उत्तर प्रदेश की पावन नगरी अयोध्या... सरयू किनारे बसी यह धरती सदियों से आस्था, इतिहास और कथा की साक्षी रही है. यहां हर गली, हर घाट और हर मंदिर में राम की कहानी गूंजती है. लेकिन अब इसी अयोध्या में एक ऐसी पहल शुरू हुई है, जो राम कथा को सिर्फ सुनने या पढ़ने तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि उसे छूने, देखने और समझने का एक जीवंत अनुभव बना देगी.
एक ऐसी जगह, जहां अलग-अलग भाषाओं, लिपियों और युगों में लिखी गई रामायण की दुर्लभ पांडुलिपियां एक ही छत के नीचे मौजूद हों. जहां कागज पर उकेरे गए शब्दों में सदियों पुरानी स्याही आज भी राम की कथा सुना रही हो. यही सपना अब हकीकत बनने की ओर बढ़ रहा है.
यह कहानी शुरू होती है अंतरराष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय से, जहां इन दिनों एक अनोखा संग्रहण यज्ञ चल रहा है- रामायण पांडुलिपि संग्रहण यज्ञ. इस यज्ञ के सूत्रधार हैं इसके निदेशक संजीब कुमार सिंह, जिनके नेतृत्व में राम कथा की हर धारा को एक जगह समेटने का काम चल रहा है.
अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय के डायरेक्टर संजीब कुमार सिंह ने बताया कि यह एक तरह का संग्रहण यज्ञ है, जिसमें लोग अपनी पुरानी पांडुलिपियां दान कर रहे हैं. खास बात यह है कि यहां सिर्फ हाथ से लिखी गई रामायण ही ली जाएगी, छपी हुई किताबें नहीं.
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देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग इसमें हिस्सा ले रहे हैं. तमिलनाडु, कर्नाटक, असम, बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों से लोग अपनी पांडुलिपियों की जानकारी दे रहे हैं. कई लोग खुद फोन करके कह रहे हैं कि उनके पास पुरानी रामायण है, जिसे वे संग्रहालय को देना चाहते हैं.
कुछ पांडुलिपियां बहुत पुरानी बताई जा रही हैं. माना जा रहा है कि कुछ 300-400 साल पुरानी भी हो सकती हैं. हालांकि, हर पांडुलिपि को जांचने के बाद ही लिया जाएगा. इसके लिए एक खास टीम बनाई गई है, जो देखेगी कि पांडुलिपि कितनी पुरानी है, किस भाषा में है और कितनी खास है.
इस पूरे काम का मकसद सिर्फ पांडुलिपियां जमा करना नहीं है. इन्हें सुरक्षित भी रखा जाएगा. साथ ही इन्हें डिजिटल रूप में भी सेव किया जाएगा, ताकि आने वाले समय में लोग इन्हें आसानी से देख सकें और पढ़ सकें.
लोग म्यूजियम को देना चाहते हैं संभालकर रखी गईं पांडुलिपियां
जब ये सारी पांडुलिपियां एक जगह इकट्ठा हो जाएंगी, तो अयोध्या एक बड़ा रिसर्च सेंटर बन जाएगा. यहां लोग यह जान पाएंगे कि अलग-अलग जगहों पर रामायण कैसे लिखी गई और उसमें क्या-क्या फर्क है.
इस काम में सिर्फ बड़े शहरों के लोग ही नहीं, बल्कि अयोध्या और आसपास के लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. कई परिवार, जो वर्षों से इन पांडुलिपियों को संभालकर रखे हुए थे, अब उन्हें इस म्यूजियम को देना चाहते हैं.
सबसे खास बात यह है कि इस पहल से रामायण से जुड़ी पुरानी और अनमोल चीजें सुरक्षित रह सकेंगी. साथ ही आने वाली पीढ़ियां भी इन्हें देख और समझ सकेंगी.
कुल मिलाकर अयोध्या में शुरू हुआ यह काम सिर्फ एक संग्रहालय बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति और इतिहास को बचाने की एक बड़ी कोशिश है.
