''क्या मां गंगा से मिलने के लिए परमिशन लेंगे, क्षमा नहीं किया जा सकता...', प्रयागराज माघ मेला स्नान विवाद पर फिर बोले शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद

प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या पर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच भारी विवाद हो गया. भीड़ के दबाव के कारण रोके जाने और अनुयायियों के साथ हुई धक्का-मुक्की से नाराज शंकराचार्य बिना स्नान किए वापस लौट आए और धरने पर बैठ गए. अब उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशासन व सरकार पर तीखा हमला बोला है.

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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद. (File Photo: ITG) शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद. (File Photo: ITG)

संतोष शर्मा / समर्थ श्रीवास्तव / पंकज श्रीवास्तव

  • प्रयागराज ,
  • 19 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:49 PM IST

प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के मुख्य स्नान पर्व पर संगम तट पर उस समय अफरा-तफरी मच गई जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को पुलिस ने रोक दिया. स्वामी जी सुबह 9 बजे करीब 200 अनुयायियों के साथ रथ और पालकी लेकर संगम नोज पहुंचे थे, लेकिन प्रशासन ने अत्यधिक भीड़ का हवाला देकर उन्हें रथ से उतरकर पैदल जाने को कहा. इस दौरान समर्थकों और पुलिस के बीच तीखी झड़प और धक्का-मुक्की हुई. शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने अनादि काल से चली आ रही परंपरा को खंडित किया है.

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'क्या मां गंगा से मिलने के लिए परमिशन चाहिए?'

सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर शंकराचार्य ने प्रशासन के परमिशन के तर्क पर कड़ा प्रहार किया. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी साधु-संत या सनातनी को गंगा स्नान के लिए अनुमति लेनी होगी. स्वामी जी ने कहा कि क्या कोई बच्चा अपनी मां से मिलने के लिए अनुमति लेता है. उन्होंने प्रशासन पर परंपरा को खंडित करने का आरोप लगाते हुए कहा कि माघ मेले में अनादि काल से सम्मान के साथ स्नान की परंपरा रही है, जिसे अपमानित किया गया है.

संतों के साथ दुर्व्यवहार पर उठे सवाल

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार के अधीन मेला प्रशासन संतों और बटुकों के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे हमेशा नियम का पालन करते आए हैं और आगे भी करेंगे, लेकिन परंपराओं के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.फिलहाल इस घटना के बाद मेले में आए साधु-संतों और श्रद्धालुओं के बीच यह विवाद चर्चा का विषय बना हुआ है.

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'पानीपत युद्ध जैसी स्थिति'

शंकराचार्य ने एक बटुक का खून से सना दुपट्टा दिखाते हुए दावा किया कि पुलिस ने बुजुर्ग संतों को जूतों से मारा और नेपाल से आए संत की चोटी पकड़कर पिटाई की. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पालकी का शौक नहीं है, बल्कि भीड़ प्रबंधन और परंपरा के लिए वे पालकी का उपयोग करते हैं ताकि भगदड़ न हो. शंकराचार्य ने कहा, "हम गंगा स्नान के लिए परमिशन नहीं लेंगे; क्या बच्चा मां से मिलने की इजाजत लेगा?" उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन ने साजिश के तहत उन्हें समर्थकों से दूर करने की कोशिश की, जिससे 1762 के पानीपत युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती थी. स्वामी जी ने इसे 'चापलूसी करने वाले' और 'सत्य बोलने वाले' संतों के बीच का भेदभाव करार देते हुए मेला प्रशासन को तुरंत बदलने की मांग की.

पुलिस प्रशासन का पक्ष और बैरिकेड विवाद

वहीं, प्रयागराज पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार के अनुसार, संगम नोज पर उस समय लाखों की संख्या में बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग मौजूद थे. उन्होंने बताया कि सुरक्षा के मद्देनजर वीवीआइपी स्नान पर रोक थी और स्वामी जी से केवल पैदल जाने का अनुरोध किया गया था. उधर, बैरिकेड तोड़ने के आरोप पर शंकराचार्य ने सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की मांग की है. उनका कहना है कि वे प्रशासन के साथ ही निकले थे और पुलिस ने ही वार्ता कर बैरिकेड खुलवाए थे.

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संगम तट पर हंगामा और धक्का-मुक्की

गौरतलब है कि बीते रविवार को शंकराचार्य का जुलूस करीब डेढ़ घंटे तक रुका रहा. पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कुछ अनुयायियों को जीप में बैठा लिया, जिससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके लोगों के साथ मारपीट की गई और उनके धार्मिक 'छत्र' को भी तोड़ दिया गया. प्रशासन की कार्रवाई से असंतुष्ट होकर शंकराचार्य वहीं धरने पर बैठ गए और बिना संगम स्नान किए वापस चले गए.

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