आंखों देखी: सायरन, अलर्ट और बंकर ने बदल दी इजरायलियों की जिंदगी

इजराइल-ईरान युद्ध के 26 दिनों में जहां सैन्य संघर्ष जारी है, वहीं आम लोगों के जीवन पर इसका गहरा असर पड़ा है. लगातार सायरन, मोबाइल अलर्ट और बंकर में भागने की मजबूरी के कारण लोगों की नींद पूरी तरह टूट गई है. तेल अवीव समेत कई शहरों में लोग शेल्टर में रह रहे हैं और मानसिक तनाव बढ़ रहा है. यह जंग सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी और स्वास्थ्य पर भी भारी पड़ रही है.

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तेल अवीव में बंकर बने घर - 26 दिन से अधूरी नींद के साथ जी रहे लोग (Photo: ITG) तेल अवीव में बंकर बने घर - 26 दिन से अधूरी नींद के साथ जी रहे लोग (Photo: ITG)

प्रणय उपाध्याय

  • तेल अवीव, इजरायल,
  • 27 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 10:22 AM IST

इजरायल-ईरान और अमेरिका के बीच जारी जंग को तीन सप्ताह से ज्यादा बीत चुके हैं. इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत भले ही आश्चर्यजनक रूप से घटी हो, लेकिन इजराइल में सोने की कीमत इन दिनों बहुत ऊंची है. मगर जरा रुकिए. मैं यहां कीमती पीली धातु यानी सोने की नहीं, बल्कि अच्छी नींद के साथ सोने की बात कर रहा हूं. क्योंकि इजरायल में जिस एक चीज की सबसे ज्यादा कमी महसूस हो रही है, वह है पूरी रात की नींद. बीते 26 दिनों में इजराइल शायद ही चैन से सो पाया हो.

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रात-बेरात किसी भी समय मोबाइल फोन पर बजने वाले अलर्ट और सायरन की गूंज के साथ बंकर की ओर जाने का प्रोटोकॉल, नींद को टुकड़ों में बांट देता है. हालांकि जान की सुरक्षा के लिए नजदीकी बंकर में पहुंचना जरूरी भी है और सरकार की ओर से निर्देशित भी.

इस संघर्ष की कवरेज के लिए मुझे इजराइल पहुंचे करीब 72 घंटे हो चुके हैं. इस दौरान एक भी रात ऐसी नहीं गुजरी, जब अलर्ट की घंटी न बजी हो और दो से तीन बार बंकर में न जाना पड़ा हो. वैसे किसी भी वॉर जोन में अधूरी नींद के साथ काम करना एक टीवी पत्रकार की पेशेवर जिंदगी का हिस्सा होता है, लेकिन इजराइल की जमीन इसे एक नए तरीके से जीना सिखाती है.

बीते कई दशकों से अपने अस्तित्व के लिए लगातार युद्ध के माहौल में रहने वाले इस देश में जिंदगी हर पल बदलती नजर आती है. सायरन बजते ही सड़क पर गाड़ियां रुक जाती हैं, राहगीर नजदीकी बंकर या शेल्टर में पहुंच जाते हैं, और अलर्ट खत्म होते ही जिंदगी फिर सामान्य हो जाती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो. लोग इस बंकर प्रोटोकॉल को अपनी ट्रेनिंग का हिस्सा बना चुके हैं. लेकिन करीब चार हफ्ते पूरे करने जा रहे इस संघर्ष का दबाव अब इस ट्रेनिंग पर भी नजर आने लगा है.

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लोगों से बातचीत में यह बात सामने आती है कि अब यह लड़ाई बंद होनी चाहिए. स्थायी शांति की उम्मीद भले न हो, लेकिन कम से कम पूरी रात की नींद तो मिले.

आधी रात हो या दिन का समय, किसी भी शेल्टर में नजरें मिलने पर अनजान चेहरों में भी एक ही सवाल दिखता है - आखिर कब तक. इसका जवाब किसी के पास नहीं है. लेकिन नींद की कमी की शिकायत लगभग हर व्यक्ति कर रहा है.

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मैं जिस होटल में ठहरा हूं, वहां रिसेप्शन पर काम करने वाली युवती यक्तरीना कहती हैं कि नींद पूरी न होने के कारण उनका ध्यान भटक रहा है और इसका असर उनके चेहरे पर भी दिखने लगा है. यह सिर्फ यक्तरीना की ही बात नहीं है, बल्कि आसपास रहने वाले और मिलने वाले कई लोग इसी तरह की परेशानी बता रहे हैं.

इजराइल की राजधानी तेल अवीव में कई लोग अपने घर छोड़कर बच्चों के साथ सार्वजनिक शेल्टर में ही रह रहे हैं. हबीमा स्क्वायर के बेसमेंट में बने शेल्टर के अंदर लोगों ने टेंट लगा लिए हैं. बच्चों के खिलौनों के साथ-साथ यहां छोटे-छोटे समूह भी बन गए हैं, जो एक-दूसरे का सहारा बन रहे हैं.

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तेल अवीव के एक बंकर में बातचीत के दौरान उमर नाम के एक युवक से मुलाकात हुई. सेना की अनिवार्य सेवा पूरी करने के बाद वह अब सॉफ्टवेयर डेवलपर हैं. उन्होंने एक ऐप बनाया है, जो लोगों को एंग्जायटी और शरीर से जुड़ी आदतों जैसे नाखून चबाना, बाल खींचना या होंठ काटना जैसी समस्याओं से छुटकारा पाने में मदद करता है. हाल के समय में उनके ऐप के इजराइल में हजारों डाउनलोड हुए हैं और अब वह इसे वैश्विक स्तर पर लॉन्च करने की तैयारी में हैं.

हर युद्ध की एक कीमत होती है, और यह कीमत अक्सर आम लोग ही चुकाते हैं. कभी अपनों को खोकर, कभी घर उजड़ने से, और कभी दूर रहकर भी युद्ध का असर झेलते हुए. इस समय भारत समेत दुनिया के कई देशों के लोग भी इसके असर को महसूस कर रहे हैं. वहीं युद्ध के बीच इजराइल, ईरान और पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र की बड़ी आबादी की कम से कम नींद तो छिन ही गई है.

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