ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की नई दिल्ली में हुई बैठक के दौरान ईरान और यूएई के बीच तीखी बहस देखने को मिली. पश्चिम एशिया में जारी तनाव, होर्मुज स्ट्रेट और अमेरिका की भूमिका को लेकर दोनों देशों के बीच माहौल गर्म हो गया. ऐसे हालात में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बेहद संतुलित और कूटनीतिक अंदाज में दोनों पक्षों के बीच बैलेंस बनाने की कोशिश की.
बैठक के बाद रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने खुलासा किया कि सेशन के दौरान ईरान और यूएई के बीच "तीखी बहस" हुई. लावरोव ने कहा कि मौजूदा युद्ध की जड़ अमेरिका की नीतियां हैं और ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद नहीं किया. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव में भारत एक अहम मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है.
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दरअसल, ईरान और यूएई के रिश्ते हाल के महीनों में काफी खराब हुए हैं. ईरान लगातार यूएई पर अमेरिका और इजरायल के साथ खड़े होने का आरोप लगाता रहा है. वहीं यूएई को डर है कि क्षेत्रीय संघर्ष का असर उसकी अर्थव्यवस्था और व्यापार पर पड़ सकता है. इसी वजह से ब्रिक्स मीटिंग में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच कई मुद्दों पर टकराव देखने को मिला.
जयशंकर ने एकतरफा दबाव और प्रतिबंधों का भी किया जिक्र
भारत ने इस पूरे विवाद में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से बचते हुए संतुलित रुख अपनाया. जयशंकर ने अपने संबोधन में ऊर्जा सप्लाई में रुकावट, समुद्री व्यापार पर खतरे और "एकतरफा दबाव और प्रतिबंध" यानी एकतरफा प्रतिबंधों का मुद्दा उठाया. माना जा रहा है कि यह इशारा अमेरिका के ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों की तरफ था.
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'शांति टुकड़ों में नहीं आ सकती', बोले जयशंकर
जयशंकर ने साफ कहा कि "स्थिरता चुनिंदा नहीं हो सकती और शांति टुकड़ों में नहीं लाई जा सकती." उन्होंने जोर देकर कहा कि होर्मुज और रेड सी जैसे समुद्री रास्तों का सुरक्षित और खुला रहना पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है.
ब्रिक्स बैठक के दौरान भारत ने खुद को एक जिम्मेदार और संतुलित ताकत के तौर पर पेश करने की कोशिश की. यही वजह है कि रूस ने भी खुले तौर पर कहा कि भारत भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है.
आजतक इंटरनेशनल डेस्क