होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका-ईरान का डबल ब्लॉकेड, भारत पर क्या असर पड़ेगा?

अमेरिका और ईरान दोनों के होर्मुज स्ट्रेट पर कदम उठाने से दुनिया में तेल संकट गहरा गया है. भारत जैसे बड़े आयातक देश पर इसका क्या असर होगा और क्या सच में संकट बढ़ने वाला है, आसान भाषा में समझिए.

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होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका-ईरान दोनों ने पाबंदी लगा दी है. (Photo: Reuters) होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका-ईरान दोनों ने पाबंदी लगा दी है. (Photo: Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 16 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:03 PM IST

होर्मुज स्ट्रेट एक बार फिर वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है. पहले ईरान ने इस अहम समुद्री रास्ते पर पाबंदियां लगाईं और अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी यहां जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाने जैसा कदम उठाकर दुनिया को चिंता में डाल दिया. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसका असर भारत पर कितना पड़ेगा, जो अपने बड़े एनर्जी इंपोर्ट के लिए इसी स्ट्रेट पर निर्भर है.

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भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल बाहर से मंगाता है. इसमें से बड़ी मात्रा खाड़ी देशों से आती है और इसी होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते भारत पहुंचती हैं. यानी इस रूट के बाधित होने से भारत की सप्लाई चेन सीधे प्रभावित होती है.

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हालांकि, मौजूदा स्थिति थोड़ी अलग है. ईरान ने अपने नियंत्रण के बावजूद भारत जैसे कुछ देशों के जहाजों को गुजरने की छूट दी है. दोनों देशों के पुराने और अच्छे रिश्ते रहे हैं. भारत ने ईरान को किसी तरह की "टोल फीस" भी नहीं दी, जबकि कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया कि अन्य देशों के जहाजों ने सुरक्षित रास्ते के लिए टोल का भुगतान किया. इससे भारत को फिलहाल राहत मिली है.

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सप्लाई प्रभावित होने से तेल की कीमतें बढ़ीं

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक समस्या यहीं खत्म नहीं होती. अमेरिका का ब्लॉकेड एक नया जोखिम लेकर आया है. भले ही अमेरिकी सेना ने साफ किया कि सिर्फ ईरानी पोर्ट्स से जुड़े जहाजों को रोका जाएगा, लेकिन तनाव के माहौल में किसी भी वक्त हालात बदल सकते हैं. अगर हालात बिगड़ते हैं, तो पूरे क्षेत्र में फिर से शिपिंग प्रभावित हो सकती है.

रुकावटों का सबसे बड़ा असर तेल की कीमतों पर पड़ता है. जंग शुरू होने के बाद जैसे ही होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ा तो कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं. इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है, क्योंकि महंगा कच्चा तेल मतलब महंगा पेट्रोल-डीजल, रोजमर्रा की महंगाई और आम लोगों की जेब पर दबाव. पहले ही भारत में ईंधन की कीमतें एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रही हैं.

भारत के पास रूस एक विकल्प लेकिन यहां भी पेच

भारत के पास रूस के रूप में एक विकल्प भी है, जहां से सस्ता तेल खरीदा जा सकता है. लेकिन यहां भी एक पेच है. अमेरिका ने जो अस्थायी छूट दी थी, वह खत्म हो चुकी है. अगर भारत रूस से ज्यादा तेल खरीदता है, तो उसके अमेरिका के साथ रिश्तों पर असर पड़ सकता है, खासकर जब दोनों देशों के बीच ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत चल रही है.

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सरकार की तरफ से फिलहाल हालात नियंत्रण में बताई जा रही है. पेट्रोलियम मंत्रालय ने साफ किया है कि देश में LPG, CNG और PNG की सप्लाई पूरी तरह सुरक्षित है और कहीं कोई कमी नहीं है. सरकार ने शुरुआती दिनों में ही घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देने की रणनीति अपना ली थी, जिससे संकट को काफी हद तक टाला जा सका.

अभी भारत के लिए स्थिति "चिंताजनक लेकिन नियंत्रण में" है. अगर तनाव लंबे समय तक जारी रहता है या हालात और बिगड़ते हैं, तो असर गहरा हो सकता है. लेकिन फिलहाल भारत अपनी कूटनीति, विकल्पों और स्टॉक मैनेजमेंट के दम पर इस संकट से निपटने की कोशिश कर रहा है.

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