ईरान में जंग की कीमत चुका रहा US, इस सस्ते ड्रोन से ट्रंप आर्मी के छूटे पसीने... तकनीक भी किया हाईजैक

ईरान के साथ जारी युद्ध में अमेरिका को भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है. रिपोर्ट के मुताबिक जंग के पहले 100 घंटों में अमेरिका करीब 3.7 अरब डॉलर खर्च कर चुका है. ईरान के सस्ते ड्रोन हमलों को रोकने के लिए अमेरिका को बेहद महंगे मिसाइल सिस्टम इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं, जिससे युद्ध की लागत तेजी से बढ़ रही है.

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अमेरिका ने भी ईरानी ड्रोन का रिवर्स इंजीनियरिंग कर खुद का सस्ता ड्रोन बनाया है. (Photo- AP) अमेरिका ने भी ईरानी ड्रोन का रिवर्स इंजीनियरिंग कर खुद का सस्ता ड्रोन बनाया है. (Photo- AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:14 AM IST

ईरान के साथ जारी सैन्य टकराव में भले ही अमेरिका को रणनीतिक और तकनीकी बढ़त हासिल हो, लेकिन इस जंग की आर्थिक कीमत लगातार बढ़ती जा रही है. युद्ध के शुरुआती चार दिनों में ही अमेरिका को हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पड़े हैं और अगर संघर्ष लंबा चला तो यह बोझ और भी बढ़ सकता है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक जंग के पहले करीब 100 घंटों यानी शुरुआती चार दिनों में अमेरिका ने लगभग 3.7 अरब डॉलर यानी करीब 34,000 करोड़ रुपये खर्च कर दिए. इसका मतलब है कि अमेरिका को हर दिन करीब 891 मिलियन डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं. यह अनुमान वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रेटजिक इंटरनेशनल स्टडीज ने लगाया है.

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विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के शुरुआती चरण में सबसे ज्यादा खर्च इसलिए होता है क्योंकि इसमें अत्याधुनिक और महंगे हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है. यही वजह है कि शुरुआती हमलों में अमेरिका को भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ा.

ईरान की रणनीति के आगे US का एयर सुपीरियरिटी भी फेल

इस जंग में ईरान ने एक अलग रणनीति अपनाई है. ईरान बड़े पैमाने पर सस्ते लेकिन घातक ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है. ये ड्रोन एकतरफा हमले के लिए बनाए जाते हैं और लक्ष्य से टकराकर विस्फोट करते हैं.

टेक्सास स्थित ड्रोन कंपनी के मुताबिक यह युद्ध आर्थिक लिहाज से भी असमान है. उन्होंने कहा, "किसी ड्रोन को गिराने की लागत, उसे आसमान में भेजने की लागत से कहीं ज्यादा होती है." उन्होंने आगे कहा, "यह पूरी तरह पैसों का खेल है. कई मामलों में एक ड्रोन को रोकने में जितना खर्च होता है, वह ड्रोन बनाने की लागत से 10 गुना तक ज्यादा हो सकता है. कुछ मामलों में यह अंतर 60 से 70 गुना तक भी हो सकता है."

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ईरान जिन ड्रोन का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है, उनमें 'शाहेद' सीरीज के ड्रोन शामिल हैं. ये त्रिकोण आकार के 'लोइटरिंग म्यूनिशन' होते हैं जो लक्ष्य के ऊपर मंडराते हैं और फिर टकराकर विस्फोट करते हैं. लगभग 11 फीट लंबे ये ड्रोन ट्रकों से भी लॉन्च किए जा सकते हैं, जिससे इन्हें छिपाना आसान होता है.

एक सस्ते ड्रोन को मारने में 3 मिलियन डॉलर का नुकसान

'शाहेद-136' जैसे ड्रोन की मारक क्षमता करीब 2,500 किलोमीटर तक बताई जाती है, जिससे पूरे पश्चिम एशिया के बड़े हिस्से को निशाना बनाया जा सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक एक शाहेद ड्रोन बनाने की लागत करीब 30,000 से 50,000 डॉलर के बीच होती है.

इसके मुकाबले अमेरिका जिस पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल करता है, उसके एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत 3 मिलियन डॉलर से भी ज्यादा होती है. यानी एक सस्ते ड्रोन को गिराने के लिए कई गुना ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है.

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ईरान की मिसाइल को रिवर्स इंजीनियरिंग कर रहा अमेरिका

लागत कम करने के लिए अमेरिका अब नए विकल्पों पर काम कर रहा है. अमेरिकी रक्षा विभाग ने सस्ते इंटरसेप्टर ड्रोन विकसित करने की योजना शुरू की है. इसके तहत कई कंपनियों को कॉन्ट्रैक्ट दिए गए हैं ताकि कम लागत वाले ड्रोन तैयार किए जा सकें जो दुश्मन के ड्रोन को ही हवा में नष्ट कर सकें.

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अमेरिका ने ईरान के एक कब्जे में लिए गए ड्रोन को रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए समझा और उसी आधार पर एक नया सिस्टम विकसित किया है. इस ड्रोन को LUCAS (Low-cost Unmanned Combat Attack System) नाम दिया गया है. यह सिस्टम एरिजोना स्थित कंपनी द्वारा बनाया जा रहा है. इसकी अनुमानित कीमत करीब 35,000 डॉलर बताई जा रही है, जो पारंपरिक इंटरसेप्टर मिसाइलों की तुलना में काफी सस्ती है.

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