मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने ईरान को चारों तरफ से घेरने की रणनीति तेज कर दी है. 21 युद्धपोत, हजारों मरीन कमांडो और फाइनल ब्लो की तैयारी ने जमीनी जंग की आशंका को मजबूत कर दिया है. होर्मुज स्ट्रेट से लेकर खार्ग द्वीप तक अब हर मोर्चे पर बड़ा टकराव संभव दिख रहा है.
इस पूरे युद्ध क्षेत्र में अमेरिका के 21 भारी युद्धपोत, डेस्ट्रॉयर और एयरक्राफ्ट कैरियर ईरान की घेराबंदी करके खड़े हैं. इनमें से 10 युद्धपोत अकेले अरब सागर में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के पास तैनात हैं, जबकि 3 युद्धपोत पर्शियन गल्फ में खार्ग द्वीप के करीब मौजूद हैं. इन सभी युद्धपोतों में असॉल्ट शिप भी शामिल है.
इस असॉल्ट शिप का नाम USS ट्रिपोली है. इसे एम्फीबियस असॉल्ट शिप कहा जाता है. इसका इस्तेमाल जमीनी हमलों के लिए किया जाता है. यह युद्धपोत 27 मार्च को अरब सागर में पहुंचा है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक इसमें 3500 मरीन कमांडो हैं. मरीन कमांडो किसी देश के तट पर उतरकर हमला करते हैं.
इसके बाद वहां पर कब्जा कर लेते हैं. अब तक इस युद्ध में अमेरिका ने मरीन को तैनात नहीं किया था, लेकिन अब उनकी मौजूदगी जमीनी हमले के संकेत दे रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका अब फाइनल ब्लो यानी अंतिम प्रहार की तैयारी में है. इस मिशन के तीन बड़े टारगेट बताए जा रहे हैं.
US का 'प्लान-Z' और 3 बड़े टारगेट
अमेरिका का पहला टारगेट ईरान का 440 किलोग्राम यूरेनियम है, जिसे 60 प्रतिशत तक समृद्ध किया जा चुका है. रणनीति के तहत अमेरिका 5 से 10 हजार सैनिकों को ईरान की न्यूक्लियर साइट पर उतार सकता है. इन सैनिकों को वहां तैनात ईरानी सैन्य बलों से लड़ना होगा. यूरेनियम को लेकर विमान से बाहर जाना होगा.
अमेरिका और इजरायल के लिए यह मिशन आसान नहीं होगा. इसमें तीन बड़े खतरे बताए जा रहे हैं. पहला, ईरान की न्यूक्लियर साइट पर अमेरिकी सैनिकों से दो से तीन गुना ज्यादा जवान मौजूद हो सकते हैं और सरप्राइज अटैक का खतरा भी रहेगा. दूसरा, ईरान अमेरिकी सैनिकों को बंधक बना सकता है.
होर्मुज स्ट्रेट पर कब्जे की रणनीति
इस वजह से अमेरिका की स्थिति बेहद कमजोर हो सकती है. तीसरा, इस ऑपरेशन के दौरान न्यूक्लियर रेडिएशन लीक का खतरा है, जो बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकता है. अमेरिका का दूसरा बड़ा टारगेट है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल जहाजों के जरिए गुजरता है.
यदि अमेरिका इसे अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश करता है, तो पहले युद्धपोतों के जरिए समुद्र में बिछाई गई माइन हटाई जाएंगी. इसके बाद USS ट्रिपोली ईरान के तट पर पहुंचेगा और हजारों मरीन कमांडो वहां उतरकर ऑपरेशन चलाएंगे. लेकिन यह रास्ता आसान नहीं है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के पास ईरान के 7 प्रमुख द्वीप हैं.
ईरान में जमीनी युद्ध का गणित
इन द्वीपों पर ईरान की नेवी का मजबूत नियंत्रण है. इनमें केशम द्वीप सबसे अहम माना जाता है. यहां अंडरग्राउंड मिसाइल बंकर, हजारों स्पीड बोट और बड़ी संख्या में सैनिक तैनात हैं. इसके अलावा लार्क, होर्मुज, हेंगम और अबू मूसा द्वीप भी रणनीतिक रूप से बेहद अहम हैं. ईरान के पास करीब 10 लाख सैनिक हैं.
पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिका के पास सिर्फ 50 हजार जवान मौजूद हैं. युद्ध का गणित कहता है कि इतने कम सैनिकों के साथ इतने बड़े देश में जमीनी युद्ध संभव नहीं है. इसके लिए कम से कम 3 लाख सैनिकों की जरूरत होगी. साल 2003 के इराक युद्ध और गाजा में इजरायल के ऑपरेशन का उदाहरण भी यही दिखाता है.
ईरान की जवाबी हमले की तैयारी
इसके अनुसार बड़े जमीनी अभियान के लिए भारी संख्या में सैनिक जरूरी होते हैं. अमेरिका का तीसरा बड़ा टारगेट खार्ग द्वीप है, जहां से ईरान अपने 90 प्रतिशत कच्चे तेल का निर्यात करता है. यहां करीब 3 करोड़ बैरल तेल स्टोर रहता है और यह द्वीप ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है.
अमेरिकी योजना के मुताबिक, 2 हजार पैराट्रूपर्स को हवाई रास्ते से इस द्वीप पर उतार सकता है. इसके साथ ही 24 से 36 घंटे तक लगातार हवाई हमले किए जा सकते हैं. इसके बाद पर्शियन गल्फ में मौजूद युद्धपोतों को भी यहां भेजा जा सकता है.ईरान ने भी अपनी तैयारी तेज कर दी है. खार्ग द्वीप के पास 1 लाख सैनिक तैनात किए गए हैं.
ट्रंप की चेतावनी और आशंका
इसके अलावा समुद्र में माइन बिछाई गई हैं और एंटी एयरक्राफ्ट सिस्टम तैनात किए गए हैं. सबसे बड़ा खतरा यह है कि यदि इस द्वीप पर हमला होता है, तो ईरान तेल भंडार में आग लगा सकता है, जिससे भारी तबाही हो सकती है. इस पूरे घटनाक्रम के बीच डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है.
ट्रंप ने साफ कहा है कि यदि ईरान ने शर्तें नहीं मानीं, तो उसके पावर प्लांट, तेल के कुएं, खार्ग द्वीप और पानी साफ करने वाले प्लांट को निशाना बनाया जाएगा. उनका यह रुख संकेत दे रहा है कि अमेरिका अब बड़ा कदम उठाने के मूड में है. जंग की आशंका का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी साफ दिख रहा है.
तेल बाजार में मची उथल-पुथल
कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 116 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. 28 फरवरी को यही कीमत 68 डॉलर थी, यानी अब तक इसमें 71 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है. ऐसे में सवाल यही है कि यदि जमीनी जंग शुरू होती है, तो दुनिया भर में इसका असर कितना बड़ा होगा. फिलहाल, एक चिंगारी पूरे नक्शे को बदल सकती है.
आजतक ब्यूरो