युद्ध क्षेत्र में सबसे पहली सीख यही मिलती है कि खामोशी कभी सचमुच खामोश नहीं होती. वह भीतर कहीं गूंजती रहती है- तनाव से भरी, किसी भी पल टूटने को तैयार. पंद्रह दिनों तक यही गूंज मेरी जिंदगी का हिस्सा रही, जब मैं लेबनान में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच संघर्ष के मोर्चे से रिपोर्टिंग कर रहा था.
हर सुबह एक जैसी शुरू होती थी- यह देखने से कि रात ने हमें बख्शा या नहीं. सहकर्मियों के संदेश, परिवार की मिस्ड कॉल्स, और नए हमलों की सूचनाएं. फिर तैयारी का वही क्रम- हेलमेट, फ्लैक जैकेट, माइक और कैमरा- ऐसे औजार जो मेरे काम के लिए जरूरी भी थे और अपर्याप्त भी लगते थे.
टेलीविजन जर्नलिज्म तत्परता मांगती है. यह सुरक्षा का इंतजार नहीं करती और न ही हिचकिचाहट को बर्दाश्त करती है. जब बमबारी शुरू होती, हम भागते नहीं थे. हम हमले वाली जगह के और करीब जाते थे, सही एंगल तलाशते हुए, तबाही को फ्रेम करते हुए, और मजबूत सिग्नल की तलाश में रहते थे, ताकि दुनिया को हकीकत दिखा सकें. विडंबना यह थी कि जब बाकी लोग शेल्टर ढूंढते थे, हम और क्लियर एंगल की तलाश में होते थे.
चुनौतियां लगातार बनी रहीं. लाइव जाने से ठीक पहले नेटवर्क चला जाता. जिन रास्तों से हम एक घंटे पहले गुजरे होते, वे अचानक मलबे में तब्दील हो जाते या नए हमलों के बाद खतरनाक घोषित कर दिए जाते. कभी छतों से तो कभी बेसमेंट से ब्रॉडकास्ट करना पड़ता- सिग्नल और सिक्योरिटी, दोनों में तालमेल साधते हुए.
कई बार ऐसा लगा कि पत्रकारिता से ज्यादा अहम जीवित रहना है. तोप के गोलों की आवाज सोचने का मौका नहीं देती. वह आपको तुरंत फैसला लेने पर मजबूर करती है- मौके पर रुककर रिपोर्ट करें या वहां से दूर हटकर अपनी जान बचाएं. फिर भी, कैमरा चलता रहा. क्योंकि कहानी, सच... वहीं सामने घटित हो रही थी, और दुनिया को उसे देखना जरूरी था.
डर हमेशा साथ रहा, लेकिन समय के साथ उसका रूप बदल गया. शुरुआत में वह तेज और जकड़ लेने वाला था. बाद में वह शांत, लगभग व्यावहारिक हो गया- फैसलों को दिशा देने वाला. असल में जो चीज दिलो-दिमाग पर भारी थी, वह थी इंसानी त्रासदी को करीब से देखना- रातों-रात उजड़े परिवार, कम उम्र में युद्ध की भाषा सीखते बच्चे, और चेहरों पर उभरी पीड़ा, सदमा और अद्भुत सहनशक्ति, जिन्हें शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है.
एक शाम, जब हम लाइव जाने की तैयारी कर रहे थे, कहीं दूर हुए धमाकों से आसमान चमक उठा. प्रोड्यूसर की आवाज ईयरपीस में गूंजी- 'पांच सेकंड में आप लाइव हैं.' उस पल सब कुछ सिमट गया- शोर, खतरा, थकान और बस कैमरा और उसकी जिम्मेदारी रह गई. उस वक्त मैंने सिर्फ एक पत्रकार नहीं, बल्कि एक प्रत्यक्षदर्शी के रूप में बात की.
युद्ध क्षेत्र में पंद्रह दिन समय की समझ बदल देते हैं. घंटे लंबे लगते हैं, दिन धुंधले हो जाते हैं, लेकिन हर सेकंड अहम लगता है. जीवन को आप नए पैमानों से मापने लगते हैं- सुरक्षित पलों से, मैं ठीक हूं जैसे संदेशों से, और हमलों के बीच मिलने वाली थोड़ीसी खामोशी से.
दिलचस्प बात यह रही कि लेबनान में शिया मुसलमानों ने ईद-उल-फितर ईरान के साथ मनाई, जबकि सुन्नी मुसलमानों ने एक दिन पहले खाड़ी देशों के साथ ईद मनाई. एक दिन पहले मेरे लिए भी ईद का दिन था- एक तरफ ग्राउंड रिपोर्ट भेजनी थी, दूसरी तरफ नमाज अदा करनी थीत्र मैंने अपने ट्रांसलेटर से पूछा कि नमाज पढ़ना कहां सुरक्षित रहेगा. उसने सेंट्रल बेरूत की हरीरी मस्जिद का सुझाव दिया. वहीं जाकर नमाज अदा की और उसी जगह से ईद की रिपोर्ट भी भेजी.
रमजान के बाद पहली बार खाने के लिए किसी जगह की तलाश की. कई रेस्टोरेंट बंद थे या मॉर्निंग सर्विस नहीं दे रहे थे. आखिरकार बेरूत के पूर्वी हिस्से में जाकर हमने लेबनानी खाना खाया- जो पूरी तरह शाकाहारी था, एक ऐसे शख्स के लिए जो ईद पर आमतौर पर मांसाहारी भोजन करता है.
युद्ध के दौरान पत्रकारों के लिए सुरक्षित ठिकाना ढूंढना भी बेहद मुश्किल होता है. इसलिए मैंने समुद्र तट के पास एक अपेक्षाकृत सुरक्षित होटल में ठहरने का फैसला किया, जहां ज्यादातर बाहरी लोग रहते हैं. बेरूत के कई होटल विस्थापित लोगों से भरे हुए थे. यही कारण था कि कुछ होटलों में हिज्बुल्लाह और आईआरजीसी के सदस्यों को निशाना बनाकर हमले भी हुए. सेंट्रल बेरूत का होटल रमाडा भी निशाने पर रहा. वहां मुझे कमरा नहीं मिल सका, क्योंकि वह विस्थापित लोगों से पूरी तरह भरा हुआ था. मैं 2024 के युद्ध के दौरान इसी होटल में 10 दिन रुका था.
जब लोग टीवी पर युद्ध देखते हैं, तो उन्हें सिर्फ इसके छोटे-छोटे हिस्से दिखाई देते हैं... क्लिप्स, हेडलाइंस, संपादित कहानियां. लेकिन वे नहीं देख पाते कि हर फ्रेम के पीछे कितनी अनिश्चितता होती है, हर कदम के पीछे कितना सोच-विचार होता है, और रिपोर्टिंग और खुद कहानी का हिस्सा बन जाने के बीच कितना महीन फर्क होता है.
यह सिर्फ कवरेज नहीं था, यह एक परीक्षा थी- हौसले की, धैर्य की, और अपने मकसद के प्रति समर्पण की. डर के बीच उद्देश्य को बनाए रखने की कोशिश थी. यह उन कहानियों को सामने लाने की जिम्मेदारी थी जो दर्दनाक, जरूरी और बेहद अहम हैं. और सबसे बढ़कर, यह एक याद दिलाने वाला अनुभव था कि तबाही के बीच पत्रकार का काम सिर्फ जानकारी देना नहीं, बल्कि हर हाल में सच का गवाह बनना होता है, चाहे इसकी कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े.
अशरफ वानी