दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर के खिलाफ अमेरिकी मदद का एहसान चुकाते आ रहे यूरोपीय देश अब थक चुके हैं. दशकों तक दुनिया ने एक ही तस्वीर देखी कि जब भी अमेरिका ने युद्ध का बिगुल फूंका, नाटो के नाम पर यूरोपीय देश उसके पीछे ढाल बनकर खड़े हो गए. चाहे 1990 का खाड़ी युद्ध हो, 2001 का अफगानिस्तान हमला, या 2003 का इराक आक्रमण. पश्चिमी दुनिया हमेशा एक 'ब्लॉक' की तरह दिखी. लेकिन ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका और इजरायल खुद को एक कूटनीतिक आईलैंड पर खड़ा पा रहे हैं.
यूरोपीय नेताओं का यह सामूहिक पीछे हटना महज एक इत्तेफाक नहीं है. यह 'फॉल्ट लाइन' (दरार) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से धीरे-धीरे पक रही थी, जो अब ग्रीनलैंड विवाद और अमेरिका की 'एकला चलो' और 'अहं ब्रह्मास्मि' की नीति के कारण खुलकर सामने आ गई है.
सालभर पहले जब ट्रंप ने दूसरी बार अमेरिका का राष्ट्रपति पद संभाला तो उनके तेवर बदले हुए थे. वे गरज रहे थे कि अब यदि यूरोप को NATO में अमेरिका का साथ चाहिए तो अपनी जेब ढीली करनी होगी. वरना, अमेरिका अकेला काफी है दुनिया पर राज करने के लिए. यदि अमेरिका नाटो में है तो यूरोप को एहसान मानना चाहिए. वे बारी बारी से कई यूरोपीय देशों को अपने तेवर से बेइज्जत करते रहे. वेनेजुएला ऑपरेशन के बाद उनकी हिम्मत और बढ़ गई. टैरिफ पॉलिसी ने पहले ही यूरोप समेत पूरी दुनिया की इकोनॉमी को झकझोरा हुआ था. लेकिन जब ईरान युद्ध में ट्रंप की गणित गड़बड़ाया है तो यूरोपीय देश अमेरिका के बेलगाम नेतृत्व को उसकी हद बताने से गुरेज नहीं कर रहे हैं. इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में हिस्सा लेने आए तीन बड़े यूरोपीय देशों जर्मनी, इटली और स्पेन के राजदूतों ने ईरान युद्ध को लेकर अपने अपने देशों की पॉजिशन स्पष्ट की. जिसे अमेरिका समर्थक तो कतई नहीं कहा जा सकता.
1. जर्मनी: "हमारा हाथ युद्ध में नहीं होगा"
जर्मनी के राजदूत डॉ. फिलिप एकरमैन ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में जो कहा, वह बर्लिन की गहरी असुरक्षा को दर्शाता है. जर्मनी के लिए यह युद्ध 'अस्तित्व का संकट' है. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह हमारा युद्ध नहीं है. हम में से कोई नहीं चाहता था कि ईरान के पास परमाणु हथियार हों. लेकिन, अभी ईरान में जो हो रहा है वो भी समझ से परे है.
जर्मनी की अर्थव्यवस्था पहले से ही ऊर्जा संकट से जूझ रही है. एकरमैन ने स्पष्ट किया कि ईरान के साथ युद्ध का मतलब है यूरोप के लिए एनर्जी सुसाइड. जर्मनी का मानना है कि अमेरिका ईरान में उलझकर रूस को खुला मैदान दे रहा है. एकरमैन ने सवाल उठाया कि जब हमारे दरवाजे पर (यूक्रेन में) युद्ध चल रहा है, तो हम एक नए युद्ध में क्यों कूदें?
मैसेज: जर्मनी ने कैटेगोरिकल तरीके से कह दिया है कि वह अपनी सेना या हथियार ईरान युद्ध के लिए नहीं देगा.
2. इटली: "अंतर्राष्ट्रीय नियमों की धज्जियां नहीं उड़ा सकते"
इटली के राजदूत एंटोनियो बार्टोली के बयान ने अमेरिका को आईना दिखाया है. इटली, जो ऐतिहासिक रूप से वाशिंगटन का करीबी रहा है, अब 'अंतरराष्ट्रीय कानून' की दुहाई दे रहा है. बार्टोली ने कहा: "हम ये युद्ध नहीं चाहते. न तो हम अभी इसका हिस्सा हैं, और न होंगे." उन्होंने दो सूरत बताई. एक तो ईरान का परमाणु कार्यक्रम खतरा है, लेकिन दूसरा डरावना पहलू यह है कि उसे रोकने के लिए बिना सोचे-समझे किया गया हमला 'रूल बेस्ड ऑर्डर' को खत्म कर देगा.