पहल से देश-विदेश से जुड़ रहे लोग
एक दिन म्यूजियम के दफ्तर में फोन बजता है. दूसरी ओर से आवाज आती है- हमारे पास रामायण की एक पुरानी हस्तलिखित प्रति है? फिर दूसरा फोन... फिर तीसरा... और देखते ही देखते यह सिलसिला बढ़ता गया.
तमिलनाडु से कोई संपर्क करता है, कर्नाटक से कोई अपनी पांडुलिपि की जानकारी देता है, असम से एक दुर्लभ जनजातीय रामायण की खबर आती है, तो पश्चिम बंगाल से एक बड़े संग्रहकर्ता अपनी धरोहर सौंपने की इच्छा जताते हैं.
यह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा. अमेरिका के न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी से भी भारतीय समुदाय के लोग इस अभियान से जुड़ने लगे. मानो राम कथा की डोर पूरी दुनिया को जोड़ रही हो.
इस पहल में खास बात यह है कि यहां सिर्फ हस्तलिखित पांडुलिपियां ही स्वीकार की जा रही हैं. प्रिंटेड नहीं. क्योंकि इन पांडुलिपियों में सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि उस दौर की सोच, कला और संस्कृति भी बसती है.
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कई पांडुलिपियां ऐसी हैं, जो 300-400 साल पुरानी बताई जा रही हैं. कुछ तो मुगल काल की भी हो सकती हैं. कल्पना कीजिए- एक कागज, जिस पर सैकड़ों साल पहले किसी ने बैठकर राम की कथा लिखी हो... और वह आज भी सुरक्षित हो. हर पांडुलिपि के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई है, जो उसकी भाषा, लिपि, आयु और ऐतिहासिक महत्व की जांच करती है.
यहां सिर्फ संग्रह नहीं हो रहा, बल्कि संरक्षण की एक पूरी प्रक्रिया अपनाई जा रही है. पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, उन्हें संरक्षित किया जाएगा. डिजिटल रूप में बदला जाएगा. और फिर शोधार्थियों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा. यानी, सदियों पुरानी यह धरोहर अब डिजिटल दुनिया में भी जीवित रहेगी.
जब ये सभी पांडुलिपियां एक जगह एकत्रित हो जाएंगी, तो अयोध्या एक वैश्विक शोध केंद्र बन जाएगी. यहां शोधकर्ता यह समझ सकेंगे कि अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों में रामायण कैसे लिखी गई, उसके कथानक में क्या बदलाव आए, और समय के साथ उसमें क्या विविधताएं जुड़ीं. तुलसीदास की रामचरितमानस से लेकर दक्षिण भारत की कंब रामायण और पूर्वोत्तर की लोक रामायण- सब एक ही जगह.
इस पूरी प्रक्रिया में भावुक पहलू है- लोगों का जुड़ाव. अयोध्या और आसपास के क्षेत्रों के लोग भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. कई परिवार, जो पीढ़ियों से अपनी पांडुलिपियों को संभालकर रखे हुए थे, अब उन्हें इस यज्ञ में अर्पित करने को तैयार हैं. एक सज्जन ने जब अपनी पांडुलिपि की तस्वीर भेजी, तो संग्रहालय की टीम भी भावुक हो गई. यह सिर्फ एक दस्तावेज नहीं था, बल्कि एक परिवार की पीढ़ियों की आस्था का प्रतीक था.
एक यज्ञ, जिसमें हर कोई सहभागी
संजीव कुमार सिंह इस पूरे अभियान को यज्ञ कहते हैं. उनके शब्दों में- यह एक ऐसा यज्ञ है, जिसमें हर कोई अपनी आस्था का अंश डाल रहा है. कोई अपनी पांडुलिपि दे रहा है, कोई जानकारी दे रहा है, कोई प्रचार कर रहा है- और इस तरह यह यज्ञ लगातार आगे बढ़ रहा है.
कल्पना कीजिए, जब यह म्यूजियम पूरी तरह तैयार होगा- एक विशाल भवन, जिसमें कांच के भीतर सजी दुर्लभ पांडुलिपियां... डिजिटल स्क्रीन पर चलती राम कथा... और दुनिया भर से आए लोग, जो इस धरोहर को देखने और समझने के लिए यहां पहुंचेंगे. यह सिर्फ म्यूजियम नहीं होगा, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत केंद्र होगा.
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