दुनिया की राजनीति में कभी-कभी ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जो हैरान कर देती हैं. आजकल पाकिस्तान के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. एक तरफ पाकिस्तान खुद को पूरी दुनिया के सामने एक शांतिदूत के तौर पर दिखा रहा है, जो अमेरिका और ईरान के बीच चल रही भीषण जंग को रोकने की कोशिश कर रहा है. लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह है कि पाकिस्तान के अपने घर में आग लगी है और अफगानिस्तान के साथ उसकी अपनी जंग खत्म होने का नाम नहीं ले रही. मजे की बात यह है कि दूसरों की सुलह कराने वाला पाकिस्तान, खुद की जंग को शांत करने के लिए अब चीन के सामने हाथ फैलाए खड़ा है.
पाकिस्तान और उसकी हाइब्रिड सरकार आजकल पूरी दुनिया में यह ढिंढोरा पीट रही है कि वो मिडिल ईस्ट की जंग रुकवाने वाले सबसे बड़े शांतिदूत हैं. दावा तो यहां तक किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन घुमाया और ईरान पर होने वाले हमले को ऐन वक्त पर रुकवा दिया. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू बहुत कड़वा है. एक तरफ जहां इस्लामाबाद अपनी इस बिचौलिए वाली भूमिका का जश्न मना रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने घर में एक ऐसी आग लगी है जिसे पाकिस्तान खुद नहीं बुझा पा रहा. यह जंग है अफगानिस्तान के साथ, जहां डूरंड लाइन पर आए दिन गोलियां चल रही हैं, धंधा-पानी चौपट है और सैकड़ों सैनिक व आम लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.
हैरानी की बात तो देखिए, जो पाकिस्तान वॉशिंगटन और तेहरान के बीच सुलह कराने की बातें कर रहा है, उसे खुद अपने पड़ोसी अफगानिस्तान से बात करने के लिए चीन का सहारा लेना पड़ रहा है. जिस वक्त ट्रंप ने हमले की डेडलाइन से महज 90 मिनट पहले बमबारी रोकने का ऐलान किया और पाकिस्तान इसे अपनी बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत बताने में जुट गया, ठीक उसी समय चीन के उरुमकी शहर में पाकिस्तान के अपने वजूद की लड़ाई पर चर्चा चल रही थी. पाकिस्तान के जानकार भले ही इसे उसकी साख और जिम्मेदारी का सबूत कहें, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि अपनी ही सरहद पर हालात उसके काबू से बाहर हो चुके हैं.
दरअसल, पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार टीटीपी (TTP) जैसे आतंकियों को पनाह दे रही है, जो पाकिस्तान के अंदर घुसकर हमले करते हैं. अफगानिस्तान इन बातों को हमेशा की तरह सिरे से नकार देता है. इसी खींचतान में पिछले कुछ महीनों में हालात इतने बदतर हो गए कि दोनों देशों के बीच सीधी भिड़ंत शुरू हो गई.
दूसरों का घर बचाने चले, पर अपना आंगन ही जल रहा है
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच यह झगड़ा पिछले एक साल में बहुत ज्यादा बढ़ गया है. हालात इतने बिगड़े कि पिछले महीने पाकिस्तान ने काबुल और नंगरहार में हवाई हमले कर दिए. तालिबान ने दावा किया कि इन हमलों में एक अस्पताल को निशाना बनाया गया, जिसमें करीब 400 से ज्यादा बेगुनाह लोग मारे गए. इसके जवाब में अफगान सेना ने भी पाकिस्तानी चौकियों पर हमला बोल दिया. पाकिस्तान ने भी पलटवार करते हुए 'ऑपरेशन गजब लिल हक' शुरू किया और उनके रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने तो यहां तक कह दिया कि अब यह आर-पार की खुली जंग है.
जब यह जंग पाकिस्तान के काबू से बाहर होने लगी, तब जाकर चीन को बीच में उतरना पड़ा. असल में चीन की अपनी कुछ मजबूरियां हैं, उसके अरबों रुपयों का निवेश और 'बेल्ट एंड रोड' जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स इन दोनों देशों में चल रहे हैं. चीन को डर है कि अगर ये दोनों पड़ोसी आपस में भिड़ गए, तो उसका सारा पैसा डूब जाएगा. इसी नुकसान से बचने के लिए चीन ने दोनों देशों को उरुमकी बुलाया. वहां सात दिनों तक चली लंबी बातचीत के बाद, चीन दोनों पक्षों को इस बात पर राजी करने में कामयाब रहा कि फिलहाल वे इस लड़ाई को और आगे नहीं बढ़ाएंगे.
अब स्थिति यह है कि पाकिस्तान लिखित में गारंटी देने को तैयार है कि वह व्यापार के रास्ते नहीं रोकेगा, वहीं तालिबान ने भी भरोसा दिया है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ नहीं होने देगा. यह वाकई अजीब स्थिति है, जो पाकिस्तान दुनिया के सामने पीसमेकर बनकर अपनी धाक जमाना चाह रहा है, उसे अपनी सरहद पर शांति बनाए रखने के लिए चीन के आगे हाथ फैलाना पड़ रहा है. एक तरफ वो अमेरिका-ईरान की जंग रुकवाने का क्रेडिट ले रहा है, तो दूसरी तरफ चीन उसे अफगानिस्तान से भिड़ने से रोक रहा है.
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