सशर्त सहयोग: इटली ने साफ कर दिया है कि उसके सैन्य अड्डों का इस्तेमाल केवल 'लॉजिस्टिक' (खाने-पीने, दवा) के लिए होगा, न कि बमबारी करने वाले विमानों के लिए.
3. स्पेन: "इतिहास दोहराने की भूल नहीं"
स्पेन के राजदूत हुआन एंटोनियो मार्च पुयो ने सबसे भावुक और कड़ा तर्क दिया. उन्होंने इसे 'रूस-यूक्रेन' जैसी तबाही का दोहराव बताया. स्पेन ने न केवल इजरायल से अपना राजदूत वापस बुलाया, बल्कि प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने इसे "flagrant illegality" (घोर अवैधता) करार दिया. स्पेन का नारा साफ है कि "युद्ध को नहीं, शांति को मौका दो."
4. फ्रांस और ब्रिटेन: वफादारी का संकट
फ्रांस ने हमेशा अपनी सैन्य स्वायत्तता बनाए रखी है. लेकिन वह सभी बड़े युद्धों में अमेरिका के साथ दिखाई दिया है. अब राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन के तेवर बदले हुए लग रहे हैं. उन्होंने दो टूक कहा- 'ईरान पर यूएस स्ट्राइक इंटरनेशनल लॉ के दायरे से बाहर है… पेरिस इसे अप्रूव नहीं कर सकता." फ्रांस ने गल्फ के नजदीक अपने वॉरशिप और लड़ाकू विमान तैनात तो किए हैं, लेकिन वे हमले के लिए नहीं, बल्कि अपने हितों की रक्षा के लिए हैं. मैक्रॉन ने संकेत दिया कि फ्रांस की स्थिति पूरी तरह डिफेंसिव है. बावजूद इसके कि ईरान सीमा के नजदीक इर्बिल में स्थित फ्रेंच बेस पर ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमले में एक फ्रांसीसी सैनिक मारा गया है और कई घायल हुए हैं.
वहीं ब्रिटेन, जो अमेरिका का सबसे वफादार 'जूनियर पार्टनर' माना जाता था, वह भी इस बार हिचकिचा रहा है. प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने स्पष्ट कहा कि हम ईरान पर हुए शुरुआती हमले में शामिल नहीं थे और न ही अभी हमारी इसमें शामिल होने की कोई योजना है. डिएगो गार्सिया के सैन्य अड्डे का इस्तेमाल करने की अनुमति देने में शुरू में देरी (और बाद में आंशिक सहमति) इस बात का सबूत है कि लंदन अब वाशिंगटन के हर आदेश पर तुरंत 'हां' नहीं कह पा रहा. ब्रिटेन में जनता का दबाव और आर्थिक मंदी ने सरकार के हाथ बांध दिए हैं.
5. नाटो (NATO): केवल एक रबर स्टैंप?
नाटो के भीतर आज भारी खलबली है. महासचिव मार्क रुट्टे ने संतुलन बनाने की कोशिश की. "अमेरिका जो ईरान में कर रहा है वह जरूरी है. लेकिन नाटो को इसमें घसीटने का अभी कोई प्लान नहीं है." नाटो की भूमिका अब केवल अपने सदस्य देशों की सीमाओं और अड्डों की सुरक्षा तक सीमित हो गई है. वह ईरान के खिलाफ 'ऑफेंसिव' ऑपरेशन में शामिल होने से बच रहा है. रुट्टे ने जोड़ा: "NATO will defend every inch of its territory".
डोनाल्ड ट्रंप के चुभते हुए सवाल और हमले
डोनाल्ड ट्रंप को नाटो और यूरोप देशों के रवैये का अंदाजा पहले ही हो गया था, इसलिए उन्होंने कुछ महीने पहले ही कहा था: "हम तो नाटो के लिए सौ फीसदी खड़े रहेंगे, लेकिन मुझे नहीं लगता कि जब हम उन्हें बुलाएंगे तो वे आएंगे. "
ट्रंप ने स्पेन और ब्रिटेन पर सीधा हमला बोलते हुए कहा: "स्पेन टैरिबल है... हम उससे सभी ट्रेड संबंध तोड़ने जा रहे हैं. हमें अब स्पेन से कुछ नहीं चाहिए." ब्रिटेन पर: "हम लोग जिनसे डील कर रहे हैं ये 'विंस्टन चर्चिल नहीं हैं... यूके का रवैया बहुत ही ज्यादा असहयोगात्मक रहा है." और नाटो पर चुभता सवाल दोहराया: "जब वाकई में जरूरत पड़ेगी, तो क्या नाटो लड़ेगा या केवल हिचकिचाएगा?"
यह सवाल यूरोप के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है. ट्रंप का तर्क है कि अगर यूरोप आज ईरान के खिलाफ अमेरिका के साथ नहीं है, तो कल जब यूरोप पर संकट आएगा, तो अमेरिका क्यों साथ दे?
