13 साल की खामोशी और आखिरी सफर की तैयारी... हरीश राणा की दर्दभरी कहानी

गाजियाबाद के हरीश राणा 13 साल से कोमा में हैं, उनके लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया दिल्ली एम्स में शुरू है. सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद डॉक्टर लाइफ सपोर्ट कम कर रहे हैं. इस दौरान मरीज को दर्द से राहत देने का पूरा ध्यान रखा जा रहा है. परिवार ने आध्यात्मिक सहारा भी लिया है. डॉक्टरों का कहना है कि हरीश की जिंदगी अब अंतिम चरण में है.

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हरीश राणा दिल्ली AIIMS में एडमिट हैं. Photo ITG   हरीश राणा दिल्ली AIIMS में एडमिट हैं. Photo ITG

शम्स ताहिर खान

  • नई दिल्ली,
  • 18 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:38 PM IST

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के हरीश राणा का मामला देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लेकर एक अहम उदाहरण बन गया है. करीब 13 साल से कोमा में रह रहे 31 वर्षीय हरीश को दिल्ली एम्स में भर्ती किया गया है, जहां सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उनकी इच्छामृत्यु की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है. डॉक्टरों के अनुसार यह प्रक्रिया स्टेप बाय स्टेप पूरी की जाएगी, ताकि मरीज को किसी तरह की तकलीफ न हो और उसकी गरिमा बनी रहे.

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हरीश राणा 2013 में एक हादसे के बाद से कोमा में हैं. तब से वह कृत्रिम तरीकों से जीवित रखे गए थे. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसके बाद उन्हें गाजियाबाद स्थित घर से एम्स के डॉ. भीमराव आंबेडकर कैंसर संस्थान के पैलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया. यह यूनिट उन मरीजों के लिए होती है जिनके ठीक होने की संभावना बेहद कम होती है और जिनका इलाज मुख्य रूप से दर्द कम करने और आराम देने पर केंद्रित होता है.

एम्स में डॉक्टरों की एक विशेष टीम इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रही है. इसमें एनेस्थीसिया, न्यूरोसर्जरी, मनोचिकित्सा और पेलिएटिव केयर से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हैं. डॉक्टरों का कहना है कि हरीश को एकदम से जीवन रक्षक साधनों से अलग नहीं किया जाएगा, बल्कि धीरे-धीरे दवाओं और सपोर्ट को कम किया जाएगा.

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डॉक्टर रवि मलिक ने बताया कि हरीश राणा के केस में पैलिएटिव केयर का सहारा लिया गया. इस ट्रीटमेंट के अंदर नींद की दवाइयां, दर्द की दवाइयां दी जा सकती हैं. ये पेशेंट की कंडीशन को देखते हुए डॉक्टरों की टीम तय करती है. इस ट्रीटमेंट में मरीज के दर्द को कम करने का पूरा ख्याल रखा जाता है. डॉक्टर मलिक ने बताया कि पेशेंट को दिए गए लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे कम किया जाता है. इसमें पेशेंट के कम्फर्ट का पूरा ध्यान रखा जाता है.

हरीश राणा के सांस थमने का इंतजार है.

अब बस सांस थमने का इंतजार 
विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया एक सप्ताह या उससे अधिक समय ले सकती है. इसका उद्देश्य मृत्यु को जल्दी लाना नहीं, बल्कि प्राकृतिक तरीके से जीवन की समाप्ति होने देना है, वह भी बिना दर्द और पूरी गरिमा के साथ.

कुछ आंकड़ें कहते हैं कि करीब 8 अरब वाली इस दुनिया में हर रोज लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा मौतें होती हैं. दुनिया की सबसे लाइलाज बीमारियों को भी शामिल कर लें तो भी शर्तिया किसी मरने वाले इंसान को अपनी मौत की तारीख और वक्त पता नहीं होगा. सिवाए उनके जिन्हें किसी जुर्म के लिए सजा-ए-मौत दी गई हो.

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वीडियो में दिखा भावुक पल 
इस बीच, हरीश के घर से एक भावुक वीडियो भी सामने आया, जिसमें ब्रह्माकुमारी संस्था की सदस्य उन्हें आध्यात्मिक तरीके से विदा देने की तैयारी करती नजर आती हैं. ये ब्रह्मकुमारी की बहनें हैं. हरीश के मां-बाप ब्रह्मकुमारी के अनुयायी हैं. वीडियो में देखा गया कि लवली के एक हाथ में चंदन की छोटी सी डिबिया है जबकि दूसरा हाथ हरीश के सर पर है. हरीश के सिरहाने दाईं तरफ ब्रह्मकुमारी की एक और बहन खड़ी हैं. हरीश के माथे पर चंदन का टीका लग चुका है.

हरीश राणा

पहले सात सेकंड तक बहन लवली अपना एक हाथ हरीश के सर पर रखकर मुस्कुराते हुए बस उसे निहारे जाती हैं. हरीश की दोनों आंखें खुली हैं. लगातार पलकें भी झपक रही हैं. मुंह खुला हुआ है. बीच में एक बार वो इस तरह गले से सांस ऊपर नीचे करता है मानो उसे प्यास लगी है. अभी तक उसकी पलके बस उठ और गिर रहीं हैं. पर जैसे ही बहन लवली पहला शब्द बोलती हैं अचानक हरीश की आंखें हरकत करती हैं और वो आंखें घुमाकर अब सीधे बहन लवली को देखने लगता है. 

जिस तरह 7 सेकेंड की खामोशी के बाद पहली बार बहन लवली ने पहला शब्द बोला और उस शब्द को सुनते ही जिस तरह हरीश ने अपनी आंखें घुमाईं उससे इतना तो साफ है कि वो सुन सकता था. शायद सुन रहा था. क्या पता बहन लवली जो कह रही थी उसे समझ भी रहा हो. अगर सचमुच हरीश सुन और समझ रहा था तो वो यकीनन ये जान भी गया होगा कि बस अब वो मरने वाला है. परिवार लंबे समय से इस कठिन स्थिति से गुजर रहा था और उन्होंने इस फैसले से पहले आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी लिया.

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हरीश के पिता ने पहले कहा था कि यह फैसला उनके लिए बेहद पीड़ादायक है, लेकिन बेटे की हालत को देखते हुए यह जरूरी था. उनका मानना है कि इस फैसले से उन परिवारों को भी रास्ता मिलेगा, जो लंबे समय से इसी तरह की स्थिति से जूझ रहे हैं.

डॉक्टरों के मुताबिक, हरीश की हालत को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि उनकी सांसें कब तक चलेंगी, लेकिन यह तय है कि अब उनकी जिंदगी का अंतिम चरण है.

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