ईरान-इजरायल युद्ध के 17वें दिन ईरान ने इजरायल पर 55वां बड़ा हमला करने का दावा किया है. ईरान का कहना है कि उसने बैलिस्टिक, हाइपरसोनिक, सेजिल मिसाइल के साथ ड्रोन से तेल अवीव समेत कई ठिकानों को निशाना बनाया. लेकिन जमीनी तस्वीर बताती है कि बड़े दावों के बावजूद नुकसान सीमित दिख रहा है. इसकी वजह इजरायल का मजबूत मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम माना जा रहा है.
ईरान के मुताबिक, इन हमलों में तेल अवीव के कई इलाकों को निशाना बनाया गया. इसके अलावा बेन गुरियन एयरपोर्ट और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) जैसे हथियार निर्माण केंद्रों पर भी हमला करने का दावा किया गया. ईरान ने यह भी कहा कि एयर-रिफ्यूलिंग ऑपरेशंस से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया. ईरान का कहना है कि इस हमले में फतह, इमाद और गदर मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया.
इसके साथ ही ड्रोन से भी अटैक किए गए. कुछ दावों में अमेरिकी ठिकानों को भी निशाना बनाने की बात कही गई है. हालांकि, इन दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जमीन पर भी उतना ही नुकसान हुआ है, जितना दावा किया जा रहा है. तेल अवीव से सामने आई तस्वीरों में कुछ जगहों पर नुकसान के निशान जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन व्यापक तबाही जैसी स्थिति कहीं पर भी नहीं दिख रही है.
एक इलाके में जला हुआ घर नजर आया, जहां हमले के बाद आग और टूट-फूट के निशान दिखाई दिए. लेकिन आसपास के कई घर अपेक्षाकृत सुरक्षित दिखाई देते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां बड़े बैलिस्टिक मिसाइल का हमला नहीं बल्कि क्लस्टर बम के असर से नुकसान हुआ. बताया गया कि लगभग दस-बारह छोटे बम अलग-अलग जगह गिरे, जिनके विस्फोट से सीमित नुकसान हुआ.
सेजिल मिसाइल अटैक का दावा
युद्ध के 16वें दिन यानी रविवार को ईरान ने दावा किया कि उसने पहली बार इजरायल के खिलाफ सेजिल मिसाइल का इस्तेमाल किया है. सेजिल एक मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल मानी जाती है, जिसकी खासियत इसकी टू-स्टेज फ्यूल टेक्नोलॉजी है. इसका पहला हिस्सा लॉन्च के साथ मिसाइल को ऊंचाई तक ले जाता है. इसके बाद दूसरा हिस्सा अलग होकर मिसाइल को तेज रफ्तार से लक्ष्य तक पहुंचाता है.
इस मिसाइल की लंबाई करीब 18 मीटर बताई जाती है, जबकि इसका व्यास लगभग 1.25 मीटर है. कुल वजन करीब 23,600 किलोग्राम और पेलोड क्षमता लगभग 700 किलोग्राम बताई जाती है. इसकी मारक क्षमता करीब 2,000 किलोमीटर तक मानी जाती है. ईरान से इजरायल की दूरी करीब 1500 से 1700 किलोमीटर के बीच है. ऐसे में सेजिल जैसी मिसाइल करीब 12 मिनट में इजरायल तक पहुंच सकती है.
मोबाइल लॉन्चर से मिसाइल अटैक
सेजिल मिसाइल को रोड-मोबाइल ट्रांसपोर्टर से लॉन्च किया जा सकता है. इसका मतलब यह है कि इसे चलती-फिरती लॉन्च यूनिट से दागा जा सकता है और लॉन्च के बाद प्लेटफॉर्म तुरंत लोकेशन बदल सकता है. इस वजह से सैटेलाइट या निगरानी प्रणाली के लिए सटीक लोकेशन पकड़ना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में सवाल ये है कि यदि ईरान ऐसी मिसाइलें दाग रहा है, तो इजरायल में बड़ा नुकसान क्यों नहीं दिख रहा.
इसका जवाब इजरायल और अमेरिका के साझा सुरक्षा कवच में छिपा माना जा रहा है. तेहरान से मिसाइल दागे जाने के बाद सैटेलाइट, ड्रोन, टोही विमान और रडार सिस्टम तुरंत उसकी लोकेशन को ट्रैक करने लगते हैं. मिसाइल की उड़ान को रडार के जरिए लगातार मॉनिटर किया जाता है. इराक में मौजूद ऐन-अल-असद बेस पर अमेरिकी पैट्रियट मिसाइल बैटरी तैनात है.
इजरायली मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस
वहीं जॉर्डन के मुवफ्फाक साल्टी एयर बेस पर भी पैट्रियट और THAAD मिसाइल सिस्टम तैनात हैं. यहां F-15 स्ट्राइक ईगल स्क्वाड्रन भी एयर डिफेंस की भूमिका में मौजूद है. इसके अलावा भूमध्य सागर में अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भी तैनात है, जो किसी भी संभावित खतरे को रोकने के लिए तैयार रहता है. इजरायल के पास मजबूत मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम है.
इसमें आयरन डोम, डेविड स्लिंग, पैट्रियट, THAAD और एरो-3 जैसे सिस्टम शामिल हैं. आयरन डोम लगभग 70 किलोमीटर तक का सुरक्षा घेरा देता है. THAAD सिस्टम करीब 200 किलोमीटर तक के क्षेत्र को सुरक्षित बना सकता है. डेविड स्लिंग करीब 300 किलोमीटर तक आने वाली मिसाइलों को रोकने में सक्षम माना जाता है. एरो-3 एयर डिफेंस सिस्टम 2400 किलोमीटर तक के खतरे को इंटरसेप्ट कर लेता है.
सीमित नुकसान के पीछे क्या वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार जब मिसाइलों को हवा में ही इंटरसेप्ट कर लिया जाता है, तो उनके वॉरहेड या क्लस्टर बम के टुकड़े जमीन पर गिरकर सीमित नुकसान पहुंचा सकते हैं. मध्य इजरायल में एक जगह ऐसा ही दृश्य देखने को मिला, जहां मिसाइल के वॉरहेड के गिरने से जमीन में गड्ढा बन गया था. बाद में उस जगह को जल्दी भर दिया गया. आसपास के कांच टूटने के अलावा ज्यादा नुकसान नहीं दिखा.
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह बड़ा बैलिस्टिक मिसाइल हमला नहीं बल्कि क्लस्टर बम का असर था. इन सबके बीच यह बहस भी तेज है कि क्या ईरान लगातार हमलों के वीडियो जारी कर यह दिखाना चाहता है कि उसके पास अब भी बड़ी संख्या में मिसाइलें और ड्रोन मौजूद हैं. युद्ध के 17वें दिन की तस्वीर बताती है कि दोनों पक्षों के दावे और जमीन पर दिखने वाली हकीकत के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है.
श्वेता सिंह