ग्रीनलैंड विवाद ने यूरोप की आंखें खोल दी
अमेरिका के प्रति यूरोप की बेरुखी यूं ही नहीं है. इसके पीछे 'ग्रीनलैंड विवाद' की एक बड़ी भूमिका है. जब अमेरिका ने अपने NATO साथी और एक संप्रभु राष्ट्र (डेनमार्क) के हिस्से ग्रीनलैंड को खरीदने या कब्जा करने की बात की, तो पूरे यूरोप को अहसास हुआ कि अमेरिका अब 'साझेदार' नहीं, बल्कि 'मालिक' की तरह व्यवहार कर रहा है. इसने यूरोप को मजबूर किया कि वह अमेरिका की रणनीतिक नीतियों के साथ आंख मूंदकर चलना बंद करे.
फॉल्ट लाइन: WW2 से आज तक
यूरोप और अमेरिका के बीच का यह संघर्ष केवल ईरान को लेकर नहीं है. यह उस 'फॉल्ट लाइन' 1945 से बन रही थी. पहले सोवियत संघ और अब रूस के नाम का 'दानव' खड़ा करके अमेरिका ने यूरोप को अपने पक्ष में तो ले लिया, लेकिन उसके बदले यूरोप ने जो कीमत चुकाई वह बहुत बड़ी थी.
इराक और अफगानिस्तान का बोझ: यूरोप ने इन युद्धों के बाद शरणार्थी संकट और आतंकवाद के रूप में झेला है. अब वे किसी और 'अमेरिकी एडवेंचर' का हिस्सा बनकर खुद को तबाह नहीं करना चाहते.
मल्टीपोलर वर्ल्ड: यूरोप अब समझ चुका है कि दुनिया बदल गई है. जब ट्रंप एक ओर टैरिफ की दादागिरी दिखा रहे हैं तो रूस, चीन और भारत जैसे देशों की मौजूदगी ने यूरोप को अपनी स्वतंत्र राह (Strategic Autonomy) चुनने की ताकत दी है. यही कारण है कि अमेरिका से नाराज यूरोपियन यूनियन 20 साल से पेंडिंग रहे फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर भारत के साथ साइन कर लेता है.
इकोनॉमिक शॉक: युद्ध से सिवाय अमेरिकी और कुछ यूरोपीय वेपन इंडस्ट्री के अलावा किसी का भला नहीं हुआ है. पहले गल्फ वॉर, फिर यूक्रेन और अब ईरान पर हमले के बाद पता चल रहा है कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था किस तरह तबाह हो रही है. ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस और इंसानी जान-माल का सत्यानाश तो है ही.
एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की आहट
ईरान युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि 'पश्चिमी एकता' अब एक मिथक बन चुकी है. अमेरिका और इजरायल सैन्य रूप से भले ही शक्तिशाली हों, लेकिन कूटनीतिक रूप से वे इस समय अकेले हैं. ट्रंप के हमले और यूरोपीय नेताओं के बयान (मैक्रॉन का "outside international law", स्टार्मर का "no offensive action", रुट्टे का "no plans for NATO") साफ संदेश देते हैं कि यूरोप अब अमेरिका के हर युद्ध का 'परमानेंट सोल्जर' नहीं बनना चाहता. यूरोपीय नेताओं का यह संदेश साफ है: "वे अमेरिकी युद्ध की कीमत जानते हैं, जिसे वे नहीं चुकाना चाहते."
यूरोप ने अपनी पोजिशन क्लियर कर दी है, लेकिन इस कहानी का दूसरा चैप्टर अभी बाकी है. देखना दिलचस्प होगा कि जब ट्रंप ईरान युद्ध से फ्री होंगे तब यूरोप और नाटो के साथ क्या सुलूक करेंगे.
चलते-चलते: ट्रंप रोज दंभ भर रहे हैं कि वे ईरान को एकतरफा हरा रहे हैं. उसकी नेवी और एयरफोर्स जीरो हो गई है. लेकिन, होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की नाकेबंदी के आगे उनकी एक नहीं चल पा रही है. पूरी दुनिया की यह तेल लाइफलाइन ईरान ने काट दी है, और ट्रंप की बेचारगी देखिए. वे ट्रुथ सोशल पर अपनी ताजा पोस्ट में लिखते हैं कि चीन, फ्रांस, जापान, साऊथ कोरिया, यूके और दूसरे देशों को अपने जहाज भेजने चाहिए ताकि होर्मुज स्ट्रेट को जहाजों के आवागमन के लिए खुला रखा जा सके. अमेरिका इतनी दयनीय स्थिति में कभी नहीं था. ईरान युद्ध से यूरोप ने तो किनारा कर ही लिया है, लगातार ईरानी हमले झेल रहे खाड़ी देश भी ट्रंप को लेकर मुंह पर अंगुली रखे हुए हैं.
धीरेंद्र राय