8 साल में पहली बार भारत ने ईरान से खरीदी कुकिंग गैस, LPG की खेप लेकर भारत आ रहा 'Sea Bird'

मिडिल ईस्ट जंग के चलते LPG संकट गहराने पर भारत ने 8 साल बाद ईरान से गैस खरीदी है. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने यह खेप खरीदी, जो 2018 के बाद पहली डील है. होर्मुज स्ट्रेट में संकट के चलते सप्लाई प्रभावित हुई, जिससे देश में गैस की कमी और कीमतों का दबाव बढ़ गया है.

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भारत ने आखिरी बार 2018 में ईरान से एनर्जी खरीद की थी. (Photo- India Today) भारत ने आखिरी बार 2018 में ईरान से एनर्जी खरीद की थी. (Photo- India Today)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 11:56 AM IST

मिडिल ईस्ट में जारी जंग का असर सीधे भारत की रसोई पर पड़ रहा है. गैस की बढ़ती कमी के बीच भारत ने एक बड़ा और अहम फैसला लिया है. करीब 8 साल बाद भारत ने ईरान से LPG यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस की खरीद की है. सरकारी तेल कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने यह खरीद की है, जिसमें उसके साथ भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम भी हिस्सेदारी कर रहे हैं.

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यह डील इसलिए खास है क्योंकि भारत ने आखिरी बार जून 2018 में ईरान से LPG खरीदी थी. उसके बाद अमेरिका के सख्त प्रतिबंधों की वजह से यह व्यापार लगभग बंद हो गया था. लेकिन अब हालात बदल गए हैं.

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दरअसल, मिडिल ईस्ट में जंग के चलते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का रास्ता प्रभावित हुआ है, जिससे दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ा है. भारत अपनी LPG की करीब दो-तिहाई जरूरत आयात से पूरी करता है और उसमें से 90% सप्लाई इसी क्षेत्र से आती है.

ऐसे में जब सप्लाई चेन टूटने लगी, तो देश में गैस की किल्लत बढ़ गई. कई जगह लोगों को मजबूरी में लकड़ी जलाकर खाना बनाना पड़ रहा है, तो कहीं LPG सिलेंडर के लिए लंबी लाइनें और झगड़े देखने को मिल रहे हैं.

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बताया जा रहा है कि इस बार भारत ने करीब 43 हजार टन LPG (ब्यूटेन और प्रोपेन) खरीदी है. हालांकि यह मात्रा भारत की सिर्फ आधे दिन की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन संकट के समय में यह भी बड़ी राहत मानी जा रही है.

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यह गैस Sea Bird नाम के जहाज के जरिए भारत लाई जा रही है, जो आज गुरुवार को मैंगलोर पोर्ट पर पहुंचने वाली है. दिलचस्प बात यह है कि यह जहाज पहले चीन की ओर जा रहा था, लेकिन रास्ते में दिशा बदलकर भारत की ओर मुड़ गया. इस बीच भारत दो और LPG खेप लाने की तैयारी में है, जिन पर बातचीत आखिरी चरण में है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक व्यापारिक फैसला नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक हालात में भारत की ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति का हिस्सा है. मिडिल ईस्ट की जंग ने यह साफ कर दिया है कि अगर होर्मुज जैसे अहम रास्ते बंद होते हैं, तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है, और भारत भी इससे अछूता नहीं है.

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