वैश्विक नेता जब डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे और अधिक अस्थिर कार्यकाल से निपटने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं. ऐसे में जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट इयान ब्रेमर ने कहा है कि भारत, अमेरिका से मजबूत स्थिति में संवाद करने की क्षमता रखता है. इसमें प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ जैसे मुद्दे भी शामिल हैं.
दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वार्षिक बैठक के दौरान इंडिया टुडे से बातचीत में ब्रेमर ने कहा कि भारत, अमेरिका का पार्टनर और मित्र बना हुआ है. यही रिश्ता भारत को यूरोप के कई अमेरिकी सहयोगी देशों की तुलना में ट्रंप के सामने अधिक मजबूती से अपनी बात रखने की गुंजाइश देता है.
यूरेशिया ग्रुप के अध्यक्ष ब्रेमर ने ट्रंप के दौर में अमेरिका के सहयोगियों और साझेदारों के बीच साफ अंतर बताते हुए कहा कि भारत, अमेरिका का पार्टनर और मित्र है. यूरोपीय देश अमेरिका के सहयोगी हैं. यह राष्ट्रपति ट्रंप के पार्टनर और मित्र होने से बिल्कुल अलग बात है.
उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीतिक निरंतरता और घरेलू सत्ता के कारण कई पश्चिमी नेताओं की तुलना में कहीं अधिक मजबूत दीर्घकालिक स्थिति में हैं. ब्रेमर ने कहा कि मोदी एक नेता के तौर पर लंबे समय के लिए बेहतर और अधिक स्थिर स्थिति में हैं. यही निरंतरता उन्हें यूरोप के कई नेताओं की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से ट्रंप के सामने अपनी बात रखने का अवसर देती है और पिछले कुछ दिनों में हमने इसे होते देखा भी है.
भारत को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का प्रस्ताव
डोनाल्ड ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लेकर इयान ब्रेमर ने कहा कि इस बोर्ड में शामिल होने के लिए कोई अनिवार्य भुगतान नहीं है और जिस एक अरब डॉलर की राशि को लेकर चर्चा हो रही है, वह केवल स्थायी सदस्यता चाहने वाले देशों पर लागू होती है.
ब्रेमर ने कहा कि मेरी जानकारी में अब तक जिसने भी सदस्यता स्वीकार की है, उसने वह एक अरब डॉलर का योगदान नहीं दिया है. ब्रेमर ने भारत के लिए इस बोर्ड की तात्कालिक अहमियत को कमतर बताते हुए कहा कि अमेरिका के साथ भारत की व्यापार वार्ताएं कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं.
हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि सावधानी बरतते हुए इसमें भागीदारी की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह कोई स्थायी प्रतिबद्धता नहीं है. अगर चीजें ठीक नहीं रहीं, तो भारत इससे अलग हो सकता है. उन्होंने उदाहरण देते हुए चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से इटली के बाहर निकलने का हवाला दिया.
ब्रेमर ने चेतावनी दी कि भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ट्रंप का यह बोर्ड उन वैश्विक संस्थाओं को कमजोर न करे, जिनसे उसे लाभ मिलता है. उन्होंने कहा कि इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का इस्तेमाल संयुक्त राष्ट्र की बहुपक्षीय व्यवस्था को कमजोर करने या उन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को तोड़ने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जो वैश्विक स्तर पर अहम हैं और जिनका भारत भी हिस्सा है.
उन्होंने कहा कि अगर भारत इसमें भाग लेने का फैसला करता है, तो उसे यह पक्का करना होगा कि उसकी भागीदारी रचनात्मक हो और किसी ऐसे दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा न दे, जिससे सभी को नुकसान पहुंचे.
ट्रंप के सामने डटे रहने से मिले सबक
ब्रेमर ने हालिया घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की धमकियों के खिलाफ यूरोपीय देशों के सामूहिक प्रतिरोध से यह साबित हुआ है कि तालमेल के साथ दबाव बनाया जाए तो असर हो सकता है. उन्होंने डेनमार्क से जुड़े टैरिफ पर ट्रंप के पीछे हटने को ट्रंप का घुटने टेकना बताया और तर्क दिया कि जो नेता साफ रेड लाइन खींचते हैं, वे कई बार नीतिगत पलटाव करवाने में सफल रहते हैं.
ब्रेमर ने कहा कि इस पूरी कहानी से सबक यह है कि ट्रंप के खिलाफ दबाव बनाने और उसमें सफल होने की एक रणनीति होती है, लेकिन इसके लिए ऐसा नेता चाहिए जो उस नीति को लागू करने के लिए तैयार और सक्षम हो. उन्होंने इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को बताया.
भारत के संदर्भ में ब्रेमर ने कहा कि सबक यह नहीं है कि ट्रंप के अहंकार की पूर्ति की जाए बल्कि आत्मविश्वास के साथ उनसे संवाद किया जाए. उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि दुनिया के अधिकतर नेताओं की तुलना में मोदी ट्रंप के सामने मजबूती से खड़े होने की सबसे बेहतर स्थिति में हैं.
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