उत्तर प्रदेश की नोएडा पुलिस ने हाल ही में हुई हिंसा के मामले में एक बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है. इस पूरी साजिश के पीछे 'मजदूर बिगुल दस्ता' नाम का एक संगठन सामने आया है, जिसने मजदूरों के हक की आड़ लेकर दिल्ली-एनसीआर में बड़े पैमाने पर हिंसा की योजना बनाई थी. गिरफ्तार आरोपी आदित्य आनंद और रूपेश से हुई पूछताछ में यह साफ हुआ है कि नोएडा, गुरुग्राम और दिल्ली के मजदूर आंदोलनों को एक ही जगह से कंट्रोल किया जा रहा था. इस संगठन का मुख्य मकसद सिर्फ प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि पूरे शहर की रफ्तार रोककर 'चक्का जाम' जैसे हालात पैदा करना था.
जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस नेटवर्क की कड़ियां लखनऊ के 'कामरेड अरविंद मेमोरियल ट्रस्ट' से जुड़ी हैं. इसी ट्रस्ट के जरिए कई अलग-अलग संगठन चलाए जा रहे हैं, जो नौजवानों, छात्रों और महिलाओं को अपने साथ जोड़ते हैं. इनमें RWPI, नौजवान भारत सभा, दिशा और स्त्री मुक्ति लीग जैसे नाम शामिल हैं. ये सभी ग्रुप अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय तो हैं, लेकिन इनका एजेंडा एक ही है. पुलिस को छापेमारी के दौरान आदित्य के ठिकाने से जो दस्तावेज मिले हैं, उनसे पता चलता है कि फरवरी 2026 में ही बड़े स्तर पर लेबर स्ट्राइक की स्क्रिप्ट लिख दी गई थी. साजिश ऐसी थी कि कंपनियों के नाम पर व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए और उनके जरिए लोगों को हिंसा के लिए तैयार किया गया.
इस पूरी साजिश का 'कंट्रोल रूम' नोएडा का पॉश इलाका अरुण विहार था. यहां आदित्य आनंद एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल के घर में किराएदार बनकर रह रहा था. दुनिया की नजरों में वह एक नामी IT कंपनी का चमकता हुआ कर्मचारी था, जिसकी महीने की सैलरी लाख रुपये थी. लेकिन बंद कमरों के पीछे, वह इसी मोटी कमाई को इस खतरनाक नेटवर्क की जड़ों में पानी देने के लिए इस्तेमाल कर रहा था. उसकी सोच कितनी जहरीली थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूछताछ के दौरान एक आरोपी ने जांच एजेंसियों की आंखों में आंखें डालकर सीधे सरकार के 'ऑपरेशन कगार' को चुनौती दे डाली. नक्सलियों के खात्मे के लिए चल रहे इस अभियान का जिक्र कर उसने साफ कर दिया कि यह संगठन सिर्फ मजदूरों की बात नहीं कर रहा, बल्कि इसके पीछे एक बहुत ही गहरी और खौफनाक विचारधारा छिपी है.
चक्का जाम का पूरा ब्लूप्रिंट
इस पूरी साजिश को अंजाम देने के लिए किसी शातिर अपराधी की तरह बहुत ही सधा हुआ तरीका अपनाया गया था. अरुण विहार से बरामद ब्लूप्रिंट को देखकर एजेंसियां भी हैरान रह गईं, क्योंकि पूरी प्लानिंग को अलग-अलग 'फेज' में बांटा गया था. तकनीक का इस्तेमाल भी इतना चालाकी से हुआ कि व्हाट्सएप ग्रुप्स के एडमिन के लिए खास निर्देश थे, जैसे ही टास्क पूरा हो, तुरंत ग्रुप से 'लेफ्ट' हो जाओ ताकि पुलिस डिजिटल ट्रेल का पीछा न कर सके. मानेसर से शुरू हुई यह विरोध की आग नोएडा तक एक सोची-समझी कड़ी की तरह फैली थी. 30 मार्च से 1 अप्रैल के बीच नोएडा में भीड़ जुटाई गई और इनकी असली मंशा इस आंदोलन को मई 2026 तक खींचने की थी, ताकि लंबे समय तक सिस्टम को बंधक बनाया जा सके.
इस पूरे खेल का मुख्य किरदार माना जा रहा आदित्य आनंद कोई साधारण अपराधी नहीं, बल्कि काफी पढ़ा-लिखा और तेज दिमाग शख्स है. उसने दिल्ली के मशहूर हंसराज कॉलेज से पढ़ाई की है और लेबर स्टडीज में मास्टर डिग्री ली है. शायद इसी शिक्षा का इस्तेमाल उसने मजदूरों को गुमराह करने और इस नेटवर्क को खड़ा करने में किया. फिलहाल, पुलिस की नजरें उन इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और संदिग्ध दस्तावेजों पर टिकी हैं, जो दिल्ली के आदर्श नगर और शाहबाद डेरी से बरामद हुए हैं. साथ ही, इस साजिश में शामिल हिमांशु नाम के एक अन्य आरोपी की तलाश की जा रही है. जांच में यह भी पता चला है कि पिछले एक महीने से गुपचुप तरीके से पेम्फलेट बांटकर लोगों को उकसाया जा रहा था, ताकि इस आंदोलन को एक हिंसक रूप दिया जा सके.
फिलहाल, जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क के 'फंडिंग मॉडल' और विदेशी कनेक्शन की गहराई से पड़ताल कर रही हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर युवाओं को किस लालच में इस संगठन से जोड़ा गया और इस खतरनाक प्लानिंग के पीछे असली मास्टरमाइंड कौन है? नोएडा STF और पुलिस की टीमें अब उन तमाम कड़ियों को जोड़ने में जुटी हैं, जिनसे दिल्ली-एनसीआर की शांति को भंग करने की कोशिश की गई. आने वाले दिनों में 'मजदूर बिगुल' के इस छिपे हुए चेहरे से जुड़े कई और चौंकाने वाले खुलासे होने की उम्मीद है.
अरविंद ओझा