भारत आ रहे कनाडाई PM, नहीं जाएंगे पंजाब... ट्रूडो की गलतियों से कार्नी ने लिया सबक?

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों में रणनीतिक रीसेट माना जा रहा है. व्यापार, यूरेनियम समझौता और सुरक्षा सहयोग पर फोकस के साथ यह दौरा पिछले तनाव को पीछे छोड़ नए आर्थिक और कूटनीतिक अध्याय की शुरुआत का संकेत है.

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कनाडा के पीएम मार्क कार्नी 27 फरवरी को भारत दौरे पर आ रहे हैं. (Photo- ITG) कनाडा के पीएम मार्क कार्नी 27 फरवरी को भारत दौरे पर आ रहे हैं. (Photo- ITG)

एम. नूरूद्दीन

  • नई दिल्ली,
  • 26 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:53 PM IST

प्रधानमंत्री मार्क कार्नी 27 फरवरी को भारत दौरे पर आ रहे हैं. कार्नी की ये भारत यात्रा सिर्फ एक राजनयिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच पिछले तीन वर्षों से जमी बर्फ को पिघलाने की एक अहम कोशिश है. भारत और कनाडा के संबंधों में हाल के वर्षों में आई कड़वाहट को देखते हुए इस यात्रा को एक स्ट्रेटेजिक रीसेट यानी ‘रणनीतिक सुधार’ के रूप में देखा जा रहा है.

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प्रधानमंत्री कार्नी की यह यात्रा मुंबई से शुरू होकर नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उच्च स्तरीय वार्ता पर समाप्त होगी. लेकिन इस दौरे का सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि कार्नी दशकों में ऐसे पहले प्रधानमंत्री होंगे जो भारत दौरे में पंजाब नहीं जाएंगे. इससे संकेत मिलता है कि कनाडा अब अपनी विदेश नीति को घरेलू वोट बैंक की राजनीति से अलग कर भारत से संबंध मजबूत करने की दिशा में ले जा रहा है.

भारत-कनाडा संबंधों का इतिहास और ट्रूडो युग की कड़वाहट

भारत और कनाडा के संबंध ऐतिहासिक रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों और मजबूत व्यापारिक हितों पर आधारित रहे हैं. लेकिन 2023 के बाद संबंधों में आई गिरावट ने दोनों देशों को एक अभूतपूर्व कूटनीतिक संकट में डाल दिया. पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में खालिस्तानी अलगाववाद का मुद्दा संबंधों में सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरा.

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सितंबर 2023 में ट्रूडो द्वारा कनाडाई संसद में भारत पर खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप लगाने के बाद संबंध काफी बिगड़ गए थे. भारत ने इन आरोपों को हमेशा 'बेतुका' और राजनीति से 'प्रेरित' बताते हुए खारिज किया और कनाडा पर अपनी धरती पर चरमपंथी तत्वों को पनाह देने का आरोप लगाया.

ट्रूडो सरकार पर यह आरोप भी लगा कि वह कनाडा के सिख समुदाय के एक छोटे लेकिन अलगाववादी धड़े को खुश करने के लिए भारत की संप्रभुता और सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज कर रही है. इस तनाव के कारण दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को निष्कासित किया और व्यापार वार्ताएं रुक गईं.

मार्क कार्नी के सत्ता संभालने के बाद से ही कनाडा ने अपना रुख बदलने के संकेत दिए. जून 2025 में जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और कार्नी की मुलाकात ने संबंधों को सामान्य बनाने की नींव रखी. 

कार्नी की यात्रा का ट्विस्ट: पंजाब न जाने के मायने

कनाडाई पीएम कार्नी की भारत यात्रा का सबसे खास बात वही है जो उनके कार्यक्रम में शामिल नहीं है - पंजाब का दौरा. पिछले दशकों में कनाडा के प्रधानमंत्री, चाहे स्टीफन हार्पर हों या जस्टिन ट्रूडो, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर जरूर जाते रहे हैं. यह कनाडा में रह रहे करीब 8 लाख पंजाबी सिखों के प्रति एक राजनीतिक संदेश माना जाता था. हालत ये थे कि जस्टिन ट्रुडो की सरकार में भी खालिस्तान समर्थक पार्टियां शामिल थीं.

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कार्नी का पंजाब न जाना एक बड़ा कूटनीतिक संकेत है. इसका मतलब है कि उनकी सरकार भारत के साथ संबंधों को किसी एक राज्य या समुदाय के नजरिये से नहीं देख रही. कनाडाई प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि कार्नी का फोकस व्यापार और आर्थिक संबंधों पर है, जबकि सांस्कृतिक जुड़ाव कनाडा में ही किया जाएगा.

भारतीय विशेषज्ञ इसे 'डी-हाइफनेशन' की नीति मानते हैं, जहां द्विपक्षीय संबंधों को घरेलू राजनीति से अलग किया जा रहा है. यह नई दिल्ली के लिए राहत की बात है, क्योंकि भारत लंबे समय से कनाडा से अलगाववादी तत्वों पर सख्ती की मांग करता रहा है.

