अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है. तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और वैश्विक बाजारों में महंगाई की आशंका गहरा गई है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव और पाबंदियों की वजह से तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है. इसी बीच ईरान ने पहली बार खुलकर बताया है कि वह किन शर्तों पर अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध समाप्त करने को तैयार है.
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा है कि युद्ध खत्म करने का एकमात्र रास्ता यह है कि ईरान के "वैध अधिकारों" को स्वीकार किया जाए, युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई की जाए और भविष्य में किसी भी हमले के खिलाफ ठोस अंतरराष्ट्रीय गारंटी दी जाए. उनका कहना है कि अगर इन तीनों शर्तों को मान लिया जाता है तो तेहरान जंग समाप्त करने के लिए तैयार है.
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पेजेशकियन ने यह बयान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दिया. उन्होंने लिखा, "रूस और पाकिस्तान के नेताओं से बात करते हुए, मैंने इस इलाके में शांति के लिए ईरान के वादे को फिर से पक्का किया. जायोनी शासन और US की वजह से शुरू हुई इस लड़ाई को खत्म करने का एकमात्र तरीका ईरान के कानूनी अधिकारों को पहचानने, हर्जाना देने और भविष्य में हमले के खिलाफ पक्की अंतरराष्ट्रीय गारंटी देने पर टिका है."
ईरानी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि मौजूदा संघर्ष की शुरुआत "जायनिस्ट शासन और अमेरिका" की कार्रवाई से हुई. उनका कहना है कि जब तक इन मुद्दों पर ठोस समझौता नहीं होता, तब तक युद्ध खत्म करना संभव नहीं होगा. ईरान इन देशों सहित अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ लगातार संपर्क में है और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है.
ईरान की यह कूटनीतिक पहल ऐसे समय में सामने आई है जब युद्ध दूसरे हफ्ते में पहुंच चुका है और फिलहाल तनाव कम होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे. तेहरान का कहना है कि वह क्षेत्र में शांति चाहता है, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार देशों को जवाबदेह ठहराया जाना जरूरी है.
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यह संघर्ष 28 फरवरी को उस समय शुरू हुआ था जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ संयुक्त रूप से एहतियाती हमला किया. इसके जवाब में ईरान ने इजरायल के कई शहरों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए. इसके अलावा जॉर्डन, इराक और खाड़ी के कई देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया गया है. इन घटनाओं के बाद पूरे मध्य पूर्व में तनाव तेजी से बढ़ा है और हालात और ज्यादा गंभीर होते जा रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संघर्ष का असर सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री माइनिंग और बढ़ते सैन्य तनाव के कारण तेल और गैस के टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है और आने वाले समय में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है.
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