होर्मुज से बाब-अल-मंदेब तक तनाव: ईरान के द्वीप निशाने पर, मिडिल ईस्ट में बढ़ा खतरा

मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग अब ईरान की आर्थिक रीढ़ पर चोट करने की तैयारी तक पहुंच गई है. अमेरिका और इजरायल की नजर ईरान के उन रणनीतिक द्वीपों पर है, जिनके दम पर वह 'होर्मुज जलडमरूमध्य' पर नियंत्रण रखता है.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह मुजतबा  (Photos: Reuters) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह मुजतबा (Photos: Reuters)

आजतक ब्यूरो

  • नई दिल्ली ,
  • 15 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 11:50 PM IST

मिडिल ईस्ट में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है. अमेरिका-इजरायल अब ईरान की आर्थिक ताकत पर चोट करने की तैयारी में बताए जा रहे हैं. माना जा रहा है कि उनकी नजर फारस की खाड़ी में मौजूद ईरान के उन छोटे-छोटे द्वीपों पर है, जिनके सहारे ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर अपना नियंत्रण बनाए रखता है. रिपोर्टों के मुताबिक अगर इन द्वीपों पर हमला होता है तो ईरान के तेल निर्यात और सैन्य ढांचे को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है. यही वजह है कि इस संभावना से ईरान में हलचल बढ़ गई है.

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इजरायल के विपक्ष के नेता यायर लैपिड ने हाल ही में कहा कि इजरायल को ईरान के खार्ग द्वीप पर मौजूद तेल ठिकानों को निशाना बनाना चाहिए. इस बयान के बाद से ईरान में चिंता बढ़ गई है. दरअसल, फारस की खाड़ी में ईरान के करीब 30 से ज्यादा द्वीप हैं. इनमें से कई द्वीप रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं. करीब 10 द्वीप ऐसे हैं जिनके सहारे ईरान तेल और गैस का निर्यात करता है, समुद्री सुरक्षा बनाए रखता है और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नजर रखता है.

ईरान के लिए क्यों अहम है खार्ग द्वीप

ईरान के लिए इनमें सबसे महत्वपूर्ण खार्ग द्वीप है, जो बुशहर शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर फारस की खाड़ी में स्थित है. यह द्वीप ईरान का सबसे बड़ा तेल निर्यात टर्मिनल है, जहां से देश के कुल कच्चे तेल का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों में भेजा जाता है. इसकी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां से हर दिन करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल सप्लाई होता है और दुनिया भर के तेल टैंकर यहीं आकर लोडिंग करते हैं.

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इतना ही नहीं, यह द्वीप ईरान के 'ऑयल रिजर्व' के तौर पर भी जाना जाता है, क्योंकि यहां लगभग 1 करोड़ 80 लाख बैरल कच्चे तेल का भारी-भरकम भंडार मौजूद है. ऐसे में अगर अमेरिका या इजरायल यहां हमला करते हैं, तो यह सीधे तौर पर ईरान की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ देने वाला कदम होगा.

होर्मुज के पास केशम द्वीप भी अहम

इसी तरह, होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित केशम द्वीप भी ईरान के लिए बहुत खास है. यह न केवल फारस की खाड़ी में ईरान का सबसे बड़ा द्वीप है, बल्कि एक प्रमुख बंदरगाह भी है जहां दुनिया भर के जहाजों की आवाजाही लगी रहती है. अपनी रणनीतिक स्थिति की वजह से यह ईरान के लिए सुरक्षा और व्यापार, दोनों लिहाज से बड़ी अहमियत रखता है.

इसके अलावा किश, अबू मूसा, ग्रेटर टुनब, लेसर टुनब, लावान, सिरी और हेंगम जैसे कई छोटे-बड़े द्वीप भी ईरान की ताकत को बढ़ाते हैं. इन द्वीपों पर जहां एक तरफ ईरान के मजबूत सैन्य ठिकाने हैं, वहीं दूसरी तरफ इनमें से कुछ जगहें अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और व्यापार का केंद्र भी हैं. असल में इन्हीं द्वीपों के दम पर ईरान पूरे Strait Of Hormuz से होने वाले समुद्री व्यापार पर अपनी कड़ी नजर और नियंत्रण बनाए रखता है.

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होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है. यहां से गुजरकर दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल सप्लाई होती है. अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है तो इसका असर पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था पर पड़ता है. हालिया तनाव के बीच ईरान ने संकेत दिए हैं कि अगर उस पर हमला हुआ तो हालात और गंभीर हो सकते हैं.

बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट को लेकर भी चेतावनी

ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अलजजीरा को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर अमेरिका ने कोई रणनीतिक गलती की तो एक और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित हो सकता है. माना जा रहा है कि उनका इशारा बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट की ओर है. यह समुद्री मार्ग गुल्फ ऑफ एडन और लाल सागर (Red Sea) को जोड़ता है और एशिया तथा यूरोप के बीच व्यापार के लिए बेहद अहम है. इसके एक तरफ यमन और दूसरी तरफ अफ्रीकी देश जिबूती है. अगर यह रास्ता बंद होता है तो जहाजों को अफ्रीका का लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ेगा, जिससे व्यापार की लागत और तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं

जमीनी हमले की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान पर जमीनी हमला करना भी आसान नहीं है. इसके पीछे देश की भौगोलिक स्थिति बड़ी वजह है. ईरान के पश्चिम में जागरोस पर्वत, उत्तर में अल्बोर्ज पर्वत, और देश के भीतर दश्त-ए-कवीर और दश्त-ए-लुत जैसे विशाल रेगिस्तान हैं. इन इलाकों में सेना के लिए आगे बढ़ना बेहद मुश्किल माना जाता है.

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इतिहास में भी इसका उदाहरण मिलता है. 1980 में इराक ने ईरान पर हमला किया था, लेकिन पहाड़ी इलाकों की वजह से युद्ध लंबा चला और अंत में कोई साफ नतीजा नहीं निकल सका.

चीन क्यों नहीं घबराया

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बावजूद चीन में ज्यादा हलचल नहीं दिख रही है. इसकी वजह उसकी तैयारी बताई जा रही है. चीन ने पहले से ही बड़े पैमाने पर तेल भंडार बना रखे हैं. उसके पास करीब 140 करोड़ बैरल कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार है. इसके अलावा उसने हाल के वर्षों में कच्चे तेल की खरीद भी बढ़ाई है. साथ ही चीन ने ऊर्जा जरूरतों के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा पर तेजी से काम किया है. आज वहां बिकने वाले वाहनों में करीब 53 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहन हैं. इसी वजह से तेल पर उसकी निर्भरता पहले की तुलना में कम हो गई है.

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया की नजर अब होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर है. अगर हालात और बिगड़ते हैं तो इसका असर सिर्फ इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है.

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