लंबा खिंचता दिख रहा ईरान युद्ध, ट्रंप की राष्ट्रपति की कुर्सी भी खतरे में पड़ेगी?

अमेरिका और इजरायल का ईरान के साथ युद्ध लंबा खिंचता दिख रहा है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह युद्ध सितंबर तक खिंच सकता है और ऐसा हुआ, तो यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के लिए भी खतरा बन सकता है.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप  (Photo- ITG) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Photo- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:22 AM IST

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खुमैनी की मौत के दो दिन बाद कहा था कि यह युद्ध चार से पांच हफ्ते तक चल सकता है. इसके विपरीत ईरान युद्ध लंबा खिंचता दिख रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक युद्ध सितंबर तक खिंच सकता है और इससे बतौर राष्ट्रपति ट्रंप की स्थिति पर असर पड़ सकता है. कहा तो यहां तक जाने लगा है कि यह डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए बड़ा खतरा बन सकता है.

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अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर 28 फरवरी को हमला किया था. हमले के हफ्तेभर हो चुके हैं और युद्ध की आग मध्य पूर्व के नौ देशों तक फैल चुकी है. बदलते हालात में इसका असर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर भी पड़ सकता है. अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन अब लंबे संघर्ष के लिए अपने संसाधन तैयार कर रहा है. अधिकारियों की मानें तो यह युद्ध कम से कम सितंबर तक चल सकता है, जो अमेरिका के मिडटर्म चुनाव से दो महीने पहले का समय होगा.

यह ट्रंप के उस बयान के चार दिन बाद की स्थिति है, जिसमें उन्होंने कहा था कि युद्ध चार से पांच हफ्ते तक चलेगा. रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रंप प्रशासन इस स्तर के युद्ध के लिए तैयार नहीं था. अमेरिका और इजरायल को उम्मीद थी कि खामेनेई की मौत के बाद ईरान झुक जाएगा और वहां सत्ता परिवर्तन हो सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके उलट खामेनेई की मौत के बाद ईरान और ज्यादा आक्रामक हो गया है.

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ईरान में लंबी लड़ाई की तैयारी

पॉलिटिको की रिपोर्ट के मुताबिक पेंटागन अब खुफिया अभियानों का तेजी से विस्तार कर रहा है और वॉशिंगटन, इजरायल के साथ मिलकर ईरान में लंबी लड़ाई की तैयारी कर रहा है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने फ्लोरिडा के टैम्पा स्थित अपने मुख्यालय में अतिरिक्त सैन्य खुफिया अधिकारियों की तैनाती की मांग की है. ये अधिकारी कम से कम सौ दिन तक ईरान के खिलाफ अभियानों में मदद करेंगे. इसे इस युद्ध के लिए खुफिया कर्मचारियों को बढ़ाने की दिशा में ट्रंप प्रशासन का पहला बड़ा कदम माना जा रहा है.

इसके साथ ही अमेरिका ने भारत को समुद्र में पहले से मौजूद रूसी तेल कार्गो खरीदने के लिए 30 दिन की छूट दी है. यह कदम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान के बीच उठाया गया है और इससे संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन को उम्मीद है कि खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति जल्द सामान्य हो सकती है. तेजी से की जा रही सैन्य तैयारियां भी यह दिखाती हैं कि वॉशिंगटन ने इस संघर्ष के आकार और ईरान की क्षमता को कम आंका था. आमतौर पर बड़े सैन्य अभियान महीनों की योजना के बाद शुरू होते हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने बहुत कम समय में सेना को तैनात किया.

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पॉलिटिको की एक रिपोर्ट के मुताबिक खामेनेई की मौत से कुछ दिन पहले ट्रंप के वरिष्ठ सलाहकार चाहते थे कि पहले इजरायल हमला करे और उसके बाद अमेरिका शामिल हो. इससे यह संदेश जाता कि हमला इजरायल ने शुरू किया. लेकिन आखिरकार दोनों देशों ने संयुक्त रूप से हमला किया और इससे अमेरिका सीधे युद्ध में शामिल हो गया. ईरानी सूत्रों के अनुसार इस युद्ध में अब तक एक हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इनमें ईरान के मीनाब शहर के एक प्राथमिक स्कूल पर हुए दोहरे हमले में 165 से अधिक स्कूली लड़कियों की मौत भी शामिल है.

ट्रंप के लिए यह युद्ध चुनौती

यह युद्ध ट्रंप के लिए घरेलू राजनीति में भी चुनौती बन सकता है. उनकी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी कई नेता ऐसे हैं, जो इस युद्ध के खिलाफ हैं. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि इजरायल की कार्रवाई के कारण अमेरिका को कदम उठाना पड़ा. उन्होंने कहा कि अमेरिका को पहले से पता था कि इजरायल हमला करेगा और उसके बाद अमेरिकी ठिकानों पर हमले हो सकते हैं. इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा है कि यह हमला अमेरिका, राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी सेना की मदद से किया गया.

यह युद्ध लंबा खिंचा, तो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए घरेलू राजनीति के मोर्चे पर नुकसानदेह हो सकता है. युद्ध के कारण घरेलु मुद्दों से ट्रंप का ध्यान हट सकता है और इसका असर सहयोगी देशों के साथ रिश्तों पर भी पड़ सकता है. विश्व बाजार में तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं और शेयर मार्केट गिरे हैं. इन सबके लिए अमेरिका को ही जिम्मेदार ठहराया जा रा है. आने वाले महीनों में इस युद्ध का राजनीतिक असर भी साफ दिखाई दे सकता है.

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