कल्पना कीजिए कि भारत के सामने एक साथ तेल के तीन दरवाजे बंद होने लगें. पहला दरवाजा ईरान का, जहां अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से भारत पहले ही तेल खरीदना बंद कर चुका है. दूसरा रूस का, जिस पर बढ़ते पश्चिमी दबाव और प्रतिबंधों ने मुश्किलें पैदा कर दी है. और तीसरा होर्मुज स्ट्रेट का, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है और अमेरिका-ईरान तनाव की वजह से इस रास्ते पर लगातार खतरा बना हुआ है.
ऐसे समय में दुनिया के दूसरे छोर पर मौजूद वेनेजुएला भारत के लिए एक नई एनर्जी लाइफलाइन बनकर उभरता दिख रहा है. यही वजह है कि हाल के दिनों में भारत और वेनेजुएला के बीच बढ़ती नजदीकियां सिर्फ एक तेल सौदा नहीं, बल्कि बड़ी भू-राजनीतिक कहानी बन गई हैं.
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भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, जो अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. लंबे समय तक भारत की तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता रहा है, जिनका तेल होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. लेकिन जब भी इस जलमार्ग में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतों से लेकर आपूर्ति तक सब प्रभावित होता है.
हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव, जहाजों पर खतरे और बढ़े हुए बीमा शुल्क ने भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है. इसके साथ ही रूस से सस्ते तेल की खरीद भी लगातार अमेरिकी निगरानी और राजनीतिक दबाव के दायरे में रही है. ऐसे में भारत के सामने सवाल था कि अगर खाड़ी और रूस दोनों अनिश्चित हो जाएं, तो विकल्प क्या होगा?
क्यों खास है वेनेजुएला?
वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार वाले देशों में गिना जाता है. उसके पास करीब 300 अरब बैरल से ज्यादा तेल भंडार होने का अनुमान है. हालांकि वर्षों तक राजनीतिक संकट, आर्थिक बदहाली और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उसका तेल उद्योग कमजोर पड़ गया.
लेकिन हालिया राजनीतिक बदलावों और अमेरिका समर्थित व्यवस्था के बाद वेनेजुएला की तेल इंडस्ट्री को फिर से सक्रिय करने की कोशिशें तेज हुई हैं. इसी दौर में वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना माचाडो के नेतृत्व वाली नई व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलने लगा और तेल निर्यात के रास्ते फिर खुलने लगे. यहीं से भारत के लिए एक बड़ा अवसर खुल गया.
होर्मुज से दूर, लेकिन ज्यादा सुरक्षित कैसे
पहली नजर में लगता है कि दक्षिण अमेरिका से भारत तक तेल लाना खाड़ी देशों की तुलना में कहीं ज्यादा महंगा होगा. दूरी भी कई गुना अधिक है. लेकिन मौजूदा हालात में तस्वीर उलट गई है. खाड़ी से आने वाले तेल पर युद्ध जोखिम बीमा, सुरक्षा खर्च और समुद्री तनाव के कारण अतिरिक्त लागत जुड़ रही है.
दूसरी तरफ वेनेजुएला से आने वाले जहाज अटलांटिक मार्ग का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें होर्मुज, लाल सागर या दूसरे संघर्ष क्षेत्रों से नहीं गुजरना पड़ता. यानी लंबी दूरी के बावजूद कुल लागत कई बार कंपटीशन बन जाती है. सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपूर्ति सुरक्षित रहती है.
वेनेजुएला का तेल भारत के लिए सस्ता कैसे होगा?
सामान्य तौर पर देखा जाए तो वेनेजुएला भारत से काफी दूर है, इसलिए वहां से तेल लाना महंगा पड़ना चाहिए. लेकिन होर्मुज संकट ने यह गणित बदल दिया है. मध्य पूर्व से आने वाले तेल को अब युद्ध जोखिम बीमा, होर्मुज स्ट्रेट में तनाव और लाल सागर में सुरक्षा खतरों की वजह से प्रति बैरल 6 से 8 डॉलर तक अतिरिक्त लागत झेलनी पड़ रही है.
इसके मुकाबले वेनेजुएला से आने वाला तेल भले ही अटलांटिक महासागर और केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबी दूरी तय करता हो, लेकिन उसे किसी युद्ध क्षेत्र या संवेदनशील समुद्री मार्ग से नहीं गुजरना पड़ता. इसलिए इस रूट पर बीमा लागत बहुत कम, करीब 30 से 50 सेंट (0-3-0.5 डॉलर) प्रति बैरल रहती है. नतीजतन, लंबी दूरी के बावजूद वेनेजुएला का तेल भारत पहुंचते-पहुंचते कई मामलों में खाड़ी देशों के तेल से सस्ता पड़ सकता है और भारत के लिए एक सुरक्षित वैकल्पिक सप्लाई सोर्स बन सकता है.
जामनगर की वजह से और बढ़ता है फायदा
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी रिफाइनिंग क्षमता है. खासतौर से रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग फैक्ट्री में गिनी जाती है. वेनेजुएला का 'मेरेय' (Merey) क्रूड भारी और सल्फर तेल माना जाता है.
दुनिया की कई रिफाइनरियां इसे प्रोसेस करने में मुश्किल महसूस करती हैं. लेकिन जामनगर जैसी आधुनिक भारतीय रिफाइनरियां इसी तरह के भारी तेल को उच्च गुणवत्ता वाले डीजल, पेट्रोल और जेट फ्यूल में बदलने के लिए डिजाइन की गई हैं. इसका मतलब है कि भारत सिर्फ वेनेजुएला का तेल खरीद नहीं सकता, बल्कि उससे बेहतर आर्थिक लाभ भी कमा सकता है.
माचाडो सरकार और भारत की बढ़ती नजदीकी
वेनेजुएला की कार्यकारी सरकार प्रमुख डेल्सी रोड्रिगेज दिल्ली दौरे पर आईं और इस दौरान कई करार हुए. भारत-वेनेजुएला ऊर्जा संबंधों में बड़ा बदलाव देखने को मिला. इस दौरान इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम और रिलायंस ने वेनेजुएला के मेरे क्रूड की खरीद के लिए समझौते किए. साथ ही वेनेजुएला ने रुपये में भुगतान स्वीकार करने की पेशकश की, जिससे तेल व्यापार में भारत के लिए डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है.
इसका असर यह हुआ कि मई 2026 तक वेनेजुएला भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया, जहां से रोजाना 4.17 लाख से 4.27 लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति होने लगी और सऊदी अरब पीछे खिसक गया. मसलन, वेनेजुएला को अपने तेल के लिए स्थिर बाजार चाहिए, जबकि भारत को भरोसेमंद और ऑयल सोर्सेज से ऊर्जा आपूर्ति चाहिए. यही वजह है कि दोनों देशों के हित एक-दूसरे से मेल खाते नजर आ रहे हैं.
अमेरिका को भी क्यों है फायदा?
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी कहानी में अमेरिका भी एक महत्वपूर्ण किरदार है. वॉशिंगटन लंबे समय से चाहता रहा है कि भारत रूस और ईरान पर अपनी ऊर्जा निर्भरता कम करे. वेनेजुएला की तेल इंडस्ट्री को दोबारा सक्रिय करने और उसे वैश्विक बाजार से जोड़ने से अमेरिका को भी रणनीतिक फायदा मिलता है. भारत को एक नया विकल्प मिलता है, वेनेजुएला को राजस्व मिलता है और अमेरिका अपने भू-राजनीतिक मकसद को आगे बढ़ा सकता है.
एम. नूरूद्दीन