ईरान में फेल हुई US की 'गन पॉलिसी', ट्रंप बोले- प्रदर्शनकारियों को भेजी गई बंदूकें गायब

ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिशों के बीच अमेरिका की एक बड़ी रणनीति पर सवाल खड़े हो गए हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि प्रदर्शनकारियों तक भेजे गए हथियार अपने मकसद तक नहीं पहुंचे. इस पूरे घटनाक्रम ने बिचौलियों की भूमिका पर भी गंभीर संदेह खड़े कर दिए हैं.

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ईरान में बगावत भड़काने की US की कोशिश नाकाम, ट्रंप ने मानी अपनी विफलता. (File Photo: ITG) ईरान में बगावत भड़काने की US की कोशिश नाकाम, ट्रंप ने मानी अपनी विफलता. (File Photo: ITG)

aajtak.in

  • वाशिंगटन,
  • 07 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 6:08 PM IST

वेस्ट एशिया में जारी तनाव के बीच एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जिसने अमेरिकी युद्ध रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद माना है कि ईरान में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों को हथियार पहुंचाने की अमेरिकी कोशिश पूरी तरह नाकाम रही है.

राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका ने ईरानी प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए बहुत सारी बंदूकें भेजी थीं, ताकि वे सरकार के खिलाफ लड़ सकें. लेकिन हैरानी की बात यह रही कि ये हथियार उन तक पहुंच नहीं पाए. व्हाइट हाउस में ईस्टर कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने ये खुलासा किया है.

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उन्होंने कहा, "हमने बंदूकें भेजीं, बहुत सारी बंदूकें, लेकिन जिन लोगों के जरिए भेजी गईं, उन्होंने उनको अपने पास ही रख लिया." इस पूरे मामले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कुछ लोगों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी. ये हथियार कुर्द चैनलों के जरिए ईरान में पहुंचने थे. 

ट्रंप के बयान से संकेत मिलता है कि बिचौलियों ने इन्हें प्रदर्शनकारियों तक पहुंचाने के बजाय अपने पास ही रख लिया. हालांकि, ईरानी कुर्दिस्तान गठबंधन ने साफ इनकार किया है कि उन्हें अमेरिका से कोई हथियार मिला है. इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. 

क्या हथियार रास्ते में ही गायब हो गए? क्या ट्रंप के साथ धोखा हुआ? या फिर पूरी योजना ही जमीनी स्तर पर फेल हो गई? ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरानी लोग सरकार के खिलाफ उठ खड़े होना चाहते हैं, लेकिन उनके पास हथियार नहीं हैं और उन्हें कड़ी सजा का डर है. 

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डोनाल्ड ट्रंप ने यहां तक कहा कि यदि ईरानियों के पास हथियार होते, तो सरकार दो सेकंड में हार मान लेती. इस बयान ने विवाद खड़ा कर दिया. उन्होंने कहा कि ईरानी लोग बम गिरने की आवाज सुनना चाहते हैं, क्योंकि यह उनकी आजादी के लिए समर्थन का संकेत होता है. 

हालांकि, इस दावे की कोई स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है. ट्रंप ने यह भी कहा कि करीब 45 हजार प्रदर्शनकारी मारे गए हैं, लेकिन इस आंकड़े की भी किसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है. दूसरी तरफ, पाकिस्तान स्थित ईरानी दूतावास ने ट्रंप के दावों को सिरे से खारिज कर दिया.

उसने कहा कि ईरानी लोग कभी भी अपनी मातृभूमि के खिलाफ विदेशी ताकतों का साथ नहीं देंगे. दूतावास ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए अमेरिका की मंशा पर सवाल उठाए. यह पूरा मामला ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका और इजरायल के बीच जंग चरम पर है.

अमेरिका ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमले कर चुके हैं. ट्रंप इन कार्रवाइयों को ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के लिए जरूरी बताते रहे हैं. हालांकि, तमाम दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद ईरान में अंदरूनी हालात उम्मीद के मुताबिक नहीं बदले हैं. 

विशेषज्ञों का मानना है कि बाहरी दखल, खासकर हथियारों के जरिए विद्रोह भड़काने की कोशिशें, कई बार उल्टा असर डालती हैं. सत्ता के खिलाफ नैरेटिव को कमजोर कर देती हैं. ईरान की मजबूत सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय भावना भी इस बात की बड़ी वजह मानी जा रही है.

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