्य ढांचा कहीं ज्यादा जटिल है. हिजबुल्लाह के पास उन्नत हथियार हैं, मजबूत नेटवर्क है और लंबे समय से ऐसे संघर्षों का अनुभव भी है. यही वजह है कि जमीनी स्तर पर इजरायल को कड़ी चुनौती मिल रही है और यह संघर्ष जल्दी खत्म होता नजर नहीं आता.
मसलन, लेबनान में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ एक और युद्ध नहीं है. यह एक ऐसी रणनीति का विस्तार लगता है, जिसमें जमीन को खाली करना, आबादी को हटाना और पूरे क्षेत्र की संरचना को बदलना शामिल है. आज दक्षिणी लेबनान में सिर्फ इमारतें नहीं टूट रही हैं, बल्कि एक पूरा समाज बिखर रहा है, और शायद यही इस जंग की सबसे बड़ी और सबसे दर्दनाक सच्चाई है.
एम. नूरूद्दीन