भारत-कनाडा का 70 अरब डॉलर का व्यापार लक्ष्य
 
मार्क कार्नी की यात्रा का मुख्य केंद्र व्यापार और निवेश है. 2024 में भारत कनाडा का सातवां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा और कुल व्यापार 30.8 अरब डॉलर तक पहुंचा. 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार करीब 13 अरब डॉलर रहा, जिसमें भारत ने 5.3 अरब डॉलर का निर्यात किया.

अब दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर 70 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) पर दोबारा बातचीत शुरू की जा रही है. यह समझौता वस्तुओं के साथ-साथ सेवाओं, डिजिटल व्यापार और निवेश संरक्षण को भी कवर करेगा.

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भारत-कनाडा यूरेनियम समझौता

मार्क कार्नी की यात्रा का सबसे रणनीतिक पहलू नागरिक परमाणु सहयोग को दोबारा शुरू करना है. भारत ने 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 8 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट करने का लक्ष्य रखा है. दौरे के दौरान कनाडाई कंपनी (Cameco) और भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग के बीच अगले 10 साल के लिए यूरेनियम आपूर्ति समझौते पर मुहर लगने की उम्मीद है. दोनों देशों ने पहले इस समझौते पर बातचीत पूरी कर चुके हैं.

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भारत ने 2025 में शांति अधिनियम के जरिए परमाणु क्षेत्र में सुधार किए हैं, जिनका उद्देश्य विदेशी तकनीकी कंपनियों को जोड़ना और आधुनिक रिएक्टरों की तैनाती तेज करना है. ऐसे में भरोसेमंद देश से लगातार यूरेनियम सप्लाई बेहद जरूरी है. यह समझौता 2015 के मुकाबले दस गुना बड़ा है और दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करता है.

सुरक्षा सहयोग: निज्जर विवाद से आगे का प्लान

सुरक्षा सहयोग के स्तर पर भी बदलाव देखा जा रहा है. कार्नी सरकार ने हाल में कहा है कि उन्हें विश्वास है कि भारतीय एजेंट कनाडा में किसी हिंसक गतिविधि में शामिल नहीं थे. भारत के एनएसए अजीत डोभाल और कनाडाई सुरक्षा सलाहकार के बीच कई बैठकें हुई हैं. नए ढांचे में संगठित अपराध, आतंकवाद, चरमपंथ और वित्तीय धोखाधड़ी पर सहयोग शामिल होगा. तहव्वुर राणा की नागरिकता रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया शुरू करना भी भारत के लिए सकारात्मक संकेत है. हालांकि, कनाडा सरकार का राणा की नागरिकता रद्द करने का कदम उसके खिलाफ आतंकवाद के आरोपों पर आधारित नहीं है.

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बदलता वर्ल्ड ऑर्डर और प्रवासन

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और संरक्षणवादी नीतियों ने कनाडा को व्यापारिक साझेदारों में विविधता लाने पर मजबूर किया है. कार्नी ने कहा है, "एक अनिश्चित दुनिया में, कनाडा उन चीजों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है जिन्हें वह नियंत्रित कर सकता है." इसका मतलब है कि कनाडा अब भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसी समान विचारधारा वाली शक्तियों के साथ मजबूत गठजोड़ बना रहा है.

प्रवासन और छात्रों का मुद्दा अभी भी संवेदनशील है. कार्नी सरकार ने 2026-2028 के लिए प्रवासन लक्ष्यों में कटौती की घोषणा की है. कनाडा में करीब 18 लाख भारतीय मूल के लोग और 10 लाख प्रवासी भारतीय इस रिश्ते की असली ताकत हैं. पंजाब यात्रा को छोड़ना कुछ लोगों को नागवार लग सकता है, लेकिन व्यापक दृष्टि से मजबूत संबंध दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं.

व्यावहारिक साझेदारी का नया अध्याय

मार्क कार्नी की भारत यात्रा 'व्यावहारिक साझेदारी' की शुरुआत हो सकती है. दोनों देशों ने समझ लिया है कि उनके आर्थिक और रणनीतिक हित किसी एक विवाद से कहीं बड़े हैं. पंजाब को दरकिनार कर मुंबई-दिल्ली आर्थिक धुरी पर ध्यान देना यह संकेत देता है कि कनाडा अब भारत के साथ एक संप्रभु राष्ट्र की तरह व्यवहार कर रहा है. यूरेनियम समझौता और सुरक्षा सहयोग इस नए विश्वास की नींव हैं.

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इंडो-पैसिफिक में बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच 70 अरब डॉलर का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन असंभव नहीं. कार्नी की यह यात्रा आने वाले दशक के लिए भारत-कनाडा संबंधों की दिशा तय कर सकती है, जहां आपसी सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक विकास प्राथमिकता में होंगे.

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