30 मार्च की शाम करीब 7 बजे का वक्त था, जब मुझे अपने एक सूत्र का फोन आया. उसने बताया कि कानपुर के कल्याणपुर इलाके में पुलिस के सामने एक अवैध किडनी ट्रांसप्लांट का मामला आया है. इसे लेकर छापेमारी चल रही है. एक रिपोर्टर के तौर पर मुझे इस खबर में बड़ा संभावित एंगल दिखा.
मैंने तुरंत पुलिस से संपर्क कर जानकारी जुटाने की कोशिश की, लेकिन आधिकारिक तौर पर पुलिस ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. ऑफ द रिकॉर्ड कुछ अहम जानकारी जरूर मिली. पुष्टि होने के बाद मैंने मौके पर जाने का फैसला किया और करीब 9 बजे कल्याणपुर के लिए रवाना हो गया.
रास्ते में ही जानकारी मिली कि एक व्यक्ति, जिसने अपनी किडनी बेची है, वो 'मेडलाइफ' नामक अस्पताल में भर्ती है. मैंने अपने कैमरामैन को तुरंत वहीं पहुंचने के लिए कह दिया.
पहला पड़ाव: मेडलाइफ अस्पताल
जब मैं अस्पताल पहुंचा तो माहौल असामान्य लगा. न कोई चहल-पहल, न मरीजों की आवाजाही. अंदर गया तो पूरा परिसर लगभग खाली था. सिर्फ एक गार्ड मौजूद था, मेडिकल स्टाफ लगभग नदारद. वार्ड में पहुंचा तो एक बेड पर एक युवक लेटा मिला. उसका नाम आयुष था, जिसके बारे में पुलिस ने बताया था.
आयुष से बातचीत: दर्द, सौदा और सन्नाटा
उसके आसपास कुछ मीडिया कर्मी मौजूद थे. मैंने आयुष से बात करने की कोशिश की, लेकिन उसने शर्त रखी कि उसकी पहचान उजागर न की जाए. वह कंबल ओढ़े हुए था. शुरुआत में गलत जानकारी देने की कोशिश करता रहा. बाद में भरोसा दिलाने पर उसने बताया कि वह देहरादून में MBA का छात्र है. मूल रूप से समस्तीपुर, बिहार का रहने वाला है.
उसने बताया कि उसे किडनी देने के बदले 4 लाख रुपए देने का वादा किया गया था. उसकी हालत साफ बता रही थी कि ऑपरेशन हाल ही में हुआ है. वह दर्द में था. लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उसकी देखभाल के लिए वहां कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था. इतने बड़े ऑपरेशन के बाद भी वह बिना निगरानी के पड़ा था.
मरीज की हालत बिगड़ी, फिर शिफ्टिंग
निरीक्षण में साफ दिखा कि पोस्ट-ऑपरेटिव केयर लगभग नहीं के बराबर थी. हमने इसकी जानकारी पुलिस को दी और बेहतर इलाज की जरूरत बताई. बाद में पुलिस ने आयुष को हैलेट अस्पताल में शिफ्ट कराया. इस दौरान सवाल और गहरा हो गया. यदि यह सब चल रहा था, तो निगरानी कहां थी?
दूसरा दिन, दूसरा आहूजा अस्पताल
इसके बाद मैंने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की. उन्होंने बताया कि मामले की जांच जारी है. अगले दिन पुलिस कमिश्नर प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलासा करेंगे. उपलब्ध जानकारी के आधार पर मैंने खबर ऑफिस भेज दी. अगले दिन मैं केशवपुरम स्थित आहूजा अस्पताल पहुंचा.
पुलिस के मुताबिक, इस अस्पताल के ICU में किडनी ट्रांसप्लांट किए जाते थे और इसके बदले रोजाना 3 से 4 लाख रुपए तक लिए जाते थे. बाहर से अस्पताल खुला दिख रहा था, लेकिन अंदर का नजारा बिल्कुल अलग था. न कोई डॉक्टर, न मरीज. सिर्फ एक गार्ड मिला, जिसने बताया कि एक दिन पहले पुलिस संचालकों को अपने साथ ले गई थी.
अंदर का दृश्य: जैसे सब अचानक छोड़ा गया
आहूजा अस्पताल के अंदर जो देखा, वह चौंकाने वाला था. रिसेप्शन पर कंप्यूटर चालू था. मरीजों की फाइलें काउंटर पर खुली पड़ी थीं. मेडिकल उपकरण बिना निगरानी के थे. डॉक्टर के केबिन में निजी सामान जस का तस पड़ा था. वार्ड में कुछ बेड पर ड्रिप लगी हुई थी, लेकिन वहां कोई मरीज नहीं था.
पूरा माहौल ऐसा लग रहा था जैसे सब कुछ अचानक छोड़कर लोग भाग गए हों. जानकारी में सामने आया कि इसी अस्पताल के ICU का इस्तेमाल ट्रांसप्लांट के लिए किया जाता था. पुलिस ने डॉक्टर दंपति को हिरासत में लेकर पूछताछ की और बाद में गिरफ्तार भी कर लिया.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बड़ा खुलासा
दोपहर करीब 1 बजे मैं पुलिस कार्यालय पहुंचा, जहां प्रेस कॉन्फ्रेंस हो रही थी. वहां का माहौल पत्रकारों से खचाखच भरा था, जिससे साफ था कि मामला कितना बड़ा है. पुलिस कमिश्नर, DCP और ACP समेत कई अधिकारी मौजूद थे. यहां खुलासा हुआ कि यह मामला सिर्फ 2-3 ऑपरेशन का नहीं, बल्कि 60 से ज्यादा ट्रांसप्लांट का है.
कैसे चलता था पूरा नेटवर्क
कई आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके थे, लेकिन मास्टरमाइंड डॉक्टर अब भी फरार था. जांच में सामने आया कि पूरा नेटवर्क बेहद संगठित और गोपनीय तरीके से काम करता था. WhatsApp और Telegram के जरिए डोनर और रिसीवर खोजे जाते थे. वहीं पर सौदे तय होते थे. ऑपरेशन की तारीख, जगह और टीम तय की जाती थी.
नोएडा से स्पेशल डॉक्टर टीम बुलाई जाती थी. अस्पताल का नियमित स्टाफ हटा दिया जाता था और कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था. पुलिस के मुताबिक, इस नेटवर्क में 40 लाख से 1 करोड़ रुपए तक की डील होती थी. डोनर्स को कम पैसे देकर तैयार किया जाता, जबकि मरीजों से भारी रकम ली जाती थी.
प्रशासन पर सवाल
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि एक एम्बुलेंस चालक खुद को डॉक्टर बताकर लोगों को इस जाल में फंसाता था. प्रेस कॉन्फ्रेंस में CMO भी मौजूद थे. पत्रकारों ने उनसे तीखे सवाल किए कि इतने बड़े स्तर पर यह रैकेट कैसे चल रहा था और प्रशासन को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी.
आरोपियों से सामना
यह भी पूछा गया कि बिना अनुमति के अस्पतालों में इस तरह के ऑपरेशन कैसे हो रहे थे. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सभी गिरफ्तार आरोपी मौजूद थे. मैंने उनसे सवाल पूछने की कोशिश की. मुख्य आरोपी डॉक्टर दंपति चुप रहे. कई बार सवाल पूछने के बावजूद उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
ग्राउंड से आखिरी तस्वीर
कुछ अन्य आरोपियों ने खुद को बेकसूर बताया और कहा कि उन्हें पूरे नेटवर्क की जानकारी नहीं थी. दो दिनों की इस ग्राउंड रिपोर्टिंग में एक बात साफ थी कि छापेमारी के बाद अस्पताल पूरी तरह निष्क्रिय हो चुके थे. लेकिन कई सवाल अब भी बाकी हैं. इतने बड़े स्तर पर ट्रांसप्लांट कैसे होते रहे? किसकी नजर नहीं पड़ी? इस नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे?
इस मामले की जांच जारी है. लेकिन जो तस्वीर सामने आई, वह सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर चूक की कहानी है.
सिमर चावला