बंगाल में कुर्बानी के लिए गाय पालने वाले अब पछता रहे! शुभेंदु सरकार की सख्ती का असर

बंगाल में 1950 के पशु वध कानून को सख्ती से लागू किए जाने से सांकराइल के खटाल मालिक आर्थिक संकट में आ गए हैं. बकरीद से पहले पशु बेचने की परंपरा पर रोक लगने से खरीदार अग्रिम राशि वापस मांग रहे हैं. पशुपालकों ने मुख्यमंत्री से इस वर्ष राहत देने की मांग की है. प्रशासन ने कहा कि प्रक्रिया पूरी तरह कानून के अनुसार ही चलेगी.

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मुख्यमंत्री से राहत की मांग. (File Photo:PTI) मुख्यमंत्री से राहत की मांग. (File Photo:PTI)

बैधनाथ झा

  • हावड़ा ,
  • 20 मई 2026,
  • अपडेटेड 9:23 PM IST

पश्चिम बंगाल में पशु वध कानून को सख्ती से लागू किए जाने के बाद सांकराइल क्षेत्र के खटाल संचालकों के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है. नई सरकार के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद वर्ष 1950 के पशु वध कानून को सख्ती से लागू किए जाने से उन लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं, जो वर्षों से गाय और भैंसों का पालन कर अपने व्यवसाय का संचालन करते रहे हैं. खटाल मालिकों का कहना है कि कानून के अचानक सख्ती से लागू होने के कारण वे इसके लिए पहले से तैयार नहीं थे और अब उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.

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सांकराइल ब्लॉक के यदुनाथ हाथी महाश्मशान क्षेत्र के आसपास लंबे समय से कई खटाल संचालित होते आ रहे हैं. यहां के संचालकों के अनुसार हर साल बकरीद से पहले ऐसे पशुओं को बेचा जाता था जो दूध देना बंद कर चुके होते थे या जिनकी प्रजनन क्षमता समाप्त हो चुकी होती थी. इन पशुओं की बिक्री से मिलने वाली रकम से नए पशु खरीदे जाते थे और इसी चक्र से उनका व्यवसाय चलता था.

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लेकिन नई सरकार बनने के कुछ ही दिनों बाद पशु वध कानून को सख्ती से लागू कर दिए जाने से पूरी व्यवस्था अचानक बदल गई. कई खटाल मालिक पहले ही खरीदारों से अग्रिम राशि ले चुके थे, लेकिन अब कानूनी प्रतिबंधों के कारण पशुओं की बिक्री संभव नहीं हो पा रही है. परिणामस्वरूप खरीदार अपनी अग्रिम राशि वापस मांग रहे हैं और खटाल संचालकों पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है.

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बढ़ता आर्थिक बोझ और चिंता

एक खटाल मालिक ने बताया कि जिन गायों को बेचने की योजना थी वे अब न तो दूध देती हैं और न ही उनकी प्रजनन क्षमता बची है. इसके बावजूद उनके चारे और इलाज का खर्च लगातार बढ़ रहा है. यदि इन पशुओं को बेचना संभव नहीं हुआ तो अतिरिक्त खर्च उठाना उनके लिए बेहद मुश्किल हो जाएगा.

खटाल संचालकों का कहना है कि वे वर्षों से इसी व्यवस्था के तहत अपना व्यवसाय चलाते आए हैं. अचानक कानून के सख्त अमल से उनके सामने आय का मुख्य स्रोत ही बंद हो गया है. उनका कहना है कि इस स्थिति में उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आगे व्यवसाय कैसे चलाया जाए और पशुओं के रखरखाव का खर्च कैसे उठाया जाए.

इसी कारण खटाल मालिकों ने पश्चिम बंगाल सरकार और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से अपील की है कि इस वर्ष की परिस्थितियों को देखते हुए कानून में कुछ राहत दी जाए. उनका कहना है कि वे अगले वर्ष से पूरी तरह सरकारी नियमों का पालन करने के लिए तैयार हैं, लेकिन फिलहाल उन्हें राहत की आवश्यकता है.

प्रशासन और संगठनों का दबाव

खटाल संचालकों का आरोप है कि राज्य में सरकार बदलने के बाद विभिन्न हिंदू संगठनों और प्रशासन की ओर से दबाव बढ़ गया है. दूसरी ओर, जिन खरीदारों ने अग्रिम भुगतान किया था वे अपनी रकम वापस मांग रहे हैं. दोनों तरफ से बढ़ते दबाव के कारण खटाल मालिक खुद को बेहद मुश्किल स्थिति में पा रहे हैं.

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इस पूरे मामले पर सांकराइल पंचायत समिति की अध्यक्ष सोनाली दास ने कहा कि विभिन्न पंचायत क्षेत्रों से इस तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं. उनका कहना है कि कानून का पालन करना आवश्यक है, लेकिन अचानक हालात बदलने से खरीदार और विक्रेता दोनों ही परेशान हो गए हैं और इस मुद्दे को सरकार के सामने रखा जाएगा.

वहीं, सांकराइल के बीडीओ डॉ. कामरुल मुनिर ने स्पष्ट किया कि कानून में जो प्रावधान है उसके बाहर कुछ भी संभव नहीं है और पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार ही चलेगी.

भविष्य की संभावित समस्या और उम्मीदें

खटाल मालिकों का कहना है कि यदि सरकार इन पशुओं के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं करती और वे आर्थिक बोझ के कारण पशुओं को सड़क पर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं, तो इससे नई समस्या पैदा हो सकती है. उनका मानना है कि इस स्थिति से शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा पशुओं की समस्या बढ़ सकती है.

इसी कारण उन्होंने सरकार से विशेष व्यवस्था करने की मांग की है, ताकि उन्हें आर्थिक राहत मिल सके और पशुओं के लिए भी उचित समाधान निकाला जा सके. अब सभी की नजर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के फैसले पर टिकी हुई है कि सरकार खटाल मालिकों की इस अपील पर क्या कदम उठाती है